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तीन महीने में मोदी का तीसरा गुजरात दौरा, बाकी राज्यों का क्या?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 6:41 IST
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य राज्यों की तुलना में अपने गृह राज्य गुजरात का बार-बार दौरा कर रहे हैं. 
  • विश्लेषकों के मुताबिक मोदी को अपने राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव की चिंता सता रही है. 
  • वजह यह है कि ग़रीबी, रोज़गार, भ्रष्टाचार, सामाजिक न्याय और कृषि के मोर्चों पर राज्य की हालत दयनीय है. 

प्रधानमंत्री का किसी क्षेत्र का दौरा करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन देश के सभी हिस्सों को बराबर तवज्जो मिलनी चाहिए. प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से राजनीतिक स्तर पर निष्पक्ष होने की उम्मीद की जाती है लेकिन होता यह है कि प्रधानमंत्री पद अपनी पार्टी का चेहरा मात्र रह जाता है.

कई प्रधानमंत्री यही करते आए हैं और नरेंद्र मोदी भी हर महीने गुजरात दौरे पर जाकर इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं. 22 अक्टूबर को मोदी वड़ोदरा गए थे. इससे पहले वे 17 सितम्बर को अपने जन्मदिन पर गुजरात गए थे. आनंदी बेन के अगस्त में इस्तीफा दिए जाने के बाद यह मोदी की तीन माह में गुजरात की चौथी यात्रा है.

इसकी वजह साफ है कि गुजरात में बने रहने के लिए बीजेपी पूरी तरह से मोदी पर निर्भर है. मोदी ने जब दिल्ली में सरकार बनाने के लिए गुजरात छोड़ा था तो राज्य का नेतृत्व कमजोर और बंटा हुआ था. आनंदी बेन के बीच कार्यकाल में इस्तीफा देने से सह बात साबित हो जाती है. 

गुजरात में 2017 में चुनाव होने वाले हैं और बीजेपी पूरी तरह से मोदी पर निर्भर है.

पाटीदार और उना दलित आंदोलनों के बाद गुजरात में बीजेपी की पकड़ ढीली पड़ गई है. यह नरेंद्र मोदी के गुजराती साथी अमितशाह की भी विफलता है क्योंकि 'गुजरात के शेर' मोदी के यहां से जाने के बाद राज्य का सारा दारोमदार अमित शाह पर ही था.

2017 में राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे और बीजेपी को पार्टी की राज्य में स्थिति को लेकर चिंता है. इसीलिए मोदी बार-बार गुजरात की यात्रा कर रहे हैं. परियोजनाओं का शुभारंभ कर रहे हैं, अपनी मां का आशीर्वाद लेने भी चले जाते है. वर्ल्ड रिकॉर्ड्स का बखान कर रहे हैं और दिव्यांगों को उपकरण बांट रहे हैं.

बीजेपी को राज्य में आम आदमी पार्टी से भी थोड़ा खटका है, जो महीनों से यहां प्रचार कर रही है. पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की रैलियों में भारी भीड़ देखी जा सकती है.

आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को आप से भी ज्यादा डर जिस बात का सता रहा है, वह है, गुजरात के बहुप्रचारित विकास मॉडल पर उठने वाले सवालों का. पूर्व में कई पर्यवेक्षक इस सवाल का जवाब दे चुके हैं लेकिन बीजेपी ने गुजरात मॉडल की बात करते हुए कुछ खामियां छोड़ दी हैं. एक नजर 5 कामों पर, जिन्हें गुजरात में बीजेपी पूरा नहीं कर पाई.

पांच सवाल

1. गरीबी उन्मूलन

एक ओर गुजरात औद्योगिक विकास का चैम्पियन बनता है तो दूसरी ओर राज्य के लाखों लोग गरीबी की समस्या से जूझ रहे हैं. केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में 2004-05 और 2011-12 में गरीबी में कमी की दर काफी कम थी. जो राष्ट्रीय औसत से कम है और इस रैंकिंग में गुजरात 12 वें स्थान पर आता है.

मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं को साकार करने में गरीबों को मरने के लिए छोड़ दिया गया. उदाहरण के लिए अहमदाबाद की साबरमती नदी परियोजना के कारण कई लोगों को वहां से विस्थापित किया गया. गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शहर के स्थानीय निकाय ने तकरीबन 11,000 परिवारों का पुनर्वास किया. हालांकि बाद में वे बस तो गए लेकिन उनकी आजीविका नहीं रह पाई.

2. सामाजिक क्षेत्र में विकास

विकास के चक्कर में स्वास्थ्य, शिक्षा और सफाई जैसे मुद्दे पीछे छूटते गए. राज्य में कुपोषण और शिशु मृत्यु दर काफी ऊंची रही और लिंगानुपात घट गया. कैग की एक रिपोर्ट में राज्य के घटते लिंगानुपात को हाईलाइट किया है. बढ़ते बाल विवाह, शिक्षा के अधिकार अधिनियम का अकुशल क्रियान्वयन, मिड डे मील का अप्रभावी संचालन और निम्न विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात. 

किताब 'ग्रोथ ऑर डिवलेपमेंटः विच वे गुजरात इज गोइंग?, में बताया गया है कि गुजरात पेयजल, शौचालय सुविधा और पुस्तकालय सुविधाओं के मामले में भी पिछड़ गया है. इस किताब का संपादन इंदिरा हारवे और अमिता शाह ने किया है.

3-भ्रष्टाचार निरोध और पूंजीवाद

गुजरात में मोदी के राज में उद्योगपतियों को लुभाने के लिए सरकार पर पक्षवादी पूंजीवाद का आरोप भी लगा. राज्य के तत्कालीन राजस्व मंत्री पटेल ने स्वीकार किया कि मार्च 2012 में अडानी समूह के सेज प्रोजेक्ट के लिए 5,400 हेक्टेयर भूमि 1 रूपए से 32 रूपए प्रति वर्ग गज के कौड़ियों के दाम पर दी गई.

जुलाई 2014 में गुजरात विधानसभा में पेश की गई कैग की एक और रिपोर्ट में राज्य सरकार पर अडानी के अलावा रिलायंस और एस्सार समूह को भी 1500 करोड़ रूपए के लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया.

4. रोजगार

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि गुजरात में जहां नौकरियां स्थिर रहीं, वहीं अनौपचारिक श्रम के कारण रोजगार की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई. मजदूरी की दरों में मामूली सा उछाल देखा गया. 

5. कृषि विकास 

मोदी हमेशा से गर्व के साथ कहते आए हैं कि उन्होंने राज्य में उच्च स्तरीय कृषि विकास दर को छुआ है लेकिन कई लोगों को मोदी के इस बखान पर संदेह है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात के कृषि विभाग में कार्यरत हजारों कर्मचारियों ने आत्महत्या की है. साथ ही यह भी दावा किया कि कृषि विकास का फायदा गरीबों, वंचित किसानों और खेती मजदूरों तक नहीं पहुंचा.

First published: 24 October 2016, 11:58 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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