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जानिए तीन तलाक से छुटकारा पाने के लिए हजारों मुस्लिम महिलाओं ने क्या किया?

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(पीटीआई)

भारत में पचास हजार से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों ने 'तीन तलाक' की प्रथा को खत्म करने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिखा है.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने तीन बार तलाक कहने की प्रथा को खत्म करने के लिए एक अभियान शुरू किया है. संगठन के इस अभियान में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, केरल, उत्तर प्रदेश राज्यों के मुस्लिमों ने बड़ी संख्या में हस्ताक्षर किए हैं.

राष्ट्रीय महिला आयोग के अलावा बीएमएमए राज्य महिला आयोग को भी समर्थन के लिए पत्र लिख रहा है. बीएमएमए की संयोजक नूरजहां साफिया नियाज के मुताबिक आने वाले दिनों में और लोग इस अभियान को अपना समर्थन देंगे.

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भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के अनुसार यह संस्था मुस्लिम महिलाओं के हक और अधिकार के लिए काम करती है.

पिछले साल इसी संगठन ने एक सर्वे कराया था जिसके अनुसार 88.3 फीसदी मुस्लिम महिलाएं 'तलाक-तलाक-तलाक' के बजाय सिर्फ 'तलाक' को बेहतर मानती हैं. सर्वे में भाग लेने वाली 91.2 फीसदी महिलाएं बहुविवाह के खिलाफ हैं.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का कहना है कि 2014 में महिलाओं के 235 मामले, जो कि महिला शरिया अदालत में आए थे, उनमें से 80 फीसदी मौखिक तलाक के थे.

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राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम को लिखे पत्र में बीएमएमए ने कहा है, 'महिलाएं चाहती हैं कि मौखिक और एकतरफा तलाक की प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए. मुस्लिम महिलाओं को भी संविधान में अधिकार मिले हैं. इसलिए अगर कोई कानून समानता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है तो उस पर रोक लगनी चाहिए.'

पत्र में कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को पूरी तरह से बदलने में समय लगेगा, लेकिन तब तक 'तीन तलाक' पर प्रतिबंध लगने से मुस्लिम महिलाओं को राहत मिलेगी.

दूसरी ओर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इस अभियान का विरोध करने की घोषणा की है.

हलाला निकाह प्रथा को समाप्त किया जाए

बीएमएमए ने हलाला निकाह की प्रथा को भी समाप्त करने के लिए आवाज उठाई है. हलाला निकाह की प्रथा के अनुसार तीन तलाक से अलग हो चुके मुस्लिम दंपत्ति दोबारा शादी नहीं कर सकते. अपने पूर्व शौहर से महिला तभी दोबारा शादी कर सकती है जब तलाक के बाद उसकी किसी और से शादी हो जाए और वो अपने नए शौहर से भी किसी वजह से अलग हो जाए.

सुप्रीम कोर्ट में भी मामला

मार्च महीने में शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी.

बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है. कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है.

बहुचर्चित शाह बानो केस

शाह बानो का मामला भारतीय इतिहास में एक नजीर बन चुका है. इंदौर की रहने वाली शाह बानो ने तलाक के बाद अपने शौहर से गुजारे-भत्ते की मांग की थी. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में 62 वर्षीय शाह बानो के हक में फैसला दिया था.

उस समय आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने इसका विरोध किया था. बाद में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में कानून को बदल कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था.पिछले साल भारतीय महिला मुस्लिम आंदोलन ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा था कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए या तो शरियत एप्लीकेशन लॉ (1937) और मुस्लिम मैरिज एक्ट (1939) में संशोधन किए जाएं या फिर मुस्लिम पर्सनल कानूनों का एक नया स्वरूप ही लाया जाए.

First published: 1 June 2016, 2:02 IST
 
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