Home » इंडिया » 50 days of note ban: Handloom city Pilkhuwa lies deserted, traders angry
 

नोटबंदी के 50 दिनः हैंडलूम नगरी पिलखुवा बदहाल, कारोबारियों में गुस्सा

सादिक़ नक़वी | Updated on: 30 December 2016, 8:14 IST
(कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • आज से ठीक 50 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी की घोषणा की थी. इसके बाद पूरे देश में एक असमंजस और अनिश्चय का वातावरण बन गया था. प्रधानमंत्री ने उस वक्त 50 दिन की मोहलत मांगी थी. तब कैच न्यूज़ के रिपोर्टरों ने हाट, बजारों, गांवों, लेबर चौराहों से लेकर लोगों के घरों का दौरा किया था. आज 50 दिन बाद उन स्थानों पर क्या परिवर्तन आया यह जानने के लिए बार फिर से हम उन्हीं स्थानोंं का दौरा कर रहे हैं.

हापुड़, उत्तर प्रदेश के टेक्सटाइल कस्बे पिलखुवा के बाजार में हाजी ओबैदुल्लाह खाली बैठे धूप सेक रहे हैं. वे कहते हैं, 'आम तौर पर यहां बुधवार का दिन काफी व्यस्त रहता है. बुधवार को यहां लगने वाले साप्ताहिक हाट बाजार में दूसरी जगहों से भी आकर लोग दुकान लगाते हैं. इन दुकानदारों से पूरी सड़क भर जाती थी. अब तो ये बहुत कम हैं, जैसा कि आप देख ही रहे हैं.'

ओबैदुल्लाह यहां के टेक्सटाइल बाजार के थोक व्यापारियों में से ही एक हैं. ये यहां चादरें, तकियों की खोलियां, रजाई, तौलिये और अस्तर के कपड़ों का व्यापार करते हैं. अपनी दुकान की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं कि 8 नवम्बर को प्रधानमंत्री द्वारा की गई 500 और 1000 रुपए के नोटबंदी की घोषणा के बाद से कोई धंधा नहीं चल रहा है. पिछले 50 दिनों में हमारी हालत में कोई सुधार नहीं आया है.

पिलखुवा का हैंडलूम बाजार बुधवार को भी खाली पड़ा है, जबकि यहां बुधवार को तो साप्ताहिक हाट लगती है.

ओबैदुल्लाह तो फिर भी यहां के अमीर व्यापारियों में गिने जाते हैं, जो कि अब भी अपना व्यापार चला रहे हैं. बाकी कई दूसरे व्यापारी तो यह काम छोड़ कर दूसरे रोजगारों में लग गए हैं. कुछ तो रिक्शा चला रहे हैं. पहले ही बिजली विभाग की नाराजगी झेल रहे इस हैंडलूम उद्योग को नोटबंदी ने और संकट में डाल दिया.

ओबैदुल्लाह ने बताया, ‘मेरी दुकान के 8 में से छह कामगार तो पहले ही पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने गांवों में जा चुके हैं. इसके अलावा चादरों और तकिए की खोलियों पर प्रिंटिंग करने वाले 6 और कामगार काम छोड़ चुके हैं. और भी कई मजदूर जो काम छोड़ चुके हैं, उनमें से कोई चादरें सिलता है तो कोई तकिये की खोलियां, कोई कारखानों से माल दुकानों तक पहुंचाने का काम करता. अब इनके पास कोई काम ही नहीं रह गया है.

वे कहते हैं आम तौर पर शादियों के सीजन में अच्छा व्यापार होता है और नवम्बर इसका सर्वश्रेष्ठ समय. लेकिन इस बार तो नवम्बर में धंधा बिल्कुल ही मंदा रहा. पूरे सीजन ही कोई बिक्री नहीं हुई. कुछ ही दूरी पर चादरों का थोक व्यापार करने वाले नवनीत गोयल भी व्यथित दिखाई दिए. उन्होंने कहा, नवम्बर-दिसम्बर दोनों ही महीने बेकार निकले. 

वे कहते हैं, जब लोगों के पास खाने-पीने का जरूरी सामान खरीदने के लिए ही पैसे नहीं हैं तो वे चादरें क्यों खरीदें? गोयल ने बताया यहां कुछ लोग जो दूसरे राज्यों से ऑर्डर लेते थे, उन्होंने भी आना-जाना बंद कर दिया है. स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 15 हजार लोग व्यापार के सिलसिले में पिलखुवा से दूसरे राज्यों में जाते थे.

व्यापारियों का मानना है कि अगर नोटबंदी दिसम्बर में हुई होती तो वे इतने दुखी नहीं होते.

गोयल कहते हैं कि ‘बाजार में कैश ही नहीं है, ऐसे में खुदरा व्यापारी कैसे कोई ऑर्डर दें. हम सुबह आते हैं और दिन भर टाइम पास कर खाली हाथ ही लौट जाते हैं. मोदी जी ने व्यापारियों को मुसीबत में डाल दिया. मुझे नहीं लगता कि किसी राजनेता को नोटबंदी से कोई फर्क पड़ा हो.’

पिलखुवा बाजार के ही एक और व्यापारी राकेश मित्तल कहते हैं उनका सारा माल गोदाम में ही पड़ा है. वे कहते हैं ‘अगर यह नोटबंदी का फैसला दिसम्बर में भी किया जाता तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन नवम्बर तो सेल का महीना है और इस साल कोई माल नहीं बिका. हमें अब अपना माल बेचने के लिए अगले साल तक इंतजार करना पड़ेगा.’

हालांकि उन्हें उम्मीद है कि यह परेशानी जल्द ही खत्म होगी और जनवरी में अच्छा व्यापार होगा. वे कहते हैं नोटबंदी से मेरे जैसे घरेलू व्यापारियों को तो लाभ होगा लेकिन चीनी आयात में कमी आएगी; क्योंकि बिना ब्यौरे के आयात होने के रास्ते बंद हो जाएंगे.

बंद हो रहे हैं पावरलूम

पिलखुवा बहुत सारे हैंडलूम बुनकरों के लिए भी बड़ा बाजार है. वे यहां आकर अपने हथकरघा उत्पाद बेचते हैं. ज्यादातर माल सरधना, मुराद नगर और मेरठ से ही आता है. हालांकि कुछ लोग यहां कहीं और से भी आते हैं. आस-पास के कई कस्बों जैसे सरधना, मुराद नगर और मेरठ से यहां काफी माल आता है. 

अकबर अंसारी नाम के बुनकर गंगा पार 100 किलोमीटर दूर बिजनौर के नेहटौर गांव से पिलखुवा आते हैं. हर बुधवार को यहां हाट में ये बुनकर कच्चा कपड़ा लेकर आते हैं जो बाद में चादर तकिये की खोलियां और अन्य कपड़े बनाने के काम आता है.

अंसारी ने इस संवाददाता को बताया ‘मैं सुबह से बैठा हूं और मुश्किल से केवल 2000 रूपए की बिक्री हुई है. आम तौर पर बुधवार के बाजार में हम कम से कम 40 हजार रूपए से अधिक की बिक्री कर लेते हैं. बिना बिके कपड़ों के ढेर के पास बैठे अंसारी ने कहा ‘हथकरघा इकाइयां बंद हो रही हैं. हमारे पास आस-पास के गांवों से छह मजदूर तो रहते ही थे और अब हमें उन्हें काम छोड़ने के लिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि धंधा चल ही नहीं रहा है.

एक बुनकर ने बताया उसकी बिक्री में आम बुधवार के बजाय 5 प्रतिशत की कमी आई है.

पावरलूम मालिकों के स्थानीय संघ पावरलूम वस्त्र उत्पादक संघ के अध्यक्ष कुलदीप अग्रवाल कहते हैं, ‘पिलखुवा में हथकरघा उद्योग बंद हो रहे हैं. अग्रवाल स्वयं एक पावरलूम चलाते हैं जो कैनवास बनाता है. यह बैग और ट्रकों की अस्थाई लचीली छत बनाने के काम आता है. वे कहते हैं कि धंधा चौपट हो गया है. 

अग्रवाल के मुताबिक यहां 250 पावरलूम इकाइयां हैं और 250 कारखानों में कच्चे कपड़े पर छपाई कर चादरें, तकिये के कवर आदि बनाए जाते हैं. वे कहते हैं, अब धंधा मात्र 20 प्रतिशत तक ही रह गया है और कहां करोड़ों का टर्न ओवर था जो अब कुछ लाख ही रह गया है.

कैनवास बनाने वाले एक और पावरलूम मालिक अंकुर अग्रवाल ने कहा, जब ट्रकों की ही बिक्री घट गई है तो कैनवास कौन खरीदेगा? उनका व्यापार भी 70 प्रतिशत तक कम हो गया. नोटबंदी दरअसल पावरलूम उद्योग के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ. 

इससे पहले उनकी मुसीबतें तब ही शुरू हो गई थी, जब बिजली विभाग ने इनसे पूरा बिजली का बिल भरने के लिए कहा, जबकि वे अब तक केवल सब्सिडी रेट वाला ही भुगतान कर रहे थे. इनमें से अधिकतर पावरलूम मालिक अभी तक 130 रूपए प्रति घंटा की दर से बिजली के बिल का भुगतान कर रहे थे. 

किसानों को सिंचाई के लिए वाटर पम्प चलाने पर भी इतनी ही सब्सिडी दी जाती है. इसलिए छोटे-मोटे व्यापारी जो अपने घरों में एक या दो पावरलूम चलाते हैं वे केवल 1000 रूपए प्रति माह या उससे बस थोड़े ज्यादा का ही बिजली का बिल भरेंगे. बिजली विभाग ने अब उन्हें भारी भरकम बिल भेज दिए हैं. इनमें से कुछ तो 2.5 लाख रूपए से भी अधिक के हैं.

पड़ोस के गढ़ी मोहल्ला में अपने घर में ही पावरलूम चलाने वाले सरफराज अंसारी ने बताया नोटबंदी और बिजली की बढ़ती दोहरी मार के चलते हम भूखों मरने पर मजबूर हैं. हालांकि यहां के ज्यादातर पावरलूम अब काम नहीं कर रहे या क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं.

पावरलूम मालिक 130 रूपए प्रति घंटा की दर से बिजली बिल देते हैं जबकि अब पूरा बिल भरने को कह जा रहा है.

शबनम अंसारी ने बताया कि उनके दोनों पावरलूम पिछले दो माह से बंद पड़े हैं और काम ही नहीं है, इसलिए उनके पति रियाज अब रिक्शा चलाते हैं. उनका परिवार पावरलूम पर ही काम करके हर महीने 9-10 हजार रूपए महीना कमाता है.

रियाज की ही तरह एक और बुनकर हनीफ अंसारी ने भी रिक्शा चलाना शुरू कर दिया है. नोटबंदी के फैसले के पहले ही अपना काम बंद कर चुके बुनकर हनीफ को हालांकि उम्मीद है कि उनका बिजनेस फिर से चल पड़ेगा लेकिन फिलहाल नोटबंदी ने उनके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया. 

केवल बुनकर ही नहीं, और भी कामगार नोटबंदी के चलते परेशान हैं, जैसे कच्चा कपड़ा धोने और ब्लीच करने वाले अबरार अंसारी भी परेशान हैं. उन्होंने बताया, ‘कोई काम धंधा है ही नहीं. पिछली सर्दी में काफी काम था. अपने टैंक के पास बैठे अंसारी ने बताया कि उन्हें 2 रूपए प्रति चादर की रेट से ब्लीच का पैसा मिलता था और अभी तो टैंक ही खाली पड़ा है.

सरफराज कहते हैं कि पिलखुवा में धीरे-धीरे हथकरघा या पावरलूम गायब हो जाएंगे और इससे हैंडलूम सिटी का नाम छिन जाएगा.

First published: 30 December 2016, 8:14 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी