Home » इंडिया » 50 days of notebandi strips Noida's labour chowk of jobs & dignity of pay
 

नोटबंदी के 50 दिन: मज़दूरों से छीन लिया है काम और उनके मेहनताने का मान

श्रिया मोहन | Updated on: 30 December 2016, 8:18 IST
(कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • आज से ठीक 50 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी की घोषणा की थी. इसके बाद पूरे देश में एक असमंजस और अनिश्चय का वातावरण बन गया था. प्रधानमंत्री ने उस वक्त 50 दिन की मोहलत मांगी थी. तब कैच न्यूज़ के रिपोर्टरों ने हाट, बजारों, गांवों, लेबर चौराहों से लेकर लोगों के घरों का दौरा किया था. आज 50 दिन बाद उन स्थानों पर क्या परिवर्तन आया यह जानने के लिए बार फिर से हम उन्हीं स्थानोंं का दौरा कर रहे हैं.

जगह: नोएडा के सेक्टर 49 का मजदूर चौक.

समय: सुबह के साढ़े नौ बजे.

लगभग 200 लोग दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में चौक पर इधर-उधर नजर आ रहे हैं. कुछ लोग खड़े हुए हैं तो कुछ लोग उकड़ू बैठे हुए हैं. तभी एक होंडा एकॉर्ड कार आकर रुकती है. करीब 30 मजदूर उस कार की तरफ दौड़ते हैं और उस कार के दरवाजों पर हाथ मारते हैं. कार के शीशे नीचे होते हैं उसमें से गहरे रंग के कपड़े पहने भारी-भरकम व्यक्ति की आवाज आती है, '200 रुपये में मेरे घर पर पुताई करने कौन-कौन चलेगा. तीन लोग तैयार हो जाते हैं. कार उनको भरकर तेजी से आगे बढ़ जाती है.'

जब से दिहाड़ी मजदूरों पर नोटबंदी की चोट पड़ी है तब से मजदूरी गिरती ही जा रही है. आज अधिक से अधिक मजदूर बेकार हैं और जिस काम में भी पैसे मिलते हैं वो करने को तैयार हैं. मजदूर अब सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं हैं और जितना भी पैसे मिले वे काम करने चल देते हैं.

राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, पेंटर, वेल्डर, प्लम्बर से लेकर हेल्पर तक के काम जानने वाले सैंतीस वर्षीय मजूदर सुभाष का कहना है, 'पिछले 50 दिनों में, उसे सिर्फ 7 दिन ही काम मिला है. उसमें भी उसे 250 रुपये से 350 रुपये ही मजदूरी मिली है, जबकि रेट 500 रुपये प्रतिदिन चल रहे हैं.' 

बिहार का रहने वाला सुभाष वहां एक फैक्ट्री में काम करता था. लेकिन कुछ समय पहले वह अपने परिवार समेत नोएडा आकर बस गया है. इन कुछ वर्षों में उसने जीवित रहने के लिए कई प्रकार के काम सीख लिए हैं. कुछ काम विषम स्थितियों में करते—करते आ गए हैं तो, कुछ के लिए उसने आईटीआई का सहारा भी लिया. सुभाष बड़े भरोसे से कहता है कि ऐसा कोई काम नहीं है जो मैं न की कर सकूं. जिस भी काम में पैसा मिले वो मैं करने का तैयार हूं.

लेकिन सुभाष जैसे कुशल कामगर के लिए भी नोटबंदी खराब समाचार लेकर ही आया है और हर एक दिन गुजरने के साथ हालात और बिगड़ ही रहे हैं.

नोटबंदी के बाद पहला सप्ताह खराब नहीं गुजरा. उस समस बेकारी तो थी पर पिछले 50 दिनों में तो हालात बेकाबू ही हो गए हैं. हमारी विपत्ति को लोगों ने शोषण का जरिया बना लिया है. अब ठेकेदार को लगता है कि कितने ही कम पैसे दो, कुछ न कुछ मजदूर तो काम करने को जारी हो ही जाएंगे.

गिरते दाम

सुभाष जैसे कामगरों को सबसे बड़ी चिंता गिरती मजदूरी की ही है. हर प्रकार की मजदूरी की दिहाड़ी गिरती जा रही है. पेंटिंग के लिए 500 से गिरकर अब 350 प्रतिदिन तक रेट आ गए हैं. अकुशल मजदूरों अर्थात बेलदारी के दाम 350 से घटकर 150 रुपये तक आ गए हैं. राजमिस्त्री के दाम 500 से गिरकर 400 तक आ गए हैं.

ये सब दाम भी एक मोटा—मोटा अनुमान ही हैं. हर रोज कोई न कोई आता है और अपमानजनक रूप से कम दाम की बोली लगाता है. इसके बावजूद उसे कुछ मजदूर मिल ही जाते हैं जो उस दाम पर भी काम करने के लिए मना नहीं कर पाते. विडम्बना यह है कि कई बार दिनभर खटने के बाद मजदूर को यह सुनने को भी मिलता है कि जो रेट तय हुआ था वह देना संभव नहीं है क्योंकि बैंक से अधिक पैसा नहीं निकल सका. एक अन्य मजदूर राकेश ने बताया कि ऐसे में जो पैसा मिल रहा है उसे लेने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता ही नहीं होता है.

एक अन्य मजदूर नाथूराम ने बताया कि मैंने कल 100 रुपये में भी बेलदारी का एक काम किया. क्योंकि कल मेरे मकान मालिक ने दो माह से घर का किराया नहीं देने के कारण मेरा सामान उठाकर सड़क पर फेंक दिया. मेरी पत्नी, बच्चे और मुझे जाने के लिए कह दिया. अब इन 100 रुपयों से मैं क्या कुछ कर लूंगा? मैं गले तक कर्ज में डूब चुका हूं.

वहीं एक अन्य कामगर हरदयाल ने बताया कि मोदी जी ने हमें सम्मानपूर्वक जीविका का भरोसा दिलाया था. लेकिन देखिए कितना मान नोटबंदी हमारे लिए लेकर आई है. हरदयाल ने बताया कि उसे पिछले तीन सप्ताह से कोई काम नहीं मिला है. 

गुजारा चलना मुश्किल

सुभाष ने बताया कि उसके दो बच्चे हैं और उसकी पत्नी सात माह की गर्भवती है. सुभाष ने अपने पूरे दैनिक खर्च का ब्योरा पेश कर बताया कि हालात किस कदर मुश्किल हो चुके हैं. सुभाष ने बताया कि उसके दिमाग में आज—कल बस यही गणित चलता रहता है —

दूध :  35 रुपया

चावल : 35 रुपया

गैस : 15 रुपया

दाल : 30 रुपया

सब्जी : 10 रुपये

तेल : 5 रुपये

किराया : 30 रुपये प्रतिदिन

स्कूल फीस और किताबें : 40 रुपये

दवाईयां : 25 रुपये प्रतिदिन

पानी : 10 रुपये

बिजली : 10 रुपये

साबुन, कपड़े और अन्य सामग्री : 15 रुपये

चीनी, नमक, चाय और मसाला : 10 रुपये

इस तरह से 270 रुपये प्रतिदिन का खर्चा बैठता है. इसमें भी वो सब खर्चा शामिल नहीं है जो कि अचानक सामने आ जाते हैं जैसे यात्रा, बड़ी बीमारी और पत्नी की डिलेवरी.

इसलिए अगर सप्ताह में सिर्फ 350 रुपये का काम ही मिलता है तो समझा जा सकता है कि पूरे महीने का गुजारा किसी तरह नहीं चल सकता. सुभाष ने बताया कि वह नोटबंदी के बाद से 5000 रुपये उधार ले चुका है और यह उधारी प्रति सप्ताह बढ़ती ही जा रही है.

नोएडा के लेबर चौक पर दूर—दराज के क्षेत्रों से भी कई मजदूर काम ढूंढ़ने आते हैं. कई तो झांसी, पटना, बुंदेलखंड और बंगाल के गांवों से आने वाले मजदूर भी यहां मिल जाएंगे. नोएडा आने के पीछे उनके मन में कई आशा—आकांक्षाएं होती हैं. उनके मन में एक चाहत होती है कि जब वे वापस घर लौटेंगे तो उनके पास कुछ बचत होगी जिससे वे अपनी जमीन के छोटे से टुकड़े में फिर से खेती कर सकेंगे.

पर नोटबंदी ने उनके इस जीने के तरीके को खारिज कर दिया है. अगस्त में रक्षाबंधन के मौके पर झांसी से पांच लोगों के परिवार के साथ नोएडा आई विमला ने बताया कि अब अगर एक सप्ताह में हालात नहीं सुधरे तो हमारे लिए वापस घर जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाएगा. उसने बताया कि आखिर हम कब तक भूखे पेट सोएंगे और कब तक हम अपने बच्चों के स्कूल की फीस रोक सकते हैं. विमला का कहना है कि आखिर कब तक हम खुद बासी खाना खाएंगे और कब तक अपने बच्चों को देंगे? 

लेकिन वे घर में भी कैसे अपनी रोजी—रोटी कमाएंगे ?

विमला ने बताया कि घर में कम से कम हमें खाना तो नहीं खरीदना होता है. वहां हमारा खर्चा काफी सीमित होता है. वहां हम उतने से ही गुजारा चला लेते हैं जो कि हम उगाते हैं. इस तरह से स्थितियां सुधरने का इंतजार तो कर सकते हैं.

तो क्या यह दिहाड़ी मजदूर प्रधानमंत्री ने जो किया उसे सही मानते हैं?

सुभाष का तो यही कहना है कि हमारे कहानी में यूं तो दु:ख—दर्द की कोर्इ कमी नहीं होती है लेकिन विमुद्रीकरण के कारण हमारी स्थिति जितनी बदतर हुई है उतनी कभी नहीं हुई. जिंदा रहने के लिए इस तरह से संघर्ष हमें कभी नहीं करना पड़ा.

First published: 30 December 2016, 8:18 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी