Home » इंडिया » 6 December And Ayodhya: I was a cub reporter
 

6 दिसंबर 92: अयोध्या... तब मैं एक शावक रिपोर्टर था

अनिल यादव | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST

तब मैं लखनऊ में 'पत्र ही नहीं मित्र' (पमी) टाइप हिंदी के बड़े अखबार का शावक रिपोर्टर था जिसे हाथ से लिखा एक प्रेसकार्ड दिया गया था. संपादक के दस्तखत वाली पर्ची दिखाने पर पंद्रह सौ रुपए तनख्वाह मिलती थी जिसमें से अकाउंटेन्ट पान के लिए दस रुपए झपट लेता था. इसका मतलब यह है कि अगर मैं अयोध्या में मर जाता तो पत्रकार नहीं शहीद कारसेवकों में गिना जाता. यह एक सामंती व्यापारी परिवार था जहां काम लेने के लिए इमोशनल ब्लैकमेल से ताड़ना तक सारे उपाय आजमाए जाते थे.

अखबार के मालिक 'नमो' के अपने परिवार में जितने तरह के लोग थे उतनी दिशाओं में फैले धंधे थे. पत्रकारिता की ढाल के पीछे चीनी मिल, पेट्रोल पंप, शिक्षण संस्थान, रुपया सूद पर चलाने समेत कई कारोबार चल रहे थे. उन्हें हर तरह की सब्सिडी, सरकारी जमीनें और सहूलियत चाहिए थी क्योंकि वे अपने कंधों पर लोकतंत्र का एक खंभा संभाले हुए थे.

नेताओं-अफसरों और उनके बीच का पुल बहुत कम पैसे पर काम करने वाले वे पत्रकार बनाते थे जिन्हें नौकरी बचाने का सिर्फ अल्पकालीन अभय चाहिए था. उनकी आत्मा की चालक शक्ति मुनाफा थी, नीति अवसरवाद और महत्वाकांक्षा थी तत्कालीन चढ़ती हुई राजनीतिक पार्टी के पक्ष में जनमत का व्यापार करके धन कमाना और जल्दी से जल्दी शासक प्रजाति में शामिल होना, जिसका अगला दिखता मुकाम राज्यसभा की मेंबरी थी.

संपादक आधी रात को एडिटोरियल मीटिंग बुलाकर पत्रकारिता के आदर्शों की भावभीनी निराई-गुड़ाई करने लगता था

दफ्तर में कई पत्रकार आरएसएस के पूर्व प्रचारक या सदस्य थे जिनकी पूछ अचानक बढ़ गई थी क्योंकि उस वक्त सूबे में कल्याण सिंह की भाजपाई सरकार थी. कोई और सरकार होती तो किसी और सोच और कनेक्टिविटी वाले महत्वपूर्ण भूमिकाओं में होते.

बहुत कुछ छिपाना और ढीठ पत्रकारों को हांकना था, इसके लिए उन्होंने एक “हार्ड टास्क मास्टर” यानि गुंडा संपादक तैनात किया था जो सुबह चपरासी, सर्कुलेशन मैनेजर और पत्रकार किसी को भी पीट सकता था, दोपहर में किसी मजबूर महिला पत्रकार का रखैल की तरह इस्तेमाल कर सकता था लेकिन शाम को वह मालिक का ब्रीफकेस थाम कर विनम्र भाव से किसी मंत्री या अफसर से मुलाकात कराने चल देता था, आधी रात को एडिटोरियल मीटिंग बुलाकर पत्रकारिता के आदर्शों की भावभीनी निराई-गुड़ाई करने लगता था.

फिर भी वह रीढ़विहीन बौद्धिक नक्काल संपादकों से बहुत बेहतर था जो थोथे आदर्श झाड़ते हुए मैनेजमेंट के लिए यही सब करते हैं. मालिकों ने बूढ़े और बीमार हो जाने पर उसे इस्तेमाल हो चुके टिशूपेपर की तरह फेंक दिया. आखिरी दिनों में हमारी दोस्ती रही जिससे जागरण मार्का पत्रकारिता के कई रहस्य पता चले.

तब ऐसे सीनियर थे जो शावकों को संपादक के पैर छूकर उर्जा पाने की शास्त्रीय विधि सिखाते थे, एक हेडलाइन गलत लग जाने पर डरकर रोने लगते थे, रिटायरमेंट के एक दिन पहले जिंदगी का पहला स्कूटर खरीदने की मिठाई बांटते थे, ट्रांसलेशन सबसे बड़ी काबिलियत थी साथ में अगर थोड़ा मोड़ा ज्योतिष और कर्मकांड भी आता हो आप जीनियस समझे जाते, पेस्टर खुराफात करके अगले दिन डेस्क इंचार्जों को रुला देते थे, आखिरी प्रूफरीडर करपात्री जी थे जो दफ्तर में ही रहते थे, उनके कपड़े होली पर बदले जाते थे और वह दोनों वक्त सिर्फ पूड़ी खाते थे.

ऐसा एक मौका आया जब भरेपूरे ब्यूरो को दरकिनार कर दुबे, मुझे और मिश्र को अयोध्या कवर करने भेज दिया गया

इन विचित्र किंतु सत्य कारनामों को मेरे स्वीडिश दोस्त पॉयर स्टालबर्ग (Per Stahlberg) ने तीन साल रिसर्च के बाद अपनी किताब लखनऊ डेली- हाउ ए हिंदी न्यूज़पेपर कंस्ट्रक्ट सोसाइटी, स्टॉकहोम स्टडीज़ इन सोशल एंथ्रोपोलॉजी (Lucknow Daily- How a Hindi Newspaper Constructs Society, Stockholm Studies in Social Anthropology) में बेबाकी से लिखा है.

गौर किया जाना चाहिए, किसी देसी शोधकर्ता ने इस तरह का अर्थपूर्ण काम करने की जहमत आज तक नहीं उठाई है. मैं छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आया था. इस माहौल में भी मुझे यकीन था कि अपने वक्त का सच लिखने और अन्याय के शिकार लोगों की मदद करने का मौका मिल जाएगा. इसकी बुनियाद यह थी कि जब अखबार संकट में आता था तो संपादक को सर्कुलेशन दुरूस्त करने के लिए पत्रकारिता के सरोकारों को साथ ऐसे रिपोर्टर याद आने लगते थे जिनके पास भाषा, कॉमनसेंस और राजनीति की समझ थी.

दिसंबर 1992 के पहले हफ्ते में ऐसा ही एक मौका आया जब भरेपूरे ब्यूरो को दरकिनार कर दुबे, मुझे और मिश्र को अयोध्या कवर करने भेज दिया गया. चलते समय जो निर्देश दिए गए उन्हें मैने एक कान से सुना दूसरे से निकाल दिया क्योंकि पिछले ही साल मैने बनारस का दंगा एक लोकल इवनिंगर के लिए कवर किया था तब मैने तमाम अखबारों की अफवाह फैलाने और एतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़ कर सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की कलाकारी और प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की लाचारी का मजाक बनाते देखा था. दिनेश को एक सीनियर ने काला ब्राह्मण होने के नाते अविश्वसनीय करार दिया था जिससे भड़क कर वह लौट गया था.

अयोध्या के मठों और अखाड़ों में आरएसएस, भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना और भांति भांति के धर्माचार्यों के संयुक्त कारखाने चल रहे थे जिनमें या तो सांप्रदायिक उन्माद का उत्पादन हो रहा था या विराट भ्रम का. लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, महंत रामचंद्रदास समेत मंदिर आंदोलन के सभी नेता लीलाधर हो चुके थे.

वे एक ही सांस में सुनियोजित रणनीति के तहत दो या अधिक बातें कह रहे थे- हम अदालत का सम्मान करते हैं लेकिन मंदिर आस्था का प्रश्न है जिसका फैसला अदालत नहीं कर सकती. राममंदिर चुनावी मुद्दा नहीं है लेकिन धर्म का राजनीति पर अंकुश नहीं रहा तो वह पतित हो जाएगी. कारसेवा प्रतीकात्मक होगी लेकिन मंदिर का निर्माण किए बिना कारसेवक वापस नहीं जाएंगे.

दूसरी ओर साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती और विनय कटियार समेत बीसियों हाथों में दिन रात गरजते माइक थे

दूसरी ओर साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती और विनय कटियार समेत बीसियों हाथों में दिन रात गरजते माइक थे जो पाकिस्तान में तोड़े गए मंदिरों की तस्वीरकशी करते हुए कारसेवकों को लगातार बानर सेना में बदल कर बाबर की औलादों को सबक सिखाने का अंतिम अवसर न चूकने की कसम दिला रहे थे.

उन्माद इस स्तर पर पहुंचा दिया गया था कि अस्सी साल की बुढ़िया औरतें भी जो घरों में अपने हाथ से एक गिलास पानी भी न लेती होंगी “जिस हिंदू का खून न खौला, खून नहीं वह पानी है” की धुन पर अपने कपड़ों से बेखबर नाचने लगीं. लेकिन भ्रम भी ऐसा था कि कारसेवक रातों में अधीर होकर चंदा वापस मांगने लगते थे और ईंटे गठरी में लेकर वापस घर जाने की तैयारी करने लगते थे. मैंने अपनी रिपोर्टों को इसी भ्रम और उन्माद के तथ्यों के सहारे नेताओं की कथनी-करनी के अंतर पर केंद्रित किया जो काफी एडिट करने के बाद बिल्कुल निरापद बनाकर छापी जाती थीं या रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती थीं.

एक दिन सुबह अखबार देखकर मेरे होश उड़ गए हमारी संयुक्त बाईलाइन के साथ जाने किसकी लिखी एक काल्पनिक खबर बैनर के रूप में छपी थी- "अयोध्या में मंदिर का अबाध निर्माण शुरू”. मुझे उसी समय इंट्यूशन की तरह लगा कि इन भ्रमों के पीछे जिस छापामार योजना को छिपाने की कोशिश की जा रही है उसका पता मेरे अखबार को है और अंततः इस बार संविधान, न्यायपालिका वगैरह सबके सम्मान का स्वांग करते हुए विवादित ढांचे को ढहा दिया जाएगा.

उस दिन वही हुआ पुलिस वाले विह्वल होकर हनुमान चलीसा का पाठ कर रहे थे, पीएसी कारसेवकों को रस्सा और फावड़े दे रही थी, सूबे की सरकार अगले चुनाव का हिसाब लगाकर शहीद हो रही थी, पत्रकार पिट रहे थे, जिसे जो मन में आए करने की छूट थी, कल तक समझदार लगते लोग भी बाबरी के टुकड़ों को स्मारक की तरह घरों में रखने के लिए छीनाझपटी कर रहे थे.

छह दिसंबर की दोपहर बाबरी मस्जिद के गुम्बदों के गिरने का समय दर्ज करते हुए, सन्निपात में चिघ्घाड़ते, बड़बड़ाते पागल हो गए लोगों के चेहरे देखते हुए, दंगे में जलते हुए घरों के बीच फैजाबाद की ओर किसी से उधार ली गई मोटरसाइकिल पर भागते हुए, खबर लिखते हुए, कारसेवकों की पिटाई के दर्द के सुन्न हो जाने तक पीते हुए मैं यही अपने मन में बिठाता रहा कि लोकतंत्र एक नाटक है, आदमी अब भी पत्थर युग जितना ही बर्बर है, देश में कुछ निर्णायक रूप से बदल चुका है, असल मुद्दों को दफन कर की जाने वाली शार्टकट धार्मिक जहालत की कुर्सी दिलाऊ राजनीति को सदियों लंबा नया मैदान मिल गया है...

मैं हैरान था क्योंकि इसी से जुड़ा एक व्यक्तिगत उपलब्धि जैसा भाव भी उमड़ रहा था- मैंने सभ्यता का खून पीते लंबे दांतो और टपकते पंजों वाले इतिहास को नंगधड़ंग अट्टहास करते देख लिया है.

अयोध्या आंदोलन के नेताओं के लिए न्यायपालिका नौटंकी कंपनी थी, उनका नारा था “बंद करो यह न्याय का नाटक, जन्मभूमि का खोलो फाटक”. बाद में साबित हुआ कि उनकी आस्था भी सत्ता पाने के लिए मंचित की गई नौटंकी थी जिसमें बच्चा-बच्चा राम का मंत्र और शंख फूंकने, श्राप देने वाले, बाबर की औलादों को पाकिस्तान भेजने वाले धर्माचार्य-साधु-साध्वियां कलाकार थे, जिसमें जितना अभिनय था वह उतना पद, सम्मान, मेहनताना वगैरा लेकर किनारे लगा.

कारसेवकों को भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डालने वाले बाबर से एतिहासिक प्रतिशोध का सुख भव्य राममंदिर के रूप में पाना था जिसे भुला दिया गया. फिर भी उनकी हिंसक आस्था का प्रेत भटकता रहा तो उन्हें भ्रष्टाचार का झंखाड़ काटकर विकास की सड़क बनाने में झोंक दिया गया. तब हिंदू खून को खौलाकर जवानी को रामकाज में लगाया गया था, अब उस जवानी की अगली पीढ़ी को एक आदमी की भक्ति में लगा दिया गया है. कमाल ये है- भगवान की जगह आदमी ले चुका है लेकिन खून का उबाल वही है

इस बीच चौथाई सदी बीत चुकी है जो आदमी की छोटी सी जिंदगी में इतना लंबा समय है कि उसे या तो अपने अनुभवों से कोई पक्का नतीजा निकाल लेना चाहिए या मान लेना चाहिए कि उसके दिमाग का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है.

तटस्थता पत्तरकारिता की सजावट है उससे भी अधिक पाखंड है.

First published: 7 December 2016, 4:43 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी