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एक जिला जहां 60 हजार लोगों ने छोड़ दिया घर

राजेंद्र राठौर | Updated on: 25 June 2016, 8:49 IST
(पत्रिका)

उत्तर प्रदेश के कैराना जिल से हुआ कथित पलायन राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में है लेकिन काम की तलाश में इस साल छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले से करीब 60 हजार ग्रामीणों ने अपना-अपना घर छोड़ दिया तो राष्ट्रीय मीडिया को भनक भी नहीं लगी. जाहिर है कथित पलायितों (वोटबैंक) की चिंता सबको है, व्यवस्था की खामियों से पीड़ित असली पलायन किसी की निगाह में नहीं आता.

छत्तीसगढ़ के ये लोग विदेश सहित देश के अंतिम छोर तक पलायन कर रहे हैं. इनमें से कुछ परिवार दीगर राज्यों में ही लंबे समय तक रूक जाते हैं, जबकि कुछ परिवार चार-छह महीने काम करने के बाद वापस अपने गांव लौट आते हैं. समस्या तब होती है जब ग्रामीण दीगर राज्यों में बंधक बनते हैं, तभी प्रशासन संज्ञान लेता है और बंधक बने परिवारों को छुड़ाने की कवायद शुरू होती है.

हाल ही में के ग्रामीणों को दिल्ली, हरियाणा, जम्मू, उत्तर-प्रदेश, मध्य-प्रदेश के ईंट भट्ठों में बंधक बना लेने के कई मामले प्रशासन तक पहुंचे हैं. इनमें कई लोग एक ही परिवार के सदस्य होते हैं.

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छत्तीसगढ़ का यह इलाका भले ही पॉवर हब के रुप में विकसित हो रहा है, लेकिन खरीफ फसल बर्बाद के चलते इस साल यहां के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन बढ़ गया है. स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिलने से परेशान मालखरौदा, जैजैपुर, बलौदा, पामगढ़ और नवागढ़ क्षेत्र के कई परिवार रोजगार की आस में विदेश सहित जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों में पलायन रहे हैं.

ग्राम उसलापुर, कोरबी, बुडग़हन, पामगढ़ ब्लॉक का सलखन, कुकदा, रिंगनी, मालखरौदा ब्लॉक के छोटे सीपत, बड़े रबेली, छपोरा, जैजैपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम ओड़ेकेरा, तुमीडीह, कलमीडीह सहित दर्जनों गांव ऐसे हैं, जहां के अधिकांश घरों के दरवाजे पर ताला जड़ा हुआ है. कुछ घर ऐसे हैं, जहां बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं की रह गई हैं.

सामने आ चुके हैं कई बड़े मामले

यहां से पलायन कर विदेश सहित देश के दीगर राज्यों में जाने वाले कई परिवारों के बेहद दर्दनाक मामले सामने आ चुके हैं. 

कुछ वर्ष पहले ग्राम महंत व आसपास के गांवों के दर्जनों परिवार लेह-लद्दाक में पलायन कर गए थे, जो वहां हुए भूस्खलन के शिकार हो गए थे. इनमें कई लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि ग्राम महंत, अमोरा सहित आसपास के करीब 30-35  लोगों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है. 

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इसी तरह, मालखरौदा और जैजैपुर क्षेत्र के 17 ग्रामीणों के मलेशिया में बंधक बनाए जाने संबंधी मामला राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा था. भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अथक प्रयासों जिन्हें वापस लाया गया था.

तैयार कराया जा रहा रिकार्ड

जिला पंचायत के सीईओ विश्वेश कुमार बताते हैं कि जिले से पलायन करने वाले परिवारों का रिकार्ड तैयार कराया जा रहा है.

जिले के सभी ग्राम पंचायतों के सचिव व कोटवारों को गांव में सर्वे कर पलायन करने वाले परिवारों का ब्यौरा तैयार कर जनपद पंचायत के माध्यम से जिला पंचायत को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं. प्रशासन भी दबी जुबान में इस साल जिले से हजारों लोगों के पलयान की बात को मान रहा है. 

कलेक्टर डॉ. एस भारतीदासन कहते हैं अब तक कई सूखा प्रभावित किसानों को राहत राशि का चेक नहीं बांटा जा सका है. वजह है कि उन्होंने यहां से कई परिवारों ने पलायन किया है.

नहीं मिली सूखा राहत की राशि

राज्य सरकार ने मुआवजा वितरण के लिए ऐसी शर्तों को बनाया था कि ज्यादातर सूखा प्रभावित किसान राहत राशि से बाहर हो गए. सयुक्त परिवारों में रहने वाले 25 एकड़ तक के कई छोटे किसान परिवारों की 20 से 30 फीसदी से ज्यादा फसल खराब होने पर भी उनका नाम राहत सूची में नहीं हैं.

जिले में 75 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास सिंचाई का कोई साधन ही नहीं हैं. इसमें भी जिनके पास सिंचाई के साधन थे, उन्होंने विभिन्न कारणों से अपने खेत में धान की खेती की सिंचाई न कर पाने का दावा किया था. मगर सरकार ने इस श्रेणी के किसानों को मुआवजा देने के मामले में कोई विचार ही नहीं किया, जबकि इस साल सूखे के चलते भू-जल स्तर काफी नीचे जाने से नलकूप काम नहीं कर रहे थे. 

वहीं, सिंचाई के दौरान बिजली आपूर्ति में भी भारी कटौती की गई थी. हालत यह है कि किसानों के पास खेतों में बोने के लिए तक बीज नहीं बचे. इसे देखते हुए अगले साल बुआई की उम्मीद पर भी पानी फिरता दिख रहा है.

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राज्य की रमन सिंह सरकार ने केंद्र नरेन्द्र मोदी सरकार से सूखा राहत के लिए छह हजार करोड़ रुपए मांगे थे. केंद्र ने 12 सौ करोड़ रुपए का राहत पैकेज आंवटित किया. राज्य सरकार ने करीब 800 करोड़ रुपए की राशि सूखा पीड़ित किसानों को मुआवजा बांटने के लिए रखी. 

विशेषज्ञों की राय में सूखा पीड़ितों के लिए सरकार की यह राशि वैसे ही बहुत कम है, उसमें भी इतनी बंदरबांट हुई है कि प्रदेश के लाखों पात्र किसानों तक राहत पहुंची ही नहीं है. कई इलाकों में किसानों ने लागत न निकलने के डर से अपनी फसलों को मवेशियों के हवाले कर दिया है.

नतीजा यह कि पूरे राज्य में ही कई जगहों पर भूख और पलायन पैर पसार रहा है. इसमें जांजगीर-चांपा जैसे गरीब जिलों की हालत तो बद से बदत्तर हो गई है.

First published: 25 June 2016, 8:49 IST
 
राजेंद्र राठौर @catchhindi

पत्रिका संवाददाता

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