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70 वर्षों के संघर्ष के बाद भी नहीं हुए 'स्वतंत्रता सेनानी'

शिरीष खरे | Updated on: 16 August 2016, 13:32 IST

वर्ष 2015 में अनंत नारायण महादेवन ने एक फिल्म बनाई थी, 'गौर हरी दास्तान- ए फ्रीडम फाइल'. यह फिल्म एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पर बनी थी जिन्होंने आजाद भारत में खुद को स्वतंत्रता संग्राम का सेनानी साबित करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम से भी लंबी लड़ाई लड़ी थी. इसके लिए उन्हें तीस वर्षों तक लंबा संघर्ष करना पड़ता था. ओडिशा में जन्मे गौर हरी दास गांधीवादी आंदोलन में शामिल हुए थे. 1945 में उन्होंने तिरंगा झंडा लहराया था और इसके कारण उन्हें दो महीने के लिए जेल की सजा भी दी गई थी.

आखिरकार भारत आजाद हुआ, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए वर्ष 1976 में आवेदन देने के 33 वर्षों बाद उन्हें 2009 में यह सम्मान मिला. उन पर आधारित इस फिल्म में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले विनय पाठक के अभिनय को सराहा गया. पेरिस फिल्म फेस्टिवल में विनय पाठक को बतौर अभिनेता पुरस्कृत भी किया जा चुका है.

ठीक गौर हरी दास की तरह ही रायपुर के एक गांधीवादी ने भी खुद को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने के लिए लड़ाई लड़ी है. फर्क यह है कि यह लड़ाई इतनी लंबी हुई कि आज वे सेनानी खुद अपनी जिंदगी की लड़ाई हार चुके हैं. 16 साल पहले वे खुद को प्रशासन के सामने आजादी का सिपाही साबित करते हुए दम तोड़ चुके हैं. फिर भी उनकी यह लड़ाई जारी है. आज उनकी बेटी उनके सम्मान और अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ा रही हैं. यह और बात है कि आजादी के 69 वर्ष पूरे हो जाने के बावजूद पिता और बेटी की पीड़ा सुनने वाला यहां कोई नहीं.

अनंत संघर्ष की यह कहानी है, 1942 में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए और 15 दिनों तक रायपुर की केंद्रीय जेल में सजा काट चुके थुकेलगिर गोस्वामी और उनकी बेटी कुंजी बाई गोस्वामी की. इसके अलावा भी उन्होंने कई आंदोलनों में भाग लिया. कई बार अंग्रेजों की लाठियों का सामना किया. देश को आजाद होते देखा और अंतत: 1999 में अपने जीवन की आखिरी सांस ली.

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जेल जा चुके थुकेलगिर गोस्वामी को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा जीते जी नहीं मिला

प्रशासन और सरकार से हारकर कुंजीबाई को न्याय के लिए हाल ही में हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. इसके बाद हाइकोर्ट ने राज्य शासन के छह आला अफसरों से इस संबंध में जवाब मांगा है. 1999 में पिता की मौत के बाद उनकी बेटी कुंजी बाई गोस्वामी लगातार प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं.

फिल्म "गौर हरी दास्तान- ए फ्रीडम फाइल" में जब अफसर द्वारा गौर हरी से कहा जाता है कि आपने उस समय ओडिशा में आजादी की लड़ाई लड़ी तो आपका प्रमाण-पत्र ओडिशा से ही जारी हो सकता है.

यही वाकया छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी हो चुका है. इस वाकये को लेकर कुंजी बाई गोस्वामी बताती हैं, '1998 में जब महासमुंद एक नया जिला बना तब भी पिताजी अपने सम्मान के लिए रायपुर में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे. इसके बाद एक दिन सरकारी अफसर ने उनसे कहा कि अब रायपुर से अलग होकर महासमुंद अलग जिला बना गया है तो यह मामला महासमुंद जिले में आता है. लिहाजा आप महासमुंद जिले के कलेक्टर से इस संबंध में बात कीजिए. तब मेरे पिताजी ने अफसर को साफ तौर पर कहा था कि मैंने यह लड़ाई आजाद भारत के लिए लड़ी थी, न कि सिर्फ रायपुर या महासमुंद जिले के लिए. इसके अगले वर्ष पिताजी की मौत हो गई.'

अब उनकी यह बेटी उनके बाद प्रदेश राजधानी रायपुर से लेकर महासमुंद जिले के सरकारी दफ्तरों में घूमती देखी जा सकती है.

जेल में दर्ज है उनका नाम और सजा की वजह

स्वतंत्रता संग्राम के समय रायपुर जेल में बंद सेनानियों की पूरी जानकारी रायपुर के केंद्रीय जेल में दर्ज है. जेल विभाग द्वारा जेल में बंद हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची 26 सितंबर, 1972 को प्रकाशित की जा चुकी है. इस सूची में थुकेलगिर गोस्वामी का नाम 322 नंबर पर दर्ज है.

इस सूची के आधार पर 1972 में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने अनुविभागीय अधिकारियों को पत्र जारी किया था. इसमें सेनानियों की सूची भी शामिल की गई थी. 30 सितंबर, 1972 को यह सूची रायपुर जिले से तब अविभाजित मध्य-प्रदेश राज्य शासन को भेजी गई थी.

1973 में प्रमाण-पत्र के लिए लिखा पत्र

थुकेलगिर गोस्वामी ने 13 अप्रैल, 1973 को रायपुर के तत्कालीन केंद्रीय जेल अधीक्षक को पत्र लिखकर सेनानी के तौर पर जेल में रहने का प्रमाण-पत्र मांगा था. इसके बाद दूसरे पत्र में उन्होंने लिखा कि जेल में उनके नाम का प्रमाण-पत्र महासमुंद के सेनानी लालाजी जैन के पास चला गया है. रायपुर के केंद्रीय जेल द्वारा इसका जवाब नहीं दिया गया. न ही उन्हें इसका प्रमाण-पत्र ही दिया गया.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को लेकर प्रशासन से चल रही लड़ाई को लेकर कुंजी बाई गोस्वामी ने न्याय की उम्मीद लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक भी अपनी बात पुहंचाई. प्रधानमंत्री कार्यालय ने 25 जुलाई, 2015 को रायपुर कलेक्टर को इस संबंध में पत्र लिखा और तुरंत कार्रवाई करने को कहा. इसके बावजूद इस मामले में अब तक कुछ नहीं हुआ.

दो बार गुम चुकी है फाइल

इस स्वतंत्रता सग्राम सेनानी को लेकर प्रशासनिक दफ्तरों में रखी फाइल एक टेबल पर ही सालों तक जमी रहती है. इसके बावजूद अफसरों द्वारा उनकी फाइल पर काम नहीं किया जाता. इस दौरान रायपुर तहसील कार्यालय से थुकेलगिर गोस्वामी की फाइल दो बार गुम हो चुकी है.

इसके बाद उनके परिवार से संपर्क करके फिर से सारे दस्तावेज मांगे जा चुके हैं. इसके बाद फाइल एक बार फिर एक ही स्थान पर रखी हुई है. प्रक्रिया आगे न बढ़ने से परेशान कुंजी बाई गोस्वामी ने अब क्योंकि हाइकोर्ट में अपनी अपील लगा दी है तो इस पूरे मामले को लेकर हाइकोर्ट ने प्रशासनिक अफसरों को अपना पक्ष रखने के लिए कहा है.

First published: 16 August 2016, 13:32 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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