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देश अभी व्यस्त है, उसे तमिलनाडु के बच्चों के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं

सिबी आरसू | Updated on: 23 February 2016, 8:08 IST
QUICK PILL
  • तमिलनाडु में साल 2009 से 2014 तक राज्य में कुल 16,183 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई. घरेलू हिंसा, यौन तस्करी और बंधुआ मजदूरी बच्चों के लापता होने के पीछे बड़ी वजह हैं.
  • कागजी तौर पर बाल कल्याण के लिए कई सरकारी और गैर सरकारी योजनाएं चल रही हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असर कम ही है. इन मामलों को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत है.

14 वर्षीय सुरेश जब वारंगल पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उनका कैस्ट्रेशन किया जा चुका था. उन्हें नया नाम तृषा दिया गया. उन्हें अगले तीन साल तक मुंबई में बंधुआ सेक्स वर्कर के रूप में रहना पड़ा. उसके बाद वो भागने में सफल रहे. जब वो चेन्नई पहुंचे तो सबको उनकी कहानी पता चली.

सुरेश मार्च, 2009 में घर से भागे थे. जब वो वारंगल पहुंचे तो दो हफ्ते तक सब ठीक रहा. अगर इस बीच उनके घर से गायब होने की खबर पर कार्रवाई की गई होती तो शायद वो उन यंत्रणाओं से बच जाते जो उन्हें झेलनी पड़ीं.

सुरेश के पिता ने उनके गायब होने के कुछ ही घंटों के अंदर चेन्नई के शेनॉय नगर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी थी. पुलिस ने एफआईआर तक नहीं लिखी. सुरेश वहां से बस 40 किलोमीटर दूर था. वो करीब एक हफ्ते बाद बाल तस्करों के हाथ लग गया.  पुलिस ने थोड़ी फुर्ती दिखायी होती तो सुरेश को बचा सकती थी.

अगर पुलिस कंट्रोल रूप से शहर के सभी थानों को बस एक एलर्ट भेज देती तो भी शायद सुरेश बच सकते थे. सुरेश के दोस्त उसे स्त्रैण होने का ताना देते थे. उसके टीचर भी उसे डांटते थे. इन सबसे तंग आकर वो घर से भाग गया. जिसकी उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

देश में सबसे अधिक बच्चे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में गायब होते हैं. तमिलनाडु में हर रोज औसतन नौ बच्चे गायब होते हैं

देश में बच्चों के गायब होने के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में होते हैं. तमिलनाडु को सामाजिक विकास के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में माना जाता है. हालांकि राज्य में हर रोज औसतन नौ बच्चों के गायब होते हैं. साल 2009 से 2014 तक राज्य में कुल 16,183 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई. इऩ से बहुत से बच्चों को पुलिस बरामद करने में सफल रही लेकिन सवाल ये है कि इतने बच्चे लापता होते क्यों हैं?

तमिलनाडु में बच्चों के गायब होने के पीछे सबसे बड़ी वजहों से एक है, घरेलू हिंसा. बच्चों के लिए एक एनजीओ चलाने वाली विद्या रेड्डी कहती हैं, "जो बच्चे वापस मिल जाते हैं उन्हें घर भेजने की रवायत के मैं खिलाफ हूं...सबसे पहले हमें ये जानना चाहिए कि वो घर से भागे क्यों. हो सकता है कि वो घरेलू हिंसा के शिकार हों? मुझे लगता है कि दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह 'हमारा घर' है, एक मजाक सा बन गया है."

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बच्चों के लापता होने के पीछे घरेलू हिंसा, सेक्स ट्रैफिकिंग और बंधुआ मजदूरी जैसे कई कारण हैं. बलि देने के लि बच्चों को अगवा करने जैसे वीभत्स मामले भी सामने आते हैं. ऐसा ही एक मामला चेन्नई के पांच साल के अब्दुल का है. एक स्थानीय ठेकेदार सलीम उसकी बलि देना चाहता था ताकि उसका कामकाज अच्छा चलने लगे.

दो साल पहले हुई इस घटना के बारे में अब्दुल के भाई लतीफ ने बताया, "ठेकेदार ने उसे दो महीने तक अपने घर में बंद रखा. उसके बाद पड़ोसियों को इसका पता चला. जब ठेकेदार घर से बाहर था तो उन्होंने उसे आजाद कराया और पुलिस को सूचित किया." लतीफ ने बताया, "खुदा का शुक्र है कि उसे कुछ नहीं हुआ."

एक ज़िला बाल कल्याण अधिकारी(डीसीपीओ) ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, "हमारा काम बच्चों को बचाना और उनका पुनर्वास कराना है. हमारे काम में बहुत मुश्किलें आती हैं. हम जिन बच्चों को लाते हैं उनमें से करीब 70 प्रतिशत के परिवार वाले उन्हें वापस नहीं लेना चाहते."

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अधिकारी ने बताया, "बच्चों को सड़क पर छोड़ देने के पीछे एकमात्र वजह भयानक गरीबी होती है. ये परिवार बच्चों को पालने में सक्षम नहीं होते. इनमें से बहुत से बच्चे चेन्नई के मरीना बीच या स्थानीय रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिए गए होते हैं."

वो कहते हैं, "जब हमें कोई बच्चा मिलता है तो हम उसे कुछ दिन रिसेप्शन युनिट में रखते हैं. उसके बाद ये तय किया जाता है कि उसे उसके घर भेजा जाए या कल्याण गृह."

आधिकारिक तौर पर लापता बच्चों की मदद के लिए बहुत से तरीके हैं. इससे जुड़े विभागों की भी कमी नहीं है. बच्चों के लिए विशेष हेल्पलाइन नंबर(1098) भी बनाया गया है. ट्रैकमिसिंगचिल्ड्रेन डॉट जीओवी डॉट इन और खोयापाया डॉट जीओवी डॉट इन जैसी कई वेबसाइटें भी इसमें सरकार की मदद करती हैं. सरकार 'मुस्कान' जैसे बहुप्रचारित कार्यक्रम भी चलाती है.

वर्ल्ड विजन इंडिया, सेव द चिल्ड्रेन और तमिलनाडु चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी(टीएनसीआरओ) जैसे कई एनजीओ भी बच्चों की मदद के लिए काम करते हैं. फिर भी कागजी और जमीनी सच्चाई में काफी अंतर नजर आता है.

टीएनसीआरओ के एंड्रू सेसुराज कहते हैं, "अगर ऐसे मामलों से समय पर निपटा जाए तो 'मुस्कान' जैसे कार्यकर्मों की जरूरत नहीं पड़ेगी."

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तोज़ामाई नामक एनजीओ चलाने वाले देवानयन आरसु पिछले दो दशकों से बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "सरकार ने इस दिशा में काम करने के लिए कई अनोखी योजनाएं शुरू की हैं. जैसे, गांव स्तरीय विलेज वाचडॉग कमेटि(वीएलडब्ल्यूसी) ताकि गांव के हर बच्चे की निगरानी की जा सके. और ये सुनिश्चित किया जा सके शिक्षा के अधिकार के तहत स्कूल भेजा जा सके."

वीएलडब्ल्यूसी में एक नर्स, गांव का मुखिया, स्थानीय टीचर, एक पुलिसवाला और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं. उन्हें हर तीसरे महीने जिला मुख्यालय को ग्राउंड रिपोर्ट भेजनी होती है. जो फिर सामाजिक रक्षा विभाग को भेज दी जाती है.

एक बाल कल्याण जिला अधिकारीः हम जिन बच्चों को लाते हैं उनमें से करीब 70 प्रतिशत के परिवार वाले उन्हें वापस नहीं लेना चाहते

तोज़ामाई कहते हैं, "इनमें से कोई भी योजना जमीन पर पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो रही है. अगर ऐसा होता तो गायब होने वाले बच्चों की तुरंत ही पहचान हो जाती और उन्हें बरामद कर लिया जाता. स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एससीपीआरसीआर) जैसे स्वतंत्र संस्थाओं के प्रमुख सत्ताधारी पार्टी से जुड़े लोगों को बनाया जाता है ताकि राज्य सरकार को इसके लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सके. लेकिन इसका भी क्या नतीजा रहा?"

तमिलनाडु एससीपीआरसीआर का इस समय कोई प्रमुख नहीं है. संगठन के पूर्व प्रमुख सरस्वती रंगास्वामी सत्ताधारी एआईएडीएमके के दक्षिण चेन्नई जिला सेक्रेटरी हैं. उन्होंने अक्टूबर, 2014 में जयललिता की रिहाई के लिए सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया था.

डीएके के राज्य सभा सांसद के कनीमोई को भी लगता है कि इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. वो कहती हैं, "लोगों को इस मुद्दे की गंभीरता को समझना चाहिए. इससे निपटने के लिए अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना होगा ताकि गायब होने वाली बच्चों की संख्या में कमी लायी जा सकी."

बाल अधिकार कार्यकर्ता और वकील अनंत कुमार अस्थाना कहते हैं, "बच्चों के अभिभावक अक्सर एक शिकायत करते हैं कि 'पुलिस कहती है कि अगर तुम पाल नहीं सकते तो बच्चे पैदा क्यों करते हो?'"

(सभी बच्चों के नाम बदल दिए गए हैं.)

(सिबी आरसू चेन्नई स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं. ये लेख पीआईआई-यूनिसेफ की 'बिल्डिंग ए वॉयस फॉर चिल्ड्रेन' फेलोशिप के सहयोग से लिखा गया है.)

First published: 23 February 2016, 8:08 IST
 
सिबी आरसू @CatchHindi

चेन्नई स्थित स्वतंत्र पत्रकार

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