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40 दिनों की लुका-छिपी के बाद नागा विद्रोहियों के हमले की योजना विफल

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 2 June 2016, 7:57 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • 23 मई को मणिपुर में अलगाववादी विद्रोहियों के हमले में असम राइफल्स के एक जूनियर कमिशंड ऑफिसर और पांच अन्य जवानों की मौत हो गई.
  • हमले के करीब हफ्ते भर पहले एक अन्य हमले को टालने में जवानों को सफलता मिली. करीब 40 दिनों की लुका-छिपी के बाद नागालैंड की पहाड़ियों में सुरक्षा बलों ने विद्रोहियों के संभावित हमले को पूरी तरह से टाल दिया. 
  • पिछले साल मणिपुर की तरह आंतकी एक  बार फिर से घात लगाकर हमला करने में विफल रहे. लेकिन हालिया हमले की कोशिश विद्रोही संगठन के बीच पनप रही हताशा का नतीजा है. विद्रोहियों को सेना को निशाना बनाने में सफलता नहीं मिल पा रही है.

23 मई को मणिपुर में अलगाववादी विद्रोहियों के हमले में असम राइफल्स के एक जूनियर कमिशंड ऑफिसर और पांच अन्य जवानों की मौत हो गई. हमले के करीब हफ्ते भर पहले एक अन्य हमले को टालने में जवानों को सफलता मिली. 

आखिरकार नागालैंड की पहाड़ियों में सुरक्षा बलों और म्यांमार के हथियारबंद विद्रोहियों के बीच चल रही लुका-छिपी करीब 40 दिनों  बाद खत्म हो गई है. 

पिछले साल मणिपुर की तरह आंतकी एक  बार फिर से घात लगाकर हमला करने में विफल रहे. लेकिन हालिया हमले की कोशिश विद्रोही संगठन के बीच पनप रही हताशा का नतीजा है. विद्रोहियों को सेना को निशाना बनाने में सफलता नहीं मिल पा रही है. पहले हमले में नागा आतंकी शामिल रहे जबकि दूसरे हमले में मणिपुर के विद्रोही शामिल थे. 

कैसा रहा ऑपरेशन

सेना मुख्यालय के सूत्रों के मुताबिक प्रतिबंधित एनएससीएन के करीब 20 से अधिक विद्रोही 8 मार्च की सुबह किफायर से नागालैंड में घुसे. इनकी कमान मेजर कुगहितो सेमा, मेजर अकाहो और कैप्टन नसाका के हाथों में थी. ब्रिगेडियर निकी सुमी ने हमले के लिए इन आतंकियों का चयन किया था जो नागा विद्रोही संगठन के डिप्टी कमांडर इन चीफ हैं.

किफायर की सीमा के पास सेना के सेलफोन से पहला कॉल किए जाने के बाद खतरे की चेतावनी दी गई. इसकी जानकारी गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली एजेंसियों को मिली. खतरे की चेतावनी के तत्काल बाद ही जमीनी सूत्रों को इसकी सूचना दी गई. लेकिन विद्रोही समूहों के मूवमेंट की कोई खुफिया खबर नहीं मिल पाई.

इसके  बाद एनआईए ने सेना और असम रायफल्स के जवानों को सूचना दी. कुछ ही घंटों के भीतर विद्रोेहियों की योजना को धाराशायी करने के लिए जून्हेेबोतो में अधिकारियों की बैठक हुई.

नई दिल्ली के एक अधिकारी ने बताया, '5 असम राइफल्स और 12 पैरा के करीब 400 अधिकारियों को ऑपरेशन में लगाया गया. सभी एजेंसियों के बीच लगातार सूचनाओं को साझा किया जा रहा था. वहीं विद्रोहियों के लिए मुश्किल थी क्योंकि उन्हें घुसपैठ भी करना था और फिर योजना के मुताबिक हमला करना था. इसके अलावा उन्हें कई स्तर के सुरक्षा घेरे को भी तोड़ना था.'

सियोचांग में दो दिनों की कैंपिंग के बाद आतंकियों ने अचिकुचु की तरफ जाने का फैसला किया. यह सब कुछ 13 मार्च को हुआ. हालांकि आतंकियों ने खुद ही सुरक्षा बलों के काम को आसान कर दिया. 

नागालैंड में विद्रोही संगठन में काम कर रहे विद्रोही के मुताबिक आंतकियों को उस वक्त बड़ा झटका  लगा जब म्यामांर से आने वाले 10 सदस्य अचानक लापता हो गए. उन्होंने बताया कि विवाद की वजह एनएससीएन के की तरफ से ऑपरेशन के लिए दी जाने वाली रकम की साझेदारी थी.

बड़े विद्रोही नेताओं को करीब 50,000 रुपये मिलने थे जबकि छोटे काडरों को कुछ रुपये मिलने थे. उन्होंने बताया कि  कुछ विद्रोही अचिकुचू में पार्टी करने चले गए, जिसके बाद बड़े नेताओं ने इस बारे में सुरक्षा एजेंसियों को इतिला दे दी.

एनआईएस और सेना के बीच बेहतर को-ऑर्डिनेशन से हमले को टाला जा सका

एनआईए की तरफ से चेतावनी दिए जाने के बाद सेना और असम राइफल्स के जवानों ने गांव को घेर लिया लेकिन विद्रोही सेना को चकमा देकर  भागने में सफल रहे. बाद में विद्रोहियों ने जुनहेबोटो नगर में हमले की योजना बनाई.

विद्रोही संगठन के विद्रोही ने बताया कि विद्रोही अपनी योजना को अंजाम दे पाते, उससे पहले सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक लग गई और फिर उन्हें दूर गांव की तरफ भागना पड़ा.

बाद में विद्रोही संगठन ने हमले की योजना को टाल दिया. सुरक्षा एजेंसियों को मिली जानकारी के मुताबिक विद्रोही 18 अप्रैल को म्यामांर से भारत में घुसे थे.

शानदार को-ऑर्डिनेशन

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने एनआईए और सेना के बीच सूचनाओं की सटीक साझेदारी को कामयाबी की वजह बताया. एजेंसी को लगातार जमीन से सूचनाएं मिल रही थी जिसे लगातार सभी एजेंसियों के बीच साझा किया जा रहा था.

अधिकारी ने बताया कि ऑपरेशन के पांच हफ्तों के दौरान किसी भी नागरिकों को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. अन्य विद्रोही संगठन के सूत्रों के मुताबिक हमले की योजना फरवरी के महीने में म्यामांर में बनाई गई थी. इसके बाद कमांडर इन चीफ कुमचोक पैंगमेई ने डिप्टी ब्रिगेडियर निकी सुमी को हमले की योजना बनाने का निर्देश दिया.

सूत्र ने कहा कि विद्रोही संगठन को हमले की जगह के बारे में सटीक जानकारी नहीं थी. पूरा मामला म्यांमार के विद्रोही संगठन सैगिंग डिविजन की हिंसा की याद दिलाता है. नायपीता हालांकि अपनी जमीन पर विद्रोहियों के होने से साफ साफ इनकार करता रहा है. जबकि नई दिल्ली इस बारे में म्यांमार को बार बार जानकारी देता रहा है.

पिछले सात सालों में कई बड़े विद्रोही नेता बाहर आकर सरकार से बातचीत कर संभावनाओं को तलाशन में जुटे हुए हैं. 

First published: 2 June 2016, 7:57 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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