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उभरते दक्षिणपंथ और अप्रासंगिक वामपंथ के बीच जमीन बचाने की जद्दोजहद

हर्षवर्धन त्रिपाठी | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • दक्षिणपंथ की गलती ये रही कि कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके पूरे जवाहर \r\nलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर सवाल खड़ा कर दिया गया.
  • वामपंथ को ये गलती कतई नहीं करनी चाहिए कि वो सिर्फ बौद्धिक लड़ाई के जरिए \r\nदक्षिणपंथी सरकार की कमियां निकाले. अगर ये हो पाता, तो नरेंद्र मोदी देश \r\nके प्रधानमंत्री ही नहीं होते.

सुप्रीमकोर्ट ने पटियाला हाउस से सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जमानत के लिए पहुंचे कन्हैया कुमार को झटका दे दिया. जमानत की अर्जी उच्च न्यायालय में दाखिल करने की सलाह दी.

कन्हैया के वकीलों ने कन्हैया को मारने-पीटने की घटना के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय से जमानत याचिका पर सुनवाई की अपील की थी. मारपीट की घटना पटियाला हाउस यानी निचली अदालत में हुई थी. ये शर्मनाक घटना लगातार दो बार होने और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इस शर्मनाक घटना की समझ लेने गए वकीलों के बयान ने स्थिति इतनी बिगाड़ी कि सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जवाब तलब कर लिया.

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इस जवाब तलबी ने कन्हैया कुमार के समर्थकों, वकीलों को ये भरोसा दिया होगा कि सर्वोच्च न्यायालय शायद पहली फुर्सत में जमानत दे दे. लेकिन, हुआ उल्टा.

यहां पहली बार वामपंथ ने गलती की शुरुआत की. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके दक्षिणपंथ पहले ही बड़ी गलती कर चुका है, जिसको सुधारने का रास्ता अब तक सही तरीके से शायद दक्षिणपंथ और उनकी सरकार को नहीं सूझ रहा है. शायद इसीलिए फिलहाल राष्ट्रीय ध्वज को देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में फहराने का निर्देश देकर अपने समर्थकों को ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गई है कि सरकार दक्षिणपंथ से जरा सा भी सरकने वाली नहीं है.

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके दक्षिणपंथ पहले ही बड़ी गलती कर चुका है

ये भरोसा दिलाने की जरूरत शायद इसलिए पड़ गई क्योंकि, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने दबी जुबान में चल रही उस अफवाह को भी शुक्रवार को ही आवाज दे दी है. गुलाम नबी आजाद कह रहे हैं कि जम्मू कश्मीर में भाजपा, पीडीपी के साथ सरकार बनाने के लिए उमर खालिद और भारत विरोधी नारेबाजी करने वाले दूसरे कथित कश्मीरी छात्रों को गिरफ्तार नहीं कर रही है.

JNU Student

उनकी बात में कुछ तो भरोसा किया ही जा सकता है. सरकार की तरफ से अनौपचारिक तौर पर ये खबरें खूब आ रही हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकवादियों के समर्थन में और भारत के खिलाफ नारे लगाने वालों को पकड़ने के लिए ढेर सारी टीमें बनाई गई हैं. लेकिन, ये भरोसा कोई क्यों कर करेगा कि जिस मोदी सरकार की नजर हर जगह है, वो भारत विरोधी नरेबाजी करने वाले तमाम छात्रों पर नजर नहीं रख सकी.

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यह तब औऱ गंभीर मसला बन जाता है जब आतंकवाद समर्थक और भारत विरोधी नारे के आधार पर ही जेएनयू की पूरी बहस शुरू हुई है. इसी गतिविधि के साथ खड़े दिखने की वजह से तो कन्हैया को गिरफ्तार किया गया था. फिर कन्हैया कुमार को कथित राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तार तक कर लिया गया और उमर खालिद और दूसरे आरोपियों की सरकार को भनक तक नही है. इसे सिर्फ दिल्ली पुलिस की असफलता कौन मानेगा? मानना भी नहीं चाहिए.

दक्षिणपंथ की गलती ये रही कि कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके पूरे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पर सवाल खड़ा कर दिया गया. हालांकि, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रेस रिलीज जारी करके साफ किया है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा पर कोई सवाल नहीं है. लेकिन यह सफाई बहुत देर से आई.जब यह सफाई आई तब तक विद्यार्थी परिषद के तीन कार्यकर्ताओं ने परिसर के माहौल में खुद को अलग-थलग देखकर परिषद से इस्तीफा दे दिया था.

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परिषद की सफाई यह है कि ये कार्यकर्ता बिल्कुल नए हैं. जब सीधे-सीधे पाले खिंच गए हों तब तीन की संख्या घटने का नुकसान बहुत बड़ा होता है. यह परिषद की नैतिक हार भी है कि आपके पाले का कोई अलग होकर विपक्षी के पाले में खड़ा हो जाय.

इस पूरे विवाद में सरकार की कोशिश जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की वारदात के जरिए पूरे वामपंथ की देशनिष्ठा पर सवाल खड़ा करने की रही. बौद्धिक वर्ग में भले अभी लड़ाई बराबरी की दिख रही हो, लेकिन जमीन पर देश विरोधी के तौर पर वामपंथी कुनबे की पहचान पक्की होने का खतरा बढ़ गया है.

दिल्ली पुलिस ने बिना किसी पक्के सबूत के राष्ट्रद्रोह के आरोप में एआईएसएफ के कन्हैया कुमार को गिरफ्तार न किया होता तो यह पहचान और पुख्ता हो जाती. इस गिरफ्तारी के बाद दोनों तरफ से जो वीडियो आए उसमें पहले फर्जी वीडियो के जरिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए दिखाया गया. यह फर्जी साबित हुआ.

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इसके बाद राष्ट्रवाद समर्थकों ने वामपंथ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इसके बाद एक वीडियो में कन्हैया को देशद्रोह के नारे लगाने वाला वीडियो दिखाया गया. वह भी पूरी तरह से गलत साबित हो गया. इससे वामपंथियों को हमलावर होने का मौका मिला.

कन्हैया के नारे देश विरोधी नहीं थे, वो नारे वो थे जो, वामपंथी छात्र संगठन नियमित तौर पर लगाते ही हैं. इससे यह बात तय हो गई कि दिल्ली पुलिस ने गलत बुनियाद पर कन्हैया को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन, इसी वीडियो से ये भी लगा कि उमर खालिद और कन्हैया कुमार का आपस में गठजोड़ है.

अब वामपंथ इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करके सरकार को गलत साबित करने की कोशिश में लगा है. लेकिन, ये वामपंथ के लिए बड़ी गलती साबित होती जा रही है. क्योंकि, खुद वामपंथी नेता भी कम से कम देशद्रोह के मुद्दे पर उमर खालिद के साथ सार्वजनिक तौर पर खड़े नहीं हो रहे हैं.

कन्हैया के नारे देश विरोधी नहीं थे, वो नारे वो थे जो वामपंथी छात्र संगठन नियमित तौर पर लगाते हैं

ये खतरा शायद वामपंथ समझ नहीं पा रहा है. सरोकार-सरोकार का नारा लगाते वामपंथी हिंदुस्तान में कब सिर्फ दिखावे भर के सरकार विरोधी भर रह गए, उन्हें भी नहीं पता चला. वामपंथियों को ये भी नहीं समझ आया कि वो हर बात पर मोदी का विरोध करते रहे. कांग्रेसी सरकार चलाने के मौके पाते रहें तो, उन्हें इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि मीडिया भ्रम फैलाता रहे कि सरकार उन्हीं की वजह से चल रही है. भाजपाई नेता ऐसा नहीं कर पाते हैं.

वामपंथ को ये गलती कतई नहीं करनी चाहिए कि वो सिर्फ बौद्धिक लड़ाई के जरिए दक्षिणपंथी सरकार की कमियां निकाले. अगर ये हो पाता, तो नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री ही नहीं होते. किसे नहीं याद है कि देश के बहुतायत वामपंथी पत्रकारों, लेखकों, साहित्यकारों ने चुनाव के पहले घोषित तौर पर मोदी के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में देश छोड़ने की चेतावनी जारी की थी.

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भुखमरी से आजादी जैसे नारे लगाकर जेएनयू और कुछ विश्वविद्यालयों में हो सकता है कि वामपंथ की छात्र राजनीति चमकती रहें. लेकिन, सच्चाई यही है कि विश्वविद्यालय से निकलने के बाद हर नौजवान समझ जाता है कि अपनी जेब भरी रहेगी, तभी भुखमरी से आजादी से मिल सकेगी. यह सब नारों से नहीं होगा. वामपंथ को अब इस बड़ी गलती को सुधारने की जरूरत है. खोखले नारों की बुनियाद पर अब देश के नौजवान को बहकाना मुश्किल है. ये वामपंथ को समझना होगा.

वामपंथ, कांग्रेस के साथ संसद ठप कर रहा है. नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों को निकालकर उसके होने-न होने पर जनमत तैयार करना चाहता है. लेकिन अब तक उनकी ओर से एक भी ऐसा आंदोलन नहीं दिखा जो सरोकारों के आधार पर इस सरकार को घेरता हो. वामपंथ की गलतियां बड़ी होती जा रही हैं. पहले की गलतियों ने वामपंथ को भारत में लगभग खत्म कर दिया है.

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दक्षिणपंथी सरकार ने एक गलती कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके कर दी और मृतप्राय सीपीआई को एक अवसर मिल गया. क्या सीपीआई इस मिले अवसर को भुना पाएगा, यह सवाल बहुत बड़ा है. दक्षिणपंथ-वामपंथ की ये लड़ाई सड़कों पर, विश्वविद्यालय परिसरों में अभी और बढ़ेगी. क्योंकि, दक्षिणपंथ को ये लग रहा है कि यही मौका वामपंथ को पूरी तरह से खत्म कर देने का. वामपंथ को लग रहा है कि अब खोने को बचा ही क्या है.

First published: 20 February 2016, 8:17 IST
 
हर्षवर्धन त्रिपाठी @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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