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'आधा मुस्लिम आधा पारसी होकर भी कभी अल्पसंख्यक नहीं महसूस किया'

रूमी नक़वी | Updated on: 25 March 2016, 20:29 IST

पारसी जोरास्ट्रियन कल्चर के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम द एवरलास्टिंग फ्लेम के उद्घाटन समारोह में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, "पारसी ऐसे अल्पसंख्यक हैं, जो ख़ुद को अल्पसंख्यक नहीं महसूस करते."

मैं दोहरा अल्पसंख्यक हूं. मेरे पिता शिया मुसलमान हैं और मेरी मां पारसी हैं. तकनीकी तौर पर मैं भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों में भी 'अल्पसंख्यक' हूं. पारसी के तौर पर मैं देश के 70 हज़ार पारसियों में से एक हूं.

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ख़ुद को अल्पसंख्यक समझने का पूरा हक़ होने के बावजूद मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया. हो सकता है कि इसका संबंध दिल्ली में मेरी जिस तरह से परवरिश हुई उससे हो या फिर मेरे स्कूल या घर के माहौल से. मैंने कभी अल्पसंख्यक के रूप में उत्पीड़ित महसूस नहीं किया. कभी किसी ने मेरा मज़ाक नहीं उड़ाया. न ही किसी ने मुझे 'अल्पसंख्यक' होने को अहसास नहीं कराया.

मेरी पढ़ायी लिखायी भारतीय विद्या भवन में हुई जहां ज्यादा 'हिंदू छात्रों' की संख्या ज्यादा थी. 12वीं में मेरी क्लास में कुल 135 छात्र थे जिनमें से मेरे समेत तीन मुस्लिम, तीन-चार सिख, कुछेक ईसाई, कुछ जैन थे. हमारी क्लास में कोई यूहूदी और बौद्ध नहीं था. और मुझे जोड़ लें तो क्लास में एक आधा-पारसी था.

तभी 1984 और 1992 घटित हुआ. 1984 में मेरी उम्र करीब 13 साल थी. मैंने तब सड़कों पर जलते हुए टायर और जलती दुकानें देखीं

फिर भी मैंने खुद को कभी अल्पसंख्यक नहीं महसूस किया, न ही मेरे टीचर, अभिभावकों या साथियों ने मुझे कभी असुरक्षित महसूस कराया.

हमारा परिवार दक्षिणी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहा है. माथुर, गर्ग, नानिया(कूर्ग के), ओवैसी, सिराजीज, चतुर्वेदी, सक्सेना, जैन, त्यागी, नोरोनहास और रजा जैसे हमारे पड़ोसी हुआ करते थे.

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मेरे पिता के दोस्तों में शर्मा, बहल, भटनागर, भाटिया, कार, अवस्थी और काजमी शामिल थे. ढेर सारे हिंदू परिवारों के अलावा हमारे कुछ मुस्लिम और सिख पारिवारिक मित्र थे. हमारे पारिवारिक मित्रों में कोई भी पारसी परिवार नहीं था.

सच कहूं तो लंबे समय तक मैं अपनी धार्मिक या सामुदायिक पहचान से अनजान रहा. मुझे इसका अहसास नहीं होता था कि मेरे आसपास ज्यादातर हिंदू रहते हैं और मैं मुस्लिम-पारसी अल्पसंख्यक हूं. जबकि हम अपने धर्म और धार्मिक समारोहों से दूर नहीं रहते थे.

तभी 1984 और 1992 घटित हुआ. 1984 में मेरी उम्र करीब 13 साल थी. मैंने तब सड़कों पर जलते हुए टायर और जलती दुकानें देखीं.

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हमारे पड़ोस में एक सिख परिवार था. उनके यहां हाल में जुड़वां बेटियां हुई थीं. हम सब रतजगा करके निगरानी रखते थे ताकि कोई अनहोनी न हो.

इसी तरह 1992 में हुई घटनाओं ने बड़ा झटका दिया. उन्होंने वैसा ही दर्द दिया जैसा 2002 ने दिया. फिर भी अल्पसंख्यक होने के लेकर मेरे अंदर असुरक्षा की भावना नहीं आयी.

1992 और 2002 में हुई घटनाओं के बाद भी मेरे अंदर असुरक्षा की भावना नहीं आयीः रूमी नक़वी

मैं हाल ही में मुंबई गया था. मेरे दो स्कूली दोस्त राजीव गौड़ और सत्यजीत शर्मा मुझे लेने आए. दोनों में इस बात को लेकर नोंक-झोंक हुई कि मैं किसके घर रुकूंगा.

अभी हाल ही मैं एक अंतरराष्ट्रीय अनुवाद सम्मेलन में पहली बार असम गया था. वहां मैं द्विजेन शर्मा से मिलने गया. जो कभी मेरे छात्र रहे थे. हम 20 साल बाद मिल रहे थे. उन्होंने मुझे अपने घर पर रखा. फिर मेरी सहकर्मी रूपम हजारिका और मेरे पूर्व छात्र जॉयदीप हजारिका ने मुजे गुवाहाटी घुमाया. इन सभी लोगों ने एक व्यक्ति के रूप में मुझे अत्यधिक सम्मान दिया है.

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गुवाहाटी की यात्रा मेरे लिए एक और तरह से काफी खास रही. मैं बहुत सालों बाद ट्रेन के स्लीपर क्लास में यात्रा की थी. अपने सहयात्रियों के पूछने पर मैंने बेहिचक अपना नाम बताते हुए बताया कि मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अंग्रेजी पढ़ाता हूं. मुझे अपनी पहचान छिपाना पसंद नहीं, न ही मैं इसकी कोई जरूरत नहीं महसूस करता.

मैं कोई राजनीतिक बयान नहीं दे रहा. मैं ऐसे कई अल्पसंख्यकों को जानता हूं जो असुरक्षित महसस करते हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं महसूस नहीं करता.

मेरा मानना है कि जो अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं उन्हें भी ऐसा नहीं महसूस करना चाहिए क्योंकि ये उन्हें अंदर से कमजोर बनाता है. असली शक्ति अपने अंदर के भय पर विजय पाने से मिलती है. असली ताकत हमें खुद को अंदर को कमजोर नहीं होने देने से मिलती है.

इसी के साथ सभी को नवरोज 2016 की हार्दिक शुभकामनाएं.

First published: 25 March 2016, 20:29 IST
 
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