Home » इंडिया » A man from Kalahandi, Odisha travelled 12 KM with dead body of her wife
 

कर्महीन संवेदना का हाहाकार: यह पाखंड ही हमारा प्रमुख सामाजिक चरित्र है

अनिल यादव | Updated on: 26 August 2016, 14:56 IST

यह अकाल, भुखमरी और लड़कियों के बिक्री के लिए बदनाम कालाहांडी की सड़क पर बनाया गया एक वीडियो है. एक आदिवासी दाना मांझी अस्पताल में मरी अपनी बीवी की लाश को चरी के बोझ की तरह उठाए कंधे बदलता चला जा रहा है, उसकी बेटी का दिल कमजोर वॉशर वाला हैंडपंप है जिससे दुख छलक आता है, किनारे दर्शक खड़े हैं जो हृदयविदारक पौराणिक कहानियों से सेल्फी युग तक फैले नियति के ट्रैक पर जारी मैराथन दौड़ देख रहे हैं.

रोहित के दलित दर्जे के लिए लड़ेगा उनका परिवार

एक, दो या तीन नहीं कुल 12 किलोमीटर तक यह दृश्य चला. यह दृश्य देखकर लोगों की संवेदना को हिस्टीरिया हो गया है, वे समाज, लोकतंत्र, संविधान, देश और खत्म होती आदमियत को धिक्कार रहे हैं. सबसे अधिक गालियां उसे दी जा रही हैं जिसके हाथ में कैमरा था- क्या वह पत्रकारिता या फैसबुक की क्रूर नौटंकी के मंचन के बजाय उसे अपनी गाड़ी से घर तक नहीं पहुंचा सकता था? दरअसल ऐसा करना बहुत आसान भी है, बस फेसबुक, ट्विटर पर कुछ बटन टिपटिपाने है, बाकी का काम शब्द और चिन्ह (स्माइलीज) अपने आप कर लेंगे.

इस वीडियो से अधिक संवेदनशीलता और मानवता के लोप पर सिर पटकता हाहाकार आतंकित करने वाला है, इसमें आश्चर्य मिश्रित नाटकीयता है, जैसे लाखों करुणा कातर लोग पहली बार ऐसा कुछ देख रहे हैं.

कुछ दिन पहले गुवाहाटी की सड़क पर मारी जाती एक मादरजात नंगी आदिवासी लड़की दिखी थी, राजस्थान में कुछ औरतें जूतियों में पानी पी रही थीं, तब भी यही धिक धिक का कोरस था.

इस वीडियो से अधिक संवेदनशीलता और मानवता के लोप पर सिर पटकता हाहाकार आतंकित करने वाला है

कौन सा ऐसा शहर है जिसमें कम से कम एक ऐसा नर्सिंग होम नहीं है जहां बिल बनाने के लिए मुर्दों का इलाज किया जाता है और पाई-पाई चुकता करने पर ही बंधक लाश दी जाती है, कौन सी ऐसी कचहरी है जिसमें वकील और जज मिलकर गरीब मुवक्किल को पीढ़ियों तक नहीं निचोड़ते हैं, क्या ऐसे दफ्तर नहीं है जहां गरीब मर जाने तक दौड़ाए जाते हैं, क्या हमारे आसपास ऐसे भोज नहीं होते जहां वे जूठन बीनते हैं, क्या हमने ऐसे मंदिर और श्मशान नहीं देखे जहां गरीबों को दक्षिणा के लिए अपमानित किया जाता है, क्या हमारे पड़ोस के किसी घर से रात गए किसी औरत की रूलाई की आवाज नहीं आती.

विरोधाभासों की धरती: 17.20 करोड़ गरीबी रेखा के नीचे और अमीरों के मामले में सातवें पायदान पर

सब कुछ जानते हुए भी हर बार मशीन की तरह अचानक अबोध आश्चर्य से भर कर धिक्कारने लग जाना भयावह है क्योंकि जागे हुए को नहीं जगाया जा सकता. दिन ब दिन और लोग सुविधानुसार जागृति और निद्रा की कला में प्रवीण होते जाते हैं.

दाना मांझी और उसकी बेटी के लाश के साथ बारह किलोमीटर के सफर में जो मूक दर्शक बन कर खड़े थे उन्हें संदेह का लाभ जरूर दिया जाना चाहिए. हो सकता है वे इस उलझन में खड़े रह गए हों कि यह अविश्वसनीय घटना सच है या पैसों के लिए रचा गया स्वांग.

दिल्ली में जच्चा का कपड़े से फूला पेट दिखाकर, मुंबई में किराए के बच्चे को भूखा रखकर, लखनऊ में बच्चे के सिर पर रंग पुती पट्टी लपेट कर, कलकत्ते में किसी पियक्कड़ को कफन उढ़ाकर या अपने अंगों पर केमिकल लगाकर चमड़ी चरका देने वालों की भी कमी नहीं है.

लेकिन एक बात पक्की है कि सिहरा देने वाली अमानवीय घटनाएं और उनका स्वांग दोनों अमीर-गरीब के बीच चौड़ी होती खाईं, समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और हदें पार करती खुदगर्जी की देन हैं.

दिन ब दिन और लोग सुविधानुसार जागृति और निद्रा की कला में प्रवीण होते जाते हैं

दुखद यह है कि समाज में फैलती खुदगर्जी और अमानवीयता के सबसे आम नजारे ऐसे हैं जिनमें संदेह की गुंजाइश नहीं है. धर्मप्राण लोग गंगा को मां मानते हैं लेकिन कचरे और लाशों से निरपेक्ष डुबकी लगाकर पाप धोते हैं, महिलाओं को छेड़ा जाते देख कर आंखे फेर लेते हैं, सड़कों पर घायल घंटो मर जाने तक पड़े रहते हैं, हर दिन किसी न किसी अप्रिय लफड़े से जिसमें कोई कमजोर सताया जा रहा होता है, पीठ फेरते हैं.

व्हाइट हेलमेट्सः जान की परवाह नहीं, बम गिरने के बाद ही शुरू होता है इनका काम

जरा देर बाद यही लोग संवेदना की अपेक्षा से की जाती भर्त्सना में जुट जाते हैं. कर्महीन संवेदना का ढेर ऊंचा होता जाता है और अमानवीय वारदातें बढ़ती जाती हैं. यह पाखंड हमारा प्रमुख सामाजिक चरित्र बनता जा रहा है.

दरअसल जो मदद करने और स्टैंड लेने की स्थिति में हैं उनमें यकीन घर कर गया है कि सब ओर से आंख बंद करके जैसे भी हो पैसा कमाना चाहिए जिससे सबकुछ मैनेज किया जा सकता है.

पैसा हो तो भाड़े के लोगों और तकनीक की मदद से मानवीय, बौद्धिक, सुरूचिसंपन्न कैसी भी छवि का प्रबंधन किया जा सकता है. अब असल चीज होना नहीं दिखना है. राजनेता चुनाव जीतने के लिए और कारपोरेट घराने माल बेचने के लिए इस तरीके से जनभावनाओं का प्रबंधन सफलतापूर्वक कर भी रहे हैं.

गोमपाड़: एक गांव जहां इंसानी चहल-पहल की बजाय बूटों की धमक सुनाई देती है

एक मिनट के लिए फर्ज कीजिए कि करोड़ों गालियां खा चुका वह पत्रकार वीडियो न बनाता, दाना मांझी और उसकी बेटी अपनी असहायता पर कलपते हुए कुछ किलोमीटर और जाते तो क्या इस न जानी गई घटना के मायने कुछ और होते?

उसे धन्यवाद दीजिए कि उसने खोती इंसानियत पर गौर करने का एक मौका फराहम कराया वरना...यह भी तो हो सकता था कि टीआरपी और अपनी खुदगर्ज कामयाबी के फेर में वह दाना मांझी को चीखने चिल्लाने, गालियां बकने पर राजी कर लेता और दिखाता कि कालाहांडी के जंगल में आधुनिक शिव का अवतार हुआ है जो क्रोध से भरे अपनी पत्नी का शव कंधे पर रखे इस हृदयहीन दुनिया को नष्ट कर देने पर आमादा हैं.

तब धिक्कारने वालों में से बहुत से लोग विह्वल भाव से स्क्रीन को प्रणाम कर रहे होते. यह पाखंड ही हमारा प्रमुख सामाजिक चरित्र बनता जा रहा है.

First published: 26 August 2016, 14:56 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी