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आरुषि मर्डर मिस्ट्री: 9 साल में 8 सवाल उठाती नई किताब

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 May 2017, 13:41 IST
आरुषि तलवार की फाइल फोटो.

दुनिया की सबसे सनसनीखेज मर्डर मिस्ट्री में शामिल आरुषि-हेमराज हत्याकांड को 9 साल पूरे हो गए हैं. अब इस केस को पहले ही दिन से कवर करने वाले क्राइम रिपोर्टर सुनील मौर्य की लिखी किताब 'एक थी आरुषिः कातिल जिंदा है' बाजार में आ गई है. सोमवार 15 मई को नोएडा में इस किताब का विमोचन मशहूर क्राइम टीवी शो के एंकर और जर्नलिस्ट शम्स ताहिर ख़ान ने किया.

किताब के लेखक और एक प्रमुख हिंदी दैनिक अखबार के सीनियर कॉरेसपॉन्डेंट सुनील मौर्य ने इस दौरान कहा कि आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस एक ऐसा रहस्य है, जिसे आज भी पूरी तरह से सुलझाया नहीं जा सका. इस केस में जितना सस्पेंस है उसे जानने की इच्छा आज भी उतनी ही ज्यादा लोगों में है.

ठीक 9 साल पहले 15-16 मई 2008 की रात में यह मर्डर मिस्ट्री हुई थी. उस समय नोएडा पुलिस ने केस की तफ्तीश शुरू की थी. इसमें जब 17 मई को हेमराज की डेडबॉडी मिली तब केस गहराया गया था. उसी दिन से यह सवाल उठने लगा था कि घर में 4 लोग, 2 की हत्या हुई तो दो को भनक कैसे नहीं लगी.

इसी आधार पर केस का खुलासा भी कर दिया गया. हालांकि, इस केस में नोएडा पुलिस फिर सीबीआई की पहली और आखिर में दूसरी टीम ने केस को अलग अलग तरीके से कोर्ट में पेश किया मगर 9 साल होने पर ... क़ातिल ज़िंदा है, एक थी आरुषि ... किताब ने साइंटिफिक प्रूफ और सीबीआई की ही तमाम रिपोर्ट के आधार पर केस को न सिर्फ समझाया बल्कि गहरा एनालिसिस करते हुए केस के हर पहलू को बताया है, जिसे पढ़ने से पता चलता है कि आखिर उस रात में क्या हुआ होगा और क्या नहीं हो सकता है.

वहीं, शम्स ताहिर खान ने कहा कि यूं तो उन्होंने तमाम क्राइम केस देखे हैं, लेकिन तीन ऐसे मामले हैं जो उन्हें अभी तक याद हैं. इनमें आरुषि-हेमराज मर्डर केस, निठारी कांड और निर्भया केस शामिल हैं. आरुषि मामले को उन्होंने काफी करीब से देखा और इस केस से जुड़ी अपनी यादें बताईं.

नोएडा के एनईए सभागार में किताब का विमोचन करते शम्स ताहिर खान, सुनील मौर्य, अविरुक सेन और विपिन मल्हन. (फेसबुक)

अब किताब क्यों लिखी?

दरअसल, इस केस में नोएडा पुलिस की शुरुआत की जांच में ही काफी हद तक यह पता चल गया कि घटना आखिर क्या हुई. मगर, इसके बाद भी पुलिस में ही दो अलग-अलग टीम बन गई. इस वजह से पुलिस की शुरुआती जांच में ही 4 जांच अधिकारी बदले गए. इनमें से एक ने तो जान-बूझकर बीमारी का बहाना बनाया. फिर इसके बाद आईजी की मीटिंग में उन दो पुलिस अधिकारी को बाहर निकाल दिया गया, जो यह मान रहे थे कि तलवार दंपति फिलहाल उनके शक के दायरे में नहीं हैं.

यहां से सुनील को केस में कुछ अजीब लगा जो सामने नहीं आ रहा है, इसलिए वे इसकी गहराई में लगे और सबूतों के आधार पर एनालिसिस करने लगे. उस दौरान ऐसे तथ्य सामने आए, जिससे यह केस काफी हद तक साफ हो जाता है. इसे वे अपने दोस्तों और अन्य लोगों को बताने लगे. तब यह पता चला कि अब इस केस को लेकर एक फिल्म आ चुकी है और अविरुक सेन की एक किताब भी. इसके बाद भी लोगों के मन में काफी सवाल हैं. सस्पेंस बना हुआ था.

इस बारे में उन्होंने फेसबुक और अन्य तरीके से लोगों से पूछा तो कई सवाल सामने आए. जब इस मुद्दे पर लोगों से सवाल जवाब होते और तर्क देते तब उनके दोस्तों ने कहा कि क्यों नहीं इस हकीकत को सबके सामने लाते हो. इसके बाद ही उन्होंने किताब लिखने की सोची और समय निकालकर लिखने लगे. अब यह सबके सामने है. पहली किताब है. थोड़ी जल्दबाजी में कुछ कमियां भी हैं, जिन्हें दूर करने की भी कोशिश जारी है.

क्या खास और नए तथ्य

यूं तो यह केस सभी को पता है ऐसे में कुछ नया तो नहीं कह सकते हैं. मगर, ऐसे तथ्य जिन पर एनालिसिस करने से केस की बारीकी समझ में आता है. उसी बारीकी को किताब में बताने की कोशिश की गई है.

यह किताब अलग-अलग पार्ट में है. सबसे पहले रिपोर्टिंग पार्ट है. इसके बाद इंवेस्टिगेशन फिर सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट. बाद में कृष्णा के नारको टेस्ट और फिर रिटायर्ड डीएसपी केके गौतम के उस वीडियो के आधार पर पूरी डिटेल इस केस में काफी अहम है. इस वीडियो में केके गौतम ने साफ कहा है कि घटना में कैसे तलवार की भूमिका नहीं है, लेकिन बाद में वह कोर्ट में अपनी बात से इनकार कर दिया था. इसके बाद 8 अलग-अलग सवाल से पूरे केस के रहस्य को समझाने की कोशिश की गई है और अंत में आखिरी बात में तलवार दंपति से की गई बातचीत का अंश हैं.

रिपोर्टिंग पार्ट में 16 मई की सुबह से लेकर नोएडा पुलिस की तरफ से तलवार को अरेस्ट करने तक एक-एक दिन का अपडेट है. किस तरह से उस समय का माहौल था. पुलिस कैसे जांच कर रही थी और किस आधार पर केस का खुलासा किया गया. वहीं, इंवेस्टिगेशन पार्ट में नोएडा पुलिस की जांच कैसे बदलती रही और क्या-क्या खामियां रहीं, उस पर फोकस किया गया है.

'एक थी आरुषिः कातिल जिंदा है' किताब का कवर पेज

किताब के खास तथ्य

दो कत्ल हुए तो तलवार के कपड़े पर सिर्फ आरुषि का ही ब्लड क्यों?

सीबीआई की फॉरेंसिक जांच व क्लोजर रिपोर्ट के हवाले से किताब में दावा किया गया है कि आखिर 15 मई की रात में दो कत्ल किए गए थे तो तलवार की टीशर्ट पर सिर्फ आरुषि का ही खून क्यों लगा. हेमराज का क्यों नहीं. जबकि, रात में पहने कपड़े और सुबह में भी वही पहने होने का सबूत भी मिला था. इसके लिए 15 मई की रात नए कैमरे से खींची गई फोटो और सुबह मीडिया फुटेज से कपड़ों का मिलान किया गया था.

रिटायर्ड डीएसपी केके गौतम ने कैमरे के सामने सीबीआई की पहली अरुण कुमार वाली टीम के बारे में कहा है कि ... मैं इंवेस्टिगेशन का आदमी हूं, इसलिए सीबीआई जो कर रही है वो एकदम सही है. मैं ये क्या कह रहा हूं कि वी शुड प्राउड ऑफ इट, गर्व करने वाली बात है....मेरा जो मानना है अपना, वो तस्वीर देखी है आपने, अर्धनग्न है लड़की. अब लड़की की मौके पर अर्धनग्न आरुषि जो है वो सबसे बड़ा प्रूफ है कि फादर इसमें नहीं है. ...यह वीडियो यू-ट्यूब पर है इसे आप rtd dsp सर्च करके देख सकते हैं. 4-5 पार्ट में है.

वाकई में आरुषि के कमरे से ली गई पहली फोटो इस केस का सबसे बड़ा प्रूफ है. अगर आप उस तस्वीर को ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि कत्ल वाली रात आरुषि के साथ जोर-जबर्दस्ती की गई थी. आरुषि ने भी विरोध किया था इसलिए उसके दाहिने हाथ पर किसी आदमी के दबाव डालने का गहरा निशान भी पड़ गया था. अगर, आरुषि अपनी मर्जी से हेमराज के साथ संबंध बनाती तो ऐसा नहीं होता और उसका पिता उसे मारता तब भी हाथा-पाई की नौबत नहीं आती. ऐसे में यह निशान क्यों आता. सीबीआई की कमेटी की रिपोर्ट का प्रूफ के साथ बुक में दिया गया है कि वह निशान किसी ह्यूमन का ही है (पेज-108) इसका प्रूफ किताब के आखिर में अटैच भी है.

आरुषि की हत्या के बाद सुबह की पहली एक्सक्लूसिव तस्वीर.

शुरू में आरुषि को सगी बेटी नहीं होने से लेकर कई बातें सामने आई थी, जिससे यह बताया गया कि आरुषि से उसके माता-पिता का लगाव नहीं था, इसलिए मार दिया होगा. इसके बाद सीबीआई ने डीएनए जांच कराकर यह पुष्टि कर दी थी आरुषि ही राजेश व नूपुर तलवार की बायोलॉजिकल बेटी थी. साथ ही एक रिसर्च रिपोर्ट के आधार पर यह बताया गया है कि कोई मां-बाप आखिर किन परिस्थितियों में अपने बच्चे की हत्या करता है.

अभी तक यह भी कहा जाता रहा है कि दोनों कत्ल रात में 12 से 1 बजे के बीच हुए. मगर, किताब में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर दावा है कि मर्डर रात में 1 बजे के बाद किए गए. इसके पीछे साइंटिफिक प्रूफ भी है कि गर्मी में कैसे रात में खाना खाने के बाद पचाने में समय लगता है और फिर एक शख्स को कब गहरी नींद आती है, जिससे उसे आस-पास के बारे में उतना बेहतर तरीके से पता नहीं चल पाता है.

आरुषि की पंचनामा रिपोर्ट में की गई थी हेरा-फेरी. इसलिए रेप का पता लगाने के लिए पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने पहले जांच ही नहीं की थी. इस पंचनामा में कैसे बाद में आनन-फानन में बनाकर बाहर से एंट्री की गई थी, उसकी कॉपी भी अटैच है. कोई भी देख सकता है कि उसमें अलग से रेप का पता लगाने के लिए एंट्री की गई थी. पेज नंबर-140.

आरुषि की मां नुपुर और पिता राजेश तलवार की फाइल फोटो.

आखिरी बात में नूपुर व राजेश तलवार से बातचीत का अंश है. नूपुर से सवाल कि क्या ऐसा नहीं कि जब आरुषि को मार ही डाला, तो अपने पति को बचाने के लिए वह उससे मिल गई. इस पर नूपुर ने कहा था कि ...मैं पत्नी हूं तो एक मां भी. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक तरफ कोई मेरी बेटी को मार दे और मैं चुप रहूं. अगर पति वाकई में ऐसे होते, तो मैं उन्हें सजा दिलाती. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक मां को पता हो कि उसकी बेटी की हत्या हो गई और वह कमरे में आराम से नींद ले. मैं तो बिल्कुल भी नहीं.

एक सवाल के जवाब में दंपति ने बताया कि हमेशा पुलिस कहती रही कि जहां हेमराज की लाश थी उस छत की चाबी तलवार ने नहीं दी थी, बल्कि गुमराह किया था. वाकई में उसकी चाबी ही नहीं थी. इसके बाद गोल्फ स्टिक की बात आई कि एक को गुम करा दिया गया. करीब एक साल बाद जैसे ही मुझे गोल्फ स्टिक मिली तो हमने उसे सीबीआई के हवाले कर दिया. उसी के आधार पर सीबीआई की दूसरी टीम ने कातिल बना दिया.

अगर ऐसा होता तो हम खुद गोल्फ स्टिक क्यों देते. अंत में सबसे बड़ी बात कि जब सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी थी तब हम खुद ही हाई कोर्ट में केस को री-ओपन कराने के लिए क्यों गुहार लगाते, अगर हम खुद कातिल होते. क्या कोई ऐसा शख्स होगा जो किसी जुर्म करने के बाद भी पुलिस से बच जाए तो दोबारा वह खुद ही केस को ओपन कराकर जांच कराने की मांग करेगा. जरा सोचिए.

First published: 16 May 2017, 13:36 IST
 
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