Home » इंडिया » A peace conference that led to conflict: the making of the Middle East
 

शांति सम्मेलन की वजह से अशांत हुआ पश्चिम एशिया

स्नेहा वखारिया | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • पहले विश्वयुद्ध के पेरिस में हुए शांति समझौते में शांति को लेकर राष्ट्रों की दिलचस्पी कम थी बल्कि विजेता राष्ट्रों की दिलचस्पी इस बात में ज्यादा थी कि उन्हें कौन सा इलाका मिलना चाहिए.
  • लड़ाई के बाद बातचीत की मेज पर बैठे देशों में फ्रांस की नजर सीरिया पर थी जहां तेल का भंडार था और यह वह वक्त था जब कोयले की जगह तेल धीरे-धीरे ईंधन का विकल्प बनकर उभर रहा था.

ऐसा समझा जाता है कि पूर्व और पश्चिम के बीच होने वाला संघर्ष ऐतिहासिक मजबूरी है. जब रोमन ऑटोमन साम्राज्य से मिले या फिर जेहादियों ने पूर्व की तरफ प्रस्थान किया या फिर अमेरिका ने ईराक पर हमला किया. इन सभी के बीच एक निश्चित पैटर्न को देखा जा सकता है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन पांच इतिहासकारों ने इस बात पर विमर्श किया कि किस तरह पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति को इतिहास की एक घटना से जोड़कर देखा जा सकता है. 

पहला विश्व युद्ध जो 1914-18 के बीच हुआ और उससे आगे बढ़ते हुए 1919 में हुआ पेरिस शांति सम्मेलन जो पहले विश्व युद्ध के बाद संपन्न हुआ. यह पहला मौका था जब विजेता यानी मित्र राष्ट्रों ने जर्मन और ऑटोमन ताकतों के साथ शांति समझौता किया. 

वास्तव में यह वैसा मौका था जब यूरोपीयन विजेताओं ने इस बात में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई कि किसे ऑटोमन साम्राज्य का कौन सा हिस्सा मिलेगा. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और कनाडाई इतिहासकार मारग्रेट मैकमिलन बताते हैं, 'यह पूरी तरह से खरीदारी की सूची की तरह था.' यहां वह सब कुछ हुआ जिसका सामना यूरोपीय ताकतों को अब पश्चिम एशिया में करना पड़ रहा है.

फ्रांस को सीरिया चाहिए था. यह वह वक्त था जब ईंधन के तौर पर तेल कोयले को विस्थापित कर रहा था

पहला विश्वयुद्ध निश्चित तौर पर एक ऐतिहासिक पड़ाव है. इसमें 90 लाख लोगों की मौत हुई और हजारों की संख्या में लोगों को भूख की वजह से मरना पड़ा और इसके अलावा युद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों की वजह से भी हजारों की संख्या में जिंदगियां गंवानी पड़ी. महामारी फैली और साम्राज्यों का पतन हुआ.

यह दरअसरल उस साम्राज्य का पतन था जिसमें कभी सूर्यास्त नहीं होता था. भारत, कनाडा, बाल्कन और अफ्रीका के सैनिकों ने लड़ाई में भाग लेने के लिए दुनिया के उन मोर्चों पर गए जिसके बारे में उन्हें रत्ती भर की भी जानकारी नहीं थी. 

मैकमिलन बताते हैं कि अगर आप अमेरिकी, पोलिश या अरब थे तब आपमें एक नुकसान की भावना के साथ संभावनाओं का संसार भी मौजूद था. लड़ाई लोकतंत्र और स्वायत्ता जैसी नई धारणाओं को भी जन्म दिया. राष्ट्र जो पहले कभी किसी विचार की तरह नजर आते थे वह अब संभावित वास्तविकताओं की तरह दिखने लगा था. अरब, कुर्दिश और आर्मीनियाई राष्ट्रवाद ब्रिटिश हितों और ब्रिटिश सोने की वजह से पैदा हुआ. क्योंकि अंग्रेजों को ऑटोमन साम्राज्य के भीतर चल रहे संघर्षों से काफी कुछ मिलना था. 

दुनिया के सबसे पुराने साम्राज्य के पतन का मतलब कुछ ब्रिटिश लोगों की मौत थी. वहीं ब्रिटेन को अरब सैनिकों के साथ अन्य संभावित मदद की जरूरत थी क्योंकि उनके संसाधन तेजी से खत्म हो रहे थे.

यही वजह रही कि उन्होंने ऑटोमन साम्राज्य के भीतर अल्पसंख्यकों के पहचान की राजनीति को हवा दी. ब्रिटेन के इतिहासकार एंथनी स्टैटिन बताते हैं कि ब्रिटेन ने मक्का के शरीफ से हाथ मिलाकर इस असंतोष को और हवा दी. ठीक उसी तरह जैसे रूस के जार ने आर्मीनियाई लोगों में राष्ट्रवादी भावना को हवा दी वैसे ही पश्चिम के साम्राज्यवादी शरीफ के साथ हाथ मिलाकर काम कर रहे थे.

यूरोपीयन विजेताओं ने इस बात में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई कि किसे ऑटोमन साम्राज्य का कौन सा हिस्सा मिलेगा

सबसे बड़ी विडंबना साम्राज्य की यह धारणा थी कि कुछ सभ्यताएं शासन नहीं कर सकती और  वह अरब राष्ट्रवाद को सबक सिखाना चाहती थी. लेकिन राष्ट्रवाद उस वक्त की जरूरत थी. 20वीं सदी में आर्मिनिया के  लेखक रोनाल्ड गिरगो सनी बताते हैं, 'अचानक से ही सब राष्ट्र बनना चाहते थे. कोई हाथ उठाकर यह कह सकता था कि हैलो, मैं भी एक राष्ट्र हूं.'

फॉल ऑफ द ऑटोमंस और इतिहासकार यूजीन रोगन बताते हैं कि जब लड़ाई के बाद दोनों पक्ष शांति वार्ता के लिए बातचीत की मेज पर आए तो फ्रांस को पता था कि उसे क्या चाहिए. फ्रांस को सीरिया चाहिए था. यह वह वक्त था जब ईंधन के तौर पर तेल कोयले को विस्थापित कर रहा था. उस वक्त तेल सीरिया और रोमानिया में मौजूद था. वहीं रूस की दिलचस्पी कुंसतुनतुनिया में थी लेकिन ब्रिटेन पूरी तरह से भ्रम में था. मैकमिलन बताते हैं, 'वह बस आसमान में नीति बना रहे थे.'

इसलिए उन्होंने कुर्दों के साथ दगा किया और उन्हें तुर्की की दया पर छोड़ दिया. ब्रिटेन ने गजा को अपने नियंत्रण में रखा क्योंकि वहां से स्वेज नहर को नियंत्रित किया जा सकता था. इसके बाद बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. सैटीन बताते हैं, 'मैं आपको उम्मीद की एक किरण दे सकता हूं. 2011 ने बेहतर उम्मीदें पैदा की है. आकांक्षाओं की भावना अभी भी मौजूद है. अगर वह मिस्र में दो बार राष्ट्रपति को उखाड़ फेंक सकते हैं तो वह आगे भी ऐसा कर सकते हैं.'

First published: 26 January 2016, 8:47 IST
 
स्नेहा वखारिया @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़. लिट्रेचर और लाइफस्टाइल पर लिखती हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी