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बंदूक के लाइसेंस के लिए मुसलमान से बने हिन्दू

अतुल चंद्रा | Updated on: 25 April 2016, 12:06 IST

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रहने वाले फुरकान अहमद द्वारा धर्म परिवर्तन कर हिंदू बनने ने भी उनकी मदद नहीं की. एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी पाने के लिए जरूरी बंदूक का लाइसेंस पाने के लिए धर्म परिवर्तन करने वाले फुरकान को अब तक लाइसेंस नहीं मिल पाया है.

बंदूक का लाइसेंस पाने के लिए फुरकान ने मुसलमान से हिंदू बनने के साथ ही अपना नाम भी फूल सिंह रख लिया. लेकिन बावजूद इसके अभी तक भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया. उसकी परेशानियां उस वक्त और ज्यादा बढ़ गई जब उसकी पत्नी हसमती अपने छह में से दो बच्चों को लेकर अपने मायके चली गई. 

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पिछले मंगलवार को फुरकान ने खुद को फूल सिंह में बदल लिया. इसके लिए उन्होंने अपना सिर मुंडवाया और सिर पर केवल एक चोटी छोड़ी. इसके साथ ही उसने अपने माथे पर एक तिलक भी लगाया. इस धर्म परिवर्तन में न तो कोई अन्य व्यक्ति मौजूद रहा और न ही किसी रीति-रिवाजों का पालन किया गया.

फुरकान कहते हैं, "मैंने एसडीएम से कहा कि अगर वे मुझे बंदूक का लाइसेंस नहीं दिला सकते तो कम से कम मेरे माथे पर तिलक लगाकर मुझे हिंदू बना दें, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. इसके बाद मैंने ही यह कर लिया."

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वो कहते हैं कि उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन अपने एक मित्र की सलाह पर किया जिसने उनसे कहा था कि प्रशासन द्वारा बंदूक का लाइसेंस जारी न किए जाने का कारण तुम्हारा मुसलमान होना है. फुरकान ने कहा, "मैंने सोचा कि मेरा धर्म और बागपत में सामुदायिक भावना से भरा माहौल दिक्कत पैदा कर सकता है. अब मैं फूल सिंह हूं और मुझे उम्मीद है कि मेरे आवेदन को अब संवेदनापूर्ण नजरिये से देखा जाएगा."

फुरकान का दावा है कि उसकी बीवी उसे इसलिए नहीं छोड़ गई क्योंकि वो एक हिंदू बन गया, बल्कि वो अपने परिवार का पालन-पोषण करने में असमर्थ था.

नहीं छोड़ी उम्मीद

ई-रिक्शा चलाकर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले फुरकान पिछले छह साल से बंदूक का लाइसेंस पाने की जुगत में लगे हैं ताकि वो अपनी कमाई बढ़ाने के लिए पार्ट टाइम में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर सकें. फुरकान के मुताबिक, "मेरे सभी कागज सही होने के बावजूद भी मेरा लाइसेंस नहीं बनाया जा रहा है. मैं इतना परेशान हो गया हूं कि लगता है पंखे से लटककर आत्महत्या कर लूं."

2014 में उसे बताया गया कि उसका पहला आवेदन खो गया है इसलिए दूसरा आवेदन करो. उसके बावजूद कुछ नही हुआ. फुरकान की शिकायत है, "इन छह सालों में जब मुझे इंतजार था कि वे मुझे बंदूक का लाइसेंस दे देंगे, बागपत में छह जिलाधिकारी आकर चले गए लेकिन किसी ने भी मेरे आवेदन पर गौर नहीं किया."

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कुछ माह पहले फुरकान ने एक आरटीआई डालकर अपने आवेदन की स्थिति की जानकारी मांगी. इसके जवाब में आई जानकारी ने उन्हें चौंका दिया कि बीते छह माह में 378 लोगों को बंदूक का लाइसेंस जारी किया गया था जबकि उसके आवेदन पर गौर तक नहीं किया गया.

इस बारे में पूछने पर बागपत के जिलाधिकारी एचएस तिवारी कहते हैं कि पुलिस ने फुरकान के आवेदन पर "गैर जरूरी (नॉट रिकमंडेड)" की मोहर लगाकर उनके कार्यालय में भेजा. लेकिन मुझसे पहले के जिलाधिकारियों ने भी इसे पुनर्विचार के भेज दिया था और फिर से उसका आवेदन पुनर्विचार के लिए डाल दिया गया है.

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फुरकान ने इसके लिए अदालत का भी दरवाजा खटखटाया कि प्रशासन को उसे बंदूक का लाइसेंस देने के लिए निर्देश दिए जाएं. लेकिन इस मामले पर इलाहाबाद में हुई ताजा सुनवाई पर वो कहते हैं, "यह बहुत उत्साही या काम की नहीं थी." 

अदालत में प्रशासन ने तर्क दिया कि वे केवल उन्हीं लोगों को अग्नेयास्त्रों (बंदूक-रिवॉल्वर आदि) के लिए लाइसेंस जारी करते हैं जिन्हें जान से मारने या संपत्ति लेने की धमकी मिली हो, या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति हो. तिवारी कहते हैं यह सभी नियम रूलबुक के मुताबिक हैं. 

प्रशासन के खिलाफ फुरकान का अगला कदम क्या होगा इस बारे में तो अभी कुछ पक्का नहीं है. लेकिन एक बात तय है कि वो फिलहाल या बहुत जल्द वापस अपने पुराने धर्म यानी मुसलमान में वापसी नहीं करने वाले.

First published: 25 April 2016, 12:06 IST
 
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