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मोदी-बादल की 'पोल खोलने' गुजरात से पंजाब पहुंचे सिख किसान

राजीव खन्ना | Updated on: 23 October 2016, 7:38 IST
QUICK PILL
  • आम आदमी पार्टी पंजाब में अपने चुनाव प्रचार को मजबूती देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह राज्य गुजरात से खाद-पानी ले रही है. 
  • आप गुजरात के कच्छ क्षेत्र से कुछ सिख किसानों को लेकर आई है जो अकाली-भाजपा सरकार के किसान समर्थित होने के दावे का \'खुलासा\' करेंगे. 
  • ये किसान गुजरात में भाजपा सरकार के साथ कानूनूी लड़ाई में उलझे हुए हैं. 

गुजरात के कच्छ इलाक़े में सिख किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल की ख़बरें कई बार सुर्ख़ियां बन चुकी हैं. अब वही किसान गुजरात में अपनी हालत बताने के लिए पंजाब पहुंच गए हैं. इन किसानों ने मोहाली क्षेत्र में पार्टी के पहले चक्र में चुनावी अभियान में भाग लिया है. मोहाली से उनके वकील हिम्मत सिंह शेरगिल चुनाव लड़ रहे हैं. कुछ समय के लिए इन किसानों ने उनके कपास के खेतों में काम संभाल लिया है और एक बार जब आचार संहिता लागू हो जाएगी, वे अन्य क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए चले जाएंगे. 

एक किसान एसएस भुल्लर का कहना है कि शेरगिल जैसे व्यक्ति के लिए कुछ समय देना हमारा नैतिक कर्तव्य है क्योंकि वे हमारा मामला सुप्रीम कोर्ट में बिना फीस के लड़ रहे हैं. उन्होंने हमारा केस अपने हाथ में लिया है. आप की पंजाब में हर जगह मौजूदगी है. मोदी सरकार हमें डराने -धमकाने की हर जोर-आजमाइश कर रही है ताकि हम अपने संघर्ष से हट जाएं.

कच्छ कैसे पहुंचे ये किसान

1965 के युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सिख किसानों, इनमें राजस्थान और हरियाणा के किसान भी थे, सीमावर्ती राज्य के कच्छ में बसने को कहा था. भुल्लर का कहना है कि शास्त्रीजी चाहते थे कि उत्तरी भारत के किसान कच्छ को खेती से समृद्ध बनाएं तथा साथ में सीमा की रखवाली, निगरानी भी करते रहें.

लेकिन 2010 के बाद से, जो जमीन उनके कब्जे में थी, उसे लेकर किसानों पर दबाव थोपा जाने लगा. दरअसल, गुजरात सरकार ने बॉम्बे टेनेन्सी एंड एग्रीकल्चर लैंड एक्ट-1948 के तहत 1973 में एक लोकप्रिय अधिनियम पारित किया था. इस अधिनियम के तहत गुजरात में उन लोगों को कृषि भूमि बेचे जाने पर रोक लगा दी गई थी जो राज्य में पुश्तैनी रूप से खेती से नहीं जुड़े हुए हैं.

इस कानून के विरोध में किसानों ने हाईकोर्ट की शरण ली. हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया. लेकिन राज्य की तत्कालीन नरेन्द्र मोदी सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां यह मामला अभी भी लम्बित पड़ा हुआ है. सिख किसानों ने गुजरात सरकार के सुप्रीम कोर्ट में जाने के विरोध में आन्दोलन किया था क्योंकि इस भूमि पर वैधानिक रूप से उनका अधिकार था.

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लगभग 10,000 किसान कच्छ में हैं. उनका दावा है कि उनके पास भूमि खरीद के सभी तरह के कागजात हैं. किसान क्रेडिट कार्ड है. बिजली का बिल भी है जिसका वे नियमित रूप से भुगतान करते आ रहे हैं. अपनी जी-तोड़ मेहनत और पहले की राज्य सरकारों के सहयोग से इन किसानों ने खाली पड़ी भूमि को काफी उपजाऊ बना लिया है और चीकू तथा अनार के बागान लगा लिए हैं. 

उनके पास जिले में 20,000 एकड़ से ज्यादा जमीन है. इन किसानों का कहना है कि यदि राज्य सरकार बाहर के लोगों को भूमि देने के खिलाफ है तो वह फिर क्यों बाहर के उद्योगपतियों को आमंत्रित कर रही है और उन्हें सस्ते दरों पर भूमि दे रही है. 

वे इस पर भी आश्चर्यचकित हैं कि यह मुद्दा वर्ष 2010 में ही क्यों उठा. इसके पहले क्यों नहीं? यह मुद्दा उस समय उठा दिया जाता जब वे 1965 के युद्ध और 2001 के भयंकर भूकम्प के बाद कच्छ के विकास में अपना योगदान दे रहे थे?

बादल की अकर्मण्यता, मोदी का बचाव

किसान अपनी समस्या लेकर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि वे उस मामले को अपने समकक्ष गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने उठाएं, उनके आश्वासन का भी कोई नतीजा नहीं निकला. तब इन किसानों ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पास अपनी पीड़ा पहुंचाई. अल्पसंख्यक आयोग ने राज्य सरकार को उसके रवैये पर आड़े हाथों लिया. 

आयोग के सदस्य अजायब सिंह ने कच्छ का दौरा किया और राज्य सरकार से कहा कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया जाए और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल मामले को वापस लिया जाए. यह मुद्दा मोदी के लिए उस समय बहुत ही कठिन बन गया था जब वे राष्ट्रीय राजनीति में आने के लिए उच्च महत्वाकांक्षाएं पाल रहे थे. 

अमरीका में सिविल सोसाइटी के लोगों ने राष्ट्रपति ओबामा और सीनेटरों को पत्र लिखकर कहा था कि मोदी को अमरीका का वीजा न दिया जाए.

मोदी ने इस स्थिति से निपटने की कोशिश में कांगे्रस पर आरोप लगाया कि यह कानून 1973 में बना था, 1973 में राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. मोदी ने कई बार यह बयान जारी किया कि यह मुद्दा उनकी सरकार को नुकसान पहुंचाने के लिए उठाया जा रहा है और सिख समुदाय को गुमराह किया जा रहा है. 

मोदी ने कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. उन्होंने यह भी कहा था कि कच्छ में सिख समुदाय हमेशा से शांतिपूर्ण तरीके से रहा है. वे शांति के साथ आगे भी रहेंगे.

भुल्लर ने कैच को बताया कि बादल ने अपना एक व्यक्ति नई दिल्ली स्थित पंजाब भवन में हमसे मिलने के लिए भेजा था. इस व्यक्ति ने कहा कि हम जो भी वकील हायर करेंगे, पंजाब सरकार उसकी फीस देगी. फीस का ज्यादा मतलब नहीं है. हमने कहा कि हम अभिषेक मनु सिंघवी को चाहते हैं. प्रस्ताव वहीं ठप हो गया क्योंकि सिंघवी कांग्रेसी हैं.

 इसके बाद हमने शेरगिल को लिया जिन्होंने अपनी सेवाएं नि:शुल्क हमें दी हैं. अकाली इस स्तर तक उतर आए कि हमें दिल्ली के गुरुद्वारों में भी जगह देने से इनकार कर दिया गया.

आगे की रणनीति

भुल्लर कहते हैं कि शेरगिल के लिए चुनाव प्रचार करना किसानों की प्राथमिकता है. लेकिन इसके अलावा वे अन्य विधान सभा क्षेत्रों में भी जाएंगे. भुल्लर कहते हैं कि हमारी रणनीति सीधी-साधी है. बादल और मोदी किसान समुदाय के कल्याण के लिए जो दावे करेंगे, हम सुनेंगे और हम उनके दावों का जवाब देंगे. हम किसी भी तरह किसानों को गुमराह नहीं होने देंगे. उन्होंने यह भी कहा कि हम लोगों को यह भी बताएंगे कि एक प्रधानमंत्री ने हमें वहां बसाया और एक प्रधानमंत्री हमें किस तरह से वहां से उजाड़ रहा है. हम लोग केवल आचार संहिता लागू होने का इंतजार कर रहे हैं. उस समय तक तो हम कपास की खेती के काम से भी मुक्त हो जाएंगे.

वह कहते हैं कि आम आदमी पार्टी कुछ समय के लिए राज्य में कम तीव्रता का प्रचार अभियान चला रही है. पंजाब में मतदाताओं से संपर्क साधने और उन्हें दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार की उपलब्धियां बताने के लिए सप्ताह भर

तक का 'वोट जोड़ो झाड़ू नाल' अभियान चलाया गया था. अब हम मंडियों में किसानों की मदद के लिए अपनी टीम तैनात करेंगे जो मंडियों में धान बेचने आएंगे. आप की किसान और मजदूर इकाई के अध्यक्ष जी एस कंग कहते हैं कि बादल सरकार किसानों और मजदूरों के लिए मंडियों में पर्याप्त व्यवस्थाएं करने में विफल रही है.

First published: 23 October 2016, 7:38 IST
 
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