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योगेंद्र यादव: क्या यही है आप का शिक्षा मॉडल?

प्रणेता झा | Updated on: 23 January 2017, 9:27 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

अगले महीने पंजाब और गोवा में होने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी की सरकार अपने ‘शिक्षा मॉडल’ को भुनाने की कोशिश कर रही है. पर क्या सच में उन्होंने शिक्षा के लिए कुछ खास किया है? पार्टी से बेदखल हुए नेता और राजनीतिक वैज्ञानिक योगेंद्र यादव ऐेसा नहीं मानते. उन्होंने शनिवार को शिक्षा के संदर्भ में कई सवाल उठाकर दिल्ली सरकार पर हमला किया. 

उनका आरोप था कि पार्टी ने चुनाव घोषणा पत्र में शिक्षा के कई वादे किए थे, पर उनमें से एक भी पूरा नहीं किया. यादव ने अपनी नई पार्टी स्वराज इंडिया की ओर से प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि राज्य की शिक्षा का बजट केवल कागजों में दुगुना हुआ है, जबकि सरकारी स्कूलों में नामांकन कम हो गया. जब से आप सत्ता में आई है, एक भी स्थाई शिक्षक नियुक्त नहीं किया गया है.  

न स्कूल-कॉलेज खुले और ना नामांकन बढ़े

यादव ने अपनी बात को आंकड़ों से पुष्ट किया, जो उन्हें दिल्ली सरकार से ही मिले हैं. कहा कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप ने अपने घोषणा-पत्र में 500 नई स्कूलों का वादा किया था. 2015 से 2016 के अंत तक केवल 4 नए स्कूलों का निर्माण किया गया. 20 नए सामान्य शिक्षा कॉलेज खोलने का वादा था, जिनकी 2015-2016 के अंत तक संख्या 85 से 84 तक कम हो गई. 

प्रजा डॉट ऑर्ग द्वारा प्रकाशित व्हाइट पेपर के हवाले से यादव ने कहा कि दिल्ली की सरकारी स्कूलों में 28,000 और एमसीडी स्कूलों में 20,000 छात्रों का नामांकन कम हो गया. 

आप सरकार ने अपना पहला बजट 2015 में पेश किया था, जिसमें शिक्षा पर खर्च में 106 प्रतिशत बढ़ोतरी की घोषणा की गई थी. यादव ने कहा कि बजट का केवल ‘नियोजित’ अंश पिछले साल के 2,219 करोड़ से 4570 करोड़ बढ़ा दिया गया. दरअसल खर्च 2932 करोड़ ही हुआ है. 

यादव ने हायर एजुकेशन एंड स्किल गारंटी स्कीम के तहत अब तक केवल तीन छात्रों को ऋण देने का आरोप लगाया. यह राशि 3.15 लाख रुपए थी. उन्होंने इस राशि की तुलना केजरीवाल सरकार द्वारा पहले साल में ही विज्ञापनों पर खर्च राशि के साथ की, जो 30.04 फीसदी थी.

घोषणा-पत्र में निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए 25 फीसदी कोटे को लागू करने का वादा था. यादव ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की 57 फीसदी सीटें खाली पड़ी हैं. 

शिक्षकों का गंभीर मसला

शिक्षकों की भर्ती और ठेके पर काम कर रहे स्कूल के शिक्षकों को हटाने के अहम मुद्दे पर यादव ने कहा कि 44 फीसदी शिक्षकों की सीटें खाली पड़ी हैं, या फिर दिल्ली सरकार की स्कूलों में अस्थाई शिक्षक हैं. आप ने 17,000 नए शिक्षकों का वादा किया था, पर अब तक एक भी स्थाई शिक्षक नियुक्त नहीं किया गया है.

यादव ने कहा कि सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना भी की गई है. इसके हिसाब से स्थाई-अस्थाई दोनों शिक्षकों को ‘समान कार्य के लिए समान भुगतान’ करने की बात थी. 

उन्होंने सरकारी स्कूलों में गेस्ट टीचर का भी मुद्दा उठाया, जो दिल्ली सरकार से शोषित हैं. और जब इन शिक्षकों ने दिल्ली सरकार का विरोध किया, तो उन्हें उप मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने फिछले साल सरकारी स्कूल के सालाना समारोह में खुली धमकी दी. इसका साक्षी एक वीडियो है. 

यादव ने सिसोदिया की आलोचना की कि वे ‘जमींदार’ या महाराजा की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वो भी बच्चों के सामने, जबकि वे चुने हुए जन सेवक हैं. उन्होंने कहा कि यह शर्म की बात है कि जो पार्टी एक आंदोलन से शुरू हुई थी, वह डरा रही है और सत्तावादी रणनीति का सहारा ले रही है. 

यादव के बाद एक गेस्ट टीचर शोएब राणा ने मीडिया से कहा कि उन्हें पांच साल जाफराबाद स्कूल में उर्दू माध्यम से विज्ञान पढ़ाने के बाद ‘झूठा’ आरोप लगाकर निकाल दिया गया था. इसलिए क्योंकि उन्होंने ऑल इंडिया गेस्ट टीचर्स एसोसिएशन के तहत नियमित करने की मांग की थी.

जेएनयू में यादव

शुक्रवार को योगेंद्र यादव ने जेएनयू में 300 लोगों को संबोधित किया. वे यूनिवर्सिटी प्रशासन की ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘सत्तावादी’ रणनीति के खिलाफ जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन द्वारा रखी गई पांच दिवसीय व्याख्यान शृंखला में बोल रहे थे. 

‘यूजीसी, यूनिवर्सिटी ऑटोनॉमी एंड सोशल जस्टिस’ विषय पर बोलते हुए यादव ने यूजीसी के एक विवादास्पद सर्कुलर को पढ़ा, जिसमें एमफिल/ पीएचडी में भर्ती नियमों को बदल दिया गया था. उन्होंने दावा किया कि इससे यूनिवर्सिटियों को अपने अंदरूनी मानदंड तय करने की काफी छूट मिल गई है. 

इस सर्कुलर को अपनाने के लिए छात्र और शिक्षक दोनों प्रशासन का काफी विरोध कर रहे थे. सर्कुलर में कहा गया था कि लिखित परीक्षा को ‘क्वालिफाइंग’ माना जाए और मौखिक इंटरव्यू या वाइवा को चुनाव का आवश्यक आधार. जबकि छात्र सालों से वाइवा को कम महत्व देने की मांग कर रहे हैं क्योंकि इसमें एससी/एसटी के साथ भेदभाव होता है. यूनिवर्सिटी ने अब नियम बदल दिए हैं. सर्कुलर में लिखित परीक्षा को परीक्षा ‘क्वालिफाई’ करने के लिए 50 प्रतिशत और वाइवा को 100 प्रतिशत महत्व देने की बात कही गई है. 

यूनिवर्सिटी ने जोर देकर कहा कि वह चुनाव के मानदंड और वाइवा पर जोर देने के संदर्भ में ‘लाचार’ हैं, पर यादव ने कहा कि ऐसा नहीं है. पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि उन्होंने कुछ हफ्तों पहले यूजीसी प्रमुख वेद प्रकाश से बात की थी, जिन्होंने साफ कहा था कि यूनिवर्सिटी तय कर सकती है कि उसे कितना महत्व वाइवा को देना हो और कितना महत्व लिखित परीक्षा को देना है. अब तक लिखित को 75 प्रतिशत और वाइवा को 30 प्रतिशत महत्व मिला हुआ था. 

यादव ने प्रकाश के हवाले से कहा कि यह यूनिवर्सिटी पर है कि वे लिखित और मौखिक परीक्षा को 10, 20 या 40 प्रतिशत महत्व दे. पर चुनाव में दोनों ही प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं. यादव ने यह भी कहा कि जेएनयू की ‘डिपराइवेशन पॉइंट’ प्रणाली को खत्म करने की आवश्यकता नहीं है, जो पिछड़े जिलों जैसे विशेष मानदंडों पर आवेदक को पॉइंट्स देती है. यूनिवर्सिटी प्रशासन का दावा है कि यूजीसी के नए नियमों के अनुसार जेएनयू को यह प्रणाली समाप्त करनी है. यादव ने फिर कहा कि यूजीसी प्रमुख कहते हैं कि यही मामला था. 

First published: 23 January 2017, 9:27 IST
 
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