Home » इंडिया » AAP is not alone. Other parties are as guilty of splurging on ads
 

विज्ञापन खर्च के लिए आप की तरह दूसरी पार्टियों को क्यों नहीं निशाना बनाया जाता?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 4 April 2017, 10:49 IST


दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को अपने उस ऑर्डर के लिए सफाई देने में अब काफी मेहनत करनी पड़ सकती है जिसमें उन्होंने आम आदमी पार्टी सरकार से उसके विज्ञापन पर खर्च किए गए 97 करोड़ रुपये वसूली की बात कही है. आम आदमी पार्टी की इस घोषणा के बाद कि बाद वह इस मुद्दे पर अदालत में जाएगी, इतना तय हो गया है कि एक अफसोसनाक मुकदमेबाजी का दौर जल्द ही शुरू होने जा रहा है. इस मुद्दे के वैधानिक पक्षों की जांच तो अदालत ही करेगी, पर यह तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए कि आप अकेली पार्टी नहीं है ...और न ही पहली पार्टी जिसने विज्ञापन पर पैसे बहाए हैं.


इस मामले में दिल्ली सरकार के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय में शिकायत कांग्रेस नेता अजय माकन ने की थी, जबकि उनकी पार्टी भी यही सब कुछ करती रही है. इसका ताजा उदाहरण है कनार्टक की कांग्रेसनीत सरकार द्वारा दिल्ली के अखबारों में दिया गया फुल पेज विज्ञापन.

 


आप के विज्ञापनों पर माकन ने जो भी आरोप लगाए हैं उनमें से कई इन विज्ञापनों के बारे में उतने ही सच हैं. माकन का आरोप है कि दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सरकारी विज्ञापनों के बारे में दिए गए निर्देशों का 9 बिंदुओं पर उल्लंघन किया. ये बिंदु इस प्रकार हैं :

1. दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली से बाहर अथवा राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन देना.
2. विज्ञापनों को “झांसा देते हुए” समाचार पत्र रिपोर्ट के रूप में डिजायन किया जाना.
3. गलत और बहकाने वाले विज्ञापन
4. सत्ताधारी पार्टी द्वारा वर्षगांठ पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन देना
5. अपने गौरव गान और विपक्षी दलों को निशाना बनाने वाले विज्ञापन
6. मीडिया के विरुद्ध विज्ञापन देना
7. विज्ञापनों में सत्ताधारी पार्टी का नाम दिया जाना
8. जीएनसीटीडी के न्यायाधिकार से बाहर के मुद्दों पर विज्ञापन देना
9. विज्ञापनों का कुछ चुनिंदा मीडिया घरानों को संरक्षण देने वाला असमान वितरण

 

इनमें से लगाए गए कुछ आरोप जैसे राज्य से बाहर विज्ञापन, अखबार की रिपोर्ट की तरह विज्ञापन डिजायन, आत्मगौरव करते विज्ञापन, सत्ताधारी पार्टी का विज्ञापन में नाम और राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार से बाहर के मुद्दों पर विज्ञापन दिया जाना — किस तरह से कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार द्वारा जारी किए गए विज्ञापनों पर लागू नहीं होते.

ऐसा करने वाली निश्चित रूप से कर्नाटक की सरकार अकेली नहीं है, बल्कि इस तरह के विज्ञापन दिया जाना देश की अनेकों सरकारों में खूब लोकप्रिय है. सैंपल के रूप में भाजपा की राजस्थान सरकार द्वारा अपनी तीसरी वर्षगांठ के मौके पर दिसंबर 2016 में दिए इस विज्ञापन को देखें.

 

या हाल में सत्ता से बाहर हुई पंजाब की शिरोमणि अकाली दल और भाजपा की सरकार द्वारा मई 2016 में विशाल रूफ—टॉप सोलर प्लांट के लान्चिंग के मौके पर दिया गया यह विज्ञापन देखें. यह आयोजन दिल्ली में होना था पर इसका विज्ञापन दिल्ली के अखबारों में भी देखा गया.


उत्तर प्रदेश में अभी पिछले दिनों चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हुई समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा अपने कार्यकाल के अंत के दिनों में दी गई विज्ञापनों की श्रृंखला को भी याद किया जा सकता है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी इन विज्ञापन अभियानों में उत्तर प्रदेश के सीएम द्वारा उत्तर प्रदेश में लॉन्च किए गए प्रोजेक्टस की बात की गई थी पर ये विज्ञापन दिल्ली के अखबारों में दिए गए थे.

एक मात्र दल जिनको अतीत में इस तरह के विज्ञापन देने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, वो हैं वामपंथी दल. पर उन्होंने भी इस छवि को उस समय तोड़ दिया जब मई 2016 में केरल की वामपंथी सरकार ने दिल्ली के अखबारों में विज्ञापन दिए.


उम्मीद की जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट इन सब मामलों का स्वत: ही संज्ञान लेते हुए इनके भी मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू करे. सिर्फ आप पार्टी के विरोध में ही इतना हो हल्ला क्यों ?

 

First published: 4 April 2017, 10:49 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

पिछली कहानी
अगली कहानी