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आप-अकाली-कांग्रेस: पंजाब चुनावों की नकली लड़ाई का मैदान बना दिल्ली

राजीव खन्ना | Updated on: 28 June 2016, 16:42 IST

पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में अभी कुछ महीने का समय शेष है और राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होने के फेर में एक छद्म युद्ध शुरू हो गया है जिसे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लड़ा जा रहा है. तमाम राजनीतिक दल दिल्ली में ऐसे काम करने में लगे हुए हैं जिससे किसी न किसी तरीके से पंजाब के मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके. बाद में उनके द्वारा किये गए कामों को इन दलों की राज्य इकाई पंजाब में प्रचारित-प्रसारित करती है.

इस श्रृंखला में सबसे ताजा हंगामा दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) नेता अरविंद केजरीवाल की वजह से मचा हुआ है. उनके द्वारा 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों की जांच के लिये मोदी सरकार द्वारा गठित किये गए विशेष जांच दल (एसआईटी) को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए एक पत्र को पंजाब के तमाम समाचारपत्रों में प्रमुखता से विज्ञापन के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.

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केजरीवाल ने इस एसआईटी को आंखों में धूल झोंकने वाला बताते हुए केंद्र में सरकार चला रही बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व और शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन पर निशाना साधा है और एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया है.

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि आप नेतृत्व ने राज्य में विज्ञापन अभियान शुरू किया हो. पार्टी अक्सर राज्य के अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन प्रकाशित करवाती आई है. विशेषकर केजरीवाल के किसी भी दौरे से पहले राज्य के अखबार दिल्ली में उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश डालने वाले विज्ञापनों से भरे होते हैं.

आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व हमेशा की तरह अपने इस विज्ञापन अभियान का बचाव कर रहा है

अकालियों का आरोप है कि केजरीवाल इन भ्रामक विज्ञापनों के जरिये राज्य की जनता को गुमराह करने की कोशिश करते हैं और दूसरी तरफ कांग्रेस इस विज्ञापन अभियान को जनता के पैसे की बर्बादी बताती है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पहल करते हुए 1984 दंगों वाली एसआईटी से संबंधित हालिया विज्ञापनों को लेकर केजरीवाल पर बेहद तीखा हमला बोला है.

उन्होंने कहा, ‘‘आप अपने पद का दुरुपयोग कर रही है और जनता के पैसे के बल पर स्वयं को एक ऐसी शख्सियत के रूप में पेश करने का प्रयास कर रही है जो वह है नहीं.’’

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अमरिंदर ने आरोप लगाते हुए कहा, ‘‘प्रधानमंत्री द्वारा किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री के लिखे हुए पत्र का पढ़ना एक स्वाभाविक क्रिया है तो फिर ऐसे में समाचारपत्रों में पूरे पन्ने के विज्ञापन के रूप में जनता के पैसे को बर्बाद करने की क्या जरूरत थी. या फिर आपको इस बात का डर है कि प्रधानमंत्री और यहां तक कि कोई भी आपको गंभीरता से नहीं लेता और इसीलिये आपको अपनी बात पर जोर देने और उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिये पूरे पन्ने के विज्ञापन देने की जरूरत पड़ती है.’’

आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व हमेशा की तरह अपने इस विज्ञापन अभियान का बचाव कर रहा है और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिये ऐसे ही तरीके अपनाने का हवाला दे रहे हैं. आप के वरिष्ठ नेता सुच्चा सिंह छोटेपुर पूछते हैं, ‘‘क्या 1984 में सिखों का हुआ नरसंहार एक प्रासंगिक मुद्दा नहीं है.’’

इससे पहले भी केजरीवाल द्वारा दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में पंजाबी भाषा को बढ़ावा देने के कदम को पंजाब में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. पार्टी नेता संजय सिंह, सुच्चा सिंह छोटेपुर और साधू सिंह का कहना था कि दिल्ली सरकार का राष्ट्रीय राजधानी की सीमा में पंजाबी भाषा के अध्यापकों को सुनिश्चित करना शिक्षाविदों और दुनियाभर में फैले पंजाबी भाषा के प्रेमियों के लिये गर्व का क्षण है. इसके अलावा उन्होंने दिल्ली के पंजाबी भाषा के शिक्षकों का वेतनमान बढ़ाये जाने के फैसले का भी स्वागत किया.

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इस मुद्दे को लेकर विज्ञापन जारी करने पर कांग्रेस और अकालियों द्वारा हुए विरोध पर टिप्पणी करते हुए संजय सिंह ने कहा, ‘‘अगर सरकार पंजाबी भाषा की बेहतरी के लिये कुछ कर रही है तो लोगों को इसकी जानकारी क्यों नहीं होनी चाहिये? यह अकाली दल-बीजेपी और कांग्रेसियों की पंजाबी विरोधी मानसिकता है जो उन्हें आप का विरोध करने को मजबूर करती है.’’

लेकिन दिल्ली में उनके इस अभियान का मुकाबला करते हुए अकाली नेतृत्व उनके इन दावों का विरोध करता है. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके का कहना है कि डीएसजीएमसी के निरंतर दबाव के चलते केजरीवाल को मजबूरी में यह निर्णय लेना पड़ रहा है.

डीएसजीएमसी कक्षा 9 में छठे विषय के रूप में क्षेत्रीय भाषा के स्थान पर व्यवसायिक पाठ्यक्रम प्रारंभ करने के फैसले को लेकर भी दिल्ली सरकार पर हमला कर रही है और उसके इस फैसले को छात्रों को उनकी संस्कृति से दूर करने की एक दूरगामी रणनीति बता रही है.

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इसके अलावा राजनीतिक रणक्षेत्र में एक और मुद्दा विवादों को हवा देने में काम आ रहा है. वह है पंजाब सहित देशभर में सिखों और हिंदुओं के श्रद्धेय माने जाने वाले सिख गुरू बाबा बंदा बहादुर की शहादत की त्रिशताब्दी (300 वर्ष). सिंह बाबा बंदा मूल रूप से एक हिंदू संत थे जो गुरू गोविंद सिंह जी के संपर्क में आने के बाद सिख धर्म के अनुयायी बन गए. उन्होंने मुगलों से लड़ाई लड़ी और दिल्ली पर कब्जा कर लिया. हालांकि बाद में 1715 में उन्हें दिल्ली में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई.

केजरीवाल ने इस मामले में पहल करते हुए दिल्ली के बारापुला फ्लाईओवर का नाम उनके नाम पर करने की घोषणा कर दी. पंजाब सरकार ने पंजाब के साथ-साथ दिल्ली में भी बंदा बहादुर कर त्रिशताब्दी का जश्न मनाने के लिये विस्तृत कार्ययोजना भी तैयार की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जून के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने की सहमति दे दी है.

इसके अलावा अकालियों द्वारा महरौली में डीएसजीएमसी द्वारा 7.5 एकड़ क्षेत्र में तैयार किये गए एक पार्क में बंदा बहादुर की 20 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की योजना पर भी काम चल रहा है.

पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं.

इतना कुछ हो रहा है तो बीजेपी नेता अरुण जेटली भी कैसे पीछे रहते. उन्होंने कुछ दिन पहले ही सिख सैन्य कमांडर बंदा बहादुर के 300वें शहादत दिवस को चिन्हित करने के लिये स्मरणीय चांदी का सिक्का जारी किया.

उम्मीद है कि आने वाले दिनों में ये राजनीतिक दल पंजाब के राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में करने के प्रयास में दिल्ली में बैठकर ऐसी और भी चाल चलेंगे और जैसे-जैसे चुनावी पारा चढ़ेगा पंजाब का मतदाता खुद को सबसे अधिक ठगा हुआ महसूस करेगा क्योंकि स्थानीय मुद्दे इस राजनीतिक शोरगुल में कहीं दबकर ही रह जाएंगे.

First published: 28 June 2016, 16:42 IST
 
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