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'आप' तो सफल हो गई लेकिन आंदोलन मर गया: मेधा पाटकर

सौम्या शंकर | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
नर्मदा बचाओं आंदोलन की अगुवा वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी अपने पूर्व मित्र अरविंद केजरीवाल से खुश नहीं हैं. मेधा, अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाले इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के साथ हाथ मिलाने वाले नेशनल एलायंस फाॅर पीपल्स मूवमेंट (एनएपीएम) की संयोजक भी हैं. जनवरी 2014 में उन्होंने भी आम आदमी पार्टी का साथ पकड़ा था.लोकसभा चुनाव में उत्तर पूर्वी मुंबई सीट से उन्होंने आप के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गईं. कुछ समय बाद आप में जिस तरह की घटनाएं हुई उनसे मेधा का पार्टी से मोहभंग हो गया और उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया.अरविंद केजरीवाल की सरकार के एक साल पूरा होने के मौके पर मेधा ने कैच के साथ विस्तार से बातचीत की. बातचीत में उन्होंने खुलकर आप छोड़ने के निर्णय और सरकार के प्रदर्शन के बारे में अपने विचार रखे. ‘‘आंदोलन आधारित राजनीति’’ और ‘‘चुनावी राजनीति’’ के बीच के महत्वपूर्ण फर्क को रेखांकित करते हुए पाटकर बताती हैं कि आप का नैतिक पतन तभी प्रारंभ हो गया जब लोगों लोगों की चिंताओं पर आधारित विचारधारा के मुद्दे राजनीति से मात खा गए.पेश हैं बातचीत के अंशः

आप एक समय अरविंद केजरीवाल की मुखर समर्थक रहीं फिर आम आदमी पार्टी के साथ अपने संबंध क्यों खत्म किये?

बहुत से लोगों का मानना है कि चुनावी राजनीति वास्तव में जनता से जुड़े मुद्दों पर इतना ध्यान नहीं देती जितना आंदोलन देते हैं. ऐसा इसलिये है क्योंकि वोटों के लिए होने वाली लड़ाई खदम अलग होती है. हम आंदोलनकारियों के तरीकों से वोट नहीं मिलता. हमारे तरीके में नैतिकता का बड़ा स्थान है. हम ऐसी प्रक्रियाओं का हिस्सा नहीं बनना चाहते जो किसी तरह की धोखाधड़ी पर आधारित हों.

रिप्रेजेंटेशन आॅफ पीपल्स एक्ट-1961 से प्रारंभ हुए चुनाव सुधार अभी तक वह स्वरूप नहीं ले पाए हैं जिसकी अपेक्षा थी. जबतक ऐसा नहीं होता और जबतक आचार संहिता को सख्ती से लागू नहीं किया जाता, जिसके लिये हम लड़ाई लड़ रहे हैं, तबतक चुनावी राजनीति हमारे किसी मतलब की नहीं है.

ऐसा नहीं है कि चुनावी राजनीति को नजरअंदाज किया जा सकता है. लेकिन संसदीय मंच से इतर, जनता के मंच के रूप में, एक ऐसी बाहरी शक्ति का भी निर्माण होना चाहिये जो बिना किसी तरह का समझौता किये सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो.

'आप' के साथ जुड़कर हम इसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थे. लेकिन जब मैंने देखा कि वहां इसकी संभावना न के बराबर है तो मेरे सामने अलग होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

इसके बाद हमने देखा कि 'आप' ने प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को भी अमर्यादित तरीके से पार्टी से बाहर निकाल फेंका. तब यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र के लिए बिल्कुल स्थान नहीं है. आखिरकार हमें मजबूरन अपना रास्ता अलग करना पड़ा.

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आंदोलन आधारित राजनीति ही राजनीतिक मंच को बेहतर तरीके से संभाल सकती है.बीते वर्षों के दौरान भूमि अधिग्रहण, सूचना का अधिकार, मनरेगा और वन अधिकार अधिनियम सहित कई नए अधिनियम सिर्फ आंदोलनों के चलते ही चरितार्थ हो पाए हैं. ये किसी विपक्षी दल का उपहार नहीं हैं. क्या हम इसे हासिल कर सकते हैं?

मैं ऐसा नहीं कह रही हूं कि हमें चुनावी राजनीति की बिल्कुल अनदेखी करनी चाहिए. यहां तक कि आंदोलन आधारित राजनीति में भी हमें चुनावी राजनीति पर बहुत पैनी नजर रखनी पड़ती है.

आपने तो 'आप' के टिकट पर महाराष्ट्र से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था?

तब मुझे ऐसा महसूस हुआ था कि हम पार्टी के माध्यम से लोगों की लड़ाई लड़ सकते हैं. लेकिन जल्द ही हमें इस बात का इल्म हो गया कि यह असंभव तो नहीं है लेकिन एक दूर की कौड़ी है. उस दौरान हमने पाया कि बिना समझौता और जोड़तोड़ के यह संभव नहीं है. मैं इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी.

आप किस तरह के समझौतों की बात कर रही हैं?

जातीय गणित, इसके अलावा एक ही व्यक्ति के चारों तरफ केंद्रित रखकर किया गया समूचा प्रचार अभियान. ये कुछ ऐसे मुद्दे थे जिनसे उस दौरान हमारा सामना हुआ. नेतृत्व की भूमिका को अवतार के रूप में प्रस्तुत करना हमारे लिये संभव नहीं था.

अगर आप बीते दो वर्षों पर नजर डालें तो तमाम चुनाव व्यक्तिगत हुए हैं और उनका तानाबाना एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द बुना गया है. इस लिहाज से अगर हम नर्मदा बचाओ आंदोलन का आकलन करें तो यह भी आपके (मेधा पाटकर) नेतृत्व के आसपास ही केंद्रित है. आपको ऐसा नहीं लगता कि इससे लोगों को एक मंच पर लाने की दिशा में फायदा होता है?

करिश्माई नेतृत्व की अवधारणा सिर्फ आंदोलनों या राजनीति में ही नहीं बल्कि भारतीय समाज में भी मौजूद है. फर्क सिर्फ इतना है कि चुनावी राजनीति में आप पहले एक नेता का चुनाव कर लेते हैं और फिर लोगों को उसके चारों तरफ जोड़ने का प्रयास करते हैं.

हालांकि आंदोलनों में भी इस बात की पूरी संभावना होती है कि कुछ चुनिंदा चेहरे आंदोलनों के प्रतीक के रूप में चित्रित कर दिये जाते हैं और ऐसा मुख्यतः मीडिया द्वारा किया जाता है. लेकिन ऐसा भी कई वर्षों के संघर्ष और कड़ी मेहनत के बाद ही होता है. नेतृत्व इसी के चारों तरफ केंद्रित होता है, सिर्फ हाई कमांड मेकेनिक्स के कारण नहीं.

चाहे पाॅक्सो से जुड़े अभय साहू हों या फिर किसान आंदोलनों से जुड़े शरद जोशी, इन्होंने लोगों के साथ खुद को जोड़ने के लिये वर्षों तक कड़ी तपस्या की है. अपनी बेहतरीन उपलब्धियों के सहारे ये लोग आंदोलनों के अगुवा के रूप में स्थान बनाने में सफल रहे हैं. इनके पास खर्च करने के लिये बेहिसाब पैसा नहीं था जैसे कि नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान में 21 हजार करोड़ रुपये खर्च किये गए. आंदोलनों से जुड़े लोगों को यह भलीभांति पता है कि यह समूचे समूह का प्रयास है जो मायने रखता है.

तो आपका कहना है कि केजरीवाल ने आईएसी आंदोलन पर अपने फायदे के लिये कब्जा कर लिया?

मैं इसे इस प्रकार से नहीं देखती. निश्चित ही कुछ लोगों के एक समूह ने नेतृत्व की भूमिका निभाई. आखिरकार अन्ना हजारे को एक राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में पेश करना एक सोचा-समझा कदम था. ऐसा इसलिये नहीं किया गया था कि अन्ना आम लोगों का प्रतिनिधित्व करेंगे, बल्कि इसके पीछे अन्ना के व्यक्तित्व को पेश करना और अरविंद केजरीवाल और उनके समूह का योगदान था जिन्होंने इस मौके का बेहद प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया.

इसे कब्जा कहने की बजाय मैं कहूंगी कि कुछ चुनिंदा लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये जल्दबाजी में इस आंदोलन की दिशा बदल दी. मैं इस शब्द का नकारात्मक रूप से प्रयोग नहीं कर रही हूं. आंदोलन का मार्ग बदलते हुए चुनावी राजनीति में उतरना थोड़ा अतिआत्मविश्वासी कदम था. हालांकि इसने काम किया लेकिन आंदोलन खत्म हो गया.

प्रारंभिक दौर में आपने केजरीवाल और उनके साथियों के जनआंदोनल से चुनावी राजनीति में कदम रखने के कदम का समर्थन किया थ?

प्रारंभ में मैंने उनका समर्थन नहीं किया था. मैंने व्यक्तिगत रूप से अन्ना को केजरीवाल को समर्थन देने के फैसले से पहले सौ बार सोचने की सलाह दी थी. लेकिन हमने उस समय खुलकर इस कदम का विरोध नहीं जताया था. बाद में हमें भी लगा कि शायद देश नए प्रवेशियों और राजनीति के वैकल्पिक तरीकों को स्वीकार करने का मन बना चुका है.

हमने फैसला किया कि यही वह समय है जब हम लंबी छलांग लगा सकते हैं. कुछ समय बाद हमें इस बात का अहसास हुआ कि सबकुछ हमारी उम्मीदें के अनुसार नहीं हो रहा है. हम निश्चित रूप से जीतने के लिये लड़ रहे थे लेकिन अपने सिद्धांतों की कीमत पर नहीं.

पार्टी के विचार आपके सिद्धांतो के साथ कैसे टकरा रहे थे?

लोकतांत्रित प्रक्रियाओं में रुकावटें सामने आ रही थीं. लोगों से जुड़े एजेंडे, शोषित और दबे कुचले समाज के मुद्दों, कार्यशैली में सादगी और जीवनशैली को उचित प्राथमिकता नहीं मिल पा रही थी. इसी तरह की और तमाम बातें लगातार सामने आ रही थीं.

हमारे सामने चुनाव के दौरान और उनके बाद तमाम ऐसे वाकये आए जब आंदोलनों से सामने आए लोगों को उचित प्राथमिकता नहीं दी गई यहां तक कि एक्टिविस्टों के वरिष्ठ समूहों की भी अनदेखी की गई. यहां तक कि उन्हें विश्वास में भी नहीं लिया गया.

इसके अलावा ‘मीडिया की तरफ रुझान’ और प्रचार उन्मुख अभियान के चलते भी संवाद और बहस में गहराई नहीं आ पा रही थी.

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के साथ किया गया व्यवहार बिल्कुल भी सही नहीं था. किसी भी समूह में तकरार होती रहती है. लेकिन जिस हिंसक और अमर्यादित तरीके से उन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया हम उससे बिल्कुल भी सहमत नहीं थे. वह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं था. चूंकि वे लोग पार्टी में होने वाली गलत या विकृत गतिविधियों को सामने ला रहे थे इसलिये उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार किया गया.

पार्टी का घोषणापत्र विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रहे लोगों की राय से तैयार किया गया था. उनके द्वारा गठित की गई 31 कमेटियों के माध्यम से लोगों ने विभिन्न मुद्दों पर अपना सहयोग दिया. इसके अलावा हमारा ऐसा अनुभव भी रहा है कि उन्होंने कुछ सिद्धांतों के साथ समझौता किया.

अब जब वे सत्ता में हैं तो हम चाहते हैं कि उनके रुख में स्पष्टता हो. बड़ी कंपनियों और औद्योगीकरण से संबंधित हमारे रुख का मसौदा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरुण कुमार ने तैयार किया था. उसे बिना अधिक बहस के किनारे रख दिया गया. यह तमाम चीजें सत्ता में आने से पहले से ही हो रही थीं. इसके अलावा जनलोकपाल को लेकर उनके द्वारा किये गए समझौते को खुद प्रशांत भूषण उजागर कर चुके हैं.

इसके अलावा जेंडर जस्टिस, आदोलनों का दमन, अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन सहित कई अन्य ऐसे आम लोगों से जुड़े मुद्दे हैं जिन पर वे अपना मन बना चुके हैं.

बीते एक वर्ष में आप दिल्ली सरकार के प्रदर्शन को किस प्रकार से आंकती हैं?

उन्होंने कुछ काम अवश्य किये हैं. यह एक नई पार्टी के लिये बहुत कम समय है. वे कोशिश कर रहे हैं. लेकिन उनके चुने हुए प्रतिनिधियों में विश्वसनीयता की कमी काफी चौंकाने वाली है. हम सोमनाथ भारती और कई अन्यों को बाहर से देख रहे हैं.

जब महत्वपूर्ण व्यक्ति ही घोटालों और विवादों में फंसने लगें तो संकेत अच्छे नहीं होते. ऐसा चुनावी राजनीति में होता है कि निहित स्वार्थों के साथ बिना किस प्रतिबद्धता के संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले लोग साथ आ जाते हैं.

केजरीवाल ने सम-विषम नीति जैसी कुछ नीतिगत पहलों का प्रारंभ किया है. इसके बाद क्या आपको लगता है कि वे लोकलुभावनवाद से बाहर जाकर कुछ क्रांतिकारी नीतियां ला सकते हैं?

उनके भीतर ऐसा करने की क्षमता है. कमी है तो विचारों की गहराई की. इसके बाद लोकप्रियता उनके बचाव के रूप में आ जाती है. अपने अनुभव के दौरान मुझे लगा कि वे अपने कामों में वैचारिक गहराई के बिना, केवल मुद्दों पर आधारित काम कर रहे हैं. एक स्पष्ट एजेंडा और लक्ष्य को प्राप्त करने के स्पष्ट रोडमैप के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता.

वर्तमान में हमारे समाज का तेजी से ध्रुवीकरण हुआ है. कुछ वर्गों को इस बात का डर सता रहा है कि सांप्रदायिकता बढ़ती जा रही है और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नष्ट किया जा रहा है. क्या आपको लगता है कि 'आप' इससे निपटने में सक्षम है? क्या केजरीवाल कम बुरे, या भारत की चुनावी राजनीति में एक व्यवहार्य विकल्प कहे जा सकते हैं?

आप एक विकल्प है. दूसरा विकल्प गठजोड़ तैयार करने का है जैसा उन्होंने बिहार में किया था. निश्चित रूप से 'आप' एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभरी है. और एक छोटी सी समाायवधि में इस स्थान को पाना निश्चित रूप से सराहनीय है. जब तक वे इसके साथ समझौता नहीं करेंगे यह सकारात्मक संकेत है. मुझे नहीं मालूम कि वे दिल्ली से बाहर कितना सफल होंगे और यह सवाल अभी बना रहेगा कि क्या वे एक राष्ट्रीय चुनौती बन पाएंगे.

चुनौतियां सिर्फ कड़े शब्दों और बयानों के माध्यम से नहीं दी जातीं. ये विचारधारा और वैकल्पिक नीतियों से बनती हैं. 'आप' में ऐसा होना अभी बाकी है. औद्योगीकरण और कृषि को लेकर उनका रुख कई चीजों को परिभाषित करेगा. केजरीवाल खुद आम आदमी पर केंद्रित दृष्टिकोण रख सकते हैं. 'आप' ही सिर्फ एक आदर्श विकल्प नहीं है. यह कई विकल्पों में से एक है.

क्या आप स्वयं व्यक्तिगत तौर पर दोबारा चुनावी राजनीति में उतरने की आकांक्षा रखती हैं?

नहीं, मैं बिल्कुल भी ऐसा नहीं सोच रही हूं. राजनीति मेरे या एनएपीएम के लिये अच्छा विकल्प नहीं है. मेरे सामने आंदोलन आधारित राजनीति को मजबूत करने और हस्तक्षेप करने के कई और स्पष्ट, प्रत्यक्ष और प्रभावी अवसर आएंगे. जब सरकारें दमनकारी हो गई हैं तो आंदोलनों के सामने भी अपनी सीमाएं हैं. हमारे सामने कोई भी रास्ता सीधा और सरल नहीं है. हम अतिआत्मविश्वासी होकर नहीं जी सकते. हमें विनम्र होना होगा और हर किसी को उसकी पसंद के रास्ते का चुनाव करने की छूट देनी होगी.

First published: 10 February 2016, 8:39 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

संवाददाता, कैच न्यूज़. राजनीति, शिक्षा, कला, संस्कृति और फोटोग्रॉफी में रुचि.

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