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आज भी उतना ही अनसुलझा है आरुषि हत्याकांड और क़ातिल आज भी आज़ाद!

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 28 April 2017, 16:07 IST

यूं तो दुनिया की सबसे सनसनीखेज मर्डर मिस्ट्री बन चुके आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस में तलवार दंपति को विशेष सीबीआई अदालत ने दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुना दी है. लेकिन फिर भी यह मर्डर मिस्ट्री आज भी पहले ही दिन की तरह एक रहस्य सी नजर आती है.

यूपी-दिल्ली पुलिस, एसटीएफ, सीबीआई की की जांच के बाद और कई तथ्यों को देखने और कई सबूतों को नजरंदाज करने के बाद आखिरकार 25 नवंबर 2013 को गाजियाबाद स्थित स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. 26 नवंबर को राजेश और नूपुर तलवार को आरुषि और हेमराज की हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावस की सजा सुना दी गई.

लेकिन यह मामला आज भी अनसुलझा सा ही नजर आता है. कम से कम इस मामले को पहले दिन से देखने वाले क्राइम रिपोर्टर सुनील मौर्य की किताब तो यही कहती नज़र आती है. नोएडा में एक प्रमुख हिंदी समाचार पत्र के क्राइम रिपोर्टर सुनील मौर्य ने आरुषि मर्डर केस पर एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है, 'क़ातिल जिंदा हैः एक थी आरुषि.'

सुनील ने अपनी इस किताब में 16 मई 2008 यानी जिस दिन आरुषि की लाश उसके घर में बरामद हुई थी, से लेकर सीबीआई द्वारा दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट और उसके बाद उस रिपोर्ट का पोस्टमार्टम बहुत शानदार ढंग से किया. इस किताब में सुनील ने इस घटना से जुड़ी ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं जो अभी तक मीडिया रिपोर्ट्स में सामने नहीं आई थीं.

 

आरुषि के कत्ल के बाद सुबह की पहली तस्वीर (सुनील मौर्य)

किताब में पुलिस-फॉरेंसिक-सीबीआई आदि रिपोर्ट में शामिल सारे सबूतों को सामने लाते हुए ही इनकी कमियां भी गिनाई गई हैं. कैसे पुलिस-सीबीआई की रिपोर्ट में विरोधाभास है और क्यों सीबीआई की पहली जांच टीम के सही डायरेक्शन में जाने पर दूसरी टीम को जांच में लगा दिया, समेत वो बातें शामिल हैं जो हर किसी को चौंका सकती हैं.

यूं तो 2008 के इस हत्याकांड को लेकर हजारों खबरें-रिपोर्टें और फिल्म-कार्यक्रम भी बन चुके हैं और कहा जा सकता है कि किताब इन सब पर ही आधारित हो सकती है. लेकिन इस हत्याकांड को पहले ही दिन से कवर करने के साथ ही सुनील ने इस केस से जुड़े हर शख्स से खुद मुलाकात की और इस मिस्ट्री के ऊपर छाए पर्दे हटाने की कोशिश की.

किताब बताती है कि कैसे एक घटना को कई तरह से पेश किया जा सकता है और कैसे हर चीज के सबूत पेश किए जा सकते हैं. लेकिन इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि पुलिस भले ही कितनी सफाई से ग़लत काम करे, वो भी कोई न कोई सुराग छोड़ देती है.

आरुषि और हेमराज की हत्या के बाद इस केस के खुलने की बजाय मिस्ट्री बनने में सबसे बड़ी भूमिका पुलिस की ही रही. पुलिस ने न सिर्फ जरूरी सबूतों को जुटाने की बजाय इन्हें नजरंदाज कर दिया बल्कि तमाम झूठी रिपोर्ट भी बनाईं. यूपी पुलिस की इसी कार्रवाई के चलते इसका काफी मज़ाक भी बनाया गया.

लेकिन इस किताब के आखिर में दी गई पुलिस-सीबीआई की रिपोर्ट पर आधारित सुनील मौर्य के सवाल वाकई न्याय प्रक्रिया पर तीखे सवाल करते हैं. किताब की शुरुआत में मार्टिन लूथर किंग, जूनियर का एक वाक्य लिखा हुआ है, "Injustice anywhere is a threat to justice everywhere." यानी कहीं पर भी होने वाला अन्याय हर स्थान पर होने वाले न्याय के लिए खतरा है.

 

क़ातिल जिंदा है, में पूछे गए आठ सवाल वाकई 2008 की इस मर्डर मिस्ट्री को एक नए नजरिये से देखने का मौका देते हैं. आखिरी सवाल में खुद सुनील मौर्य ने 15 मई 2008 की रात को क्या हुआ था, के बारे में वैज्ञानिक व अन्य सबूतों के आधार और अपने विश्लेषण-तर्क के बाद इसकी थ्योरी का खुलासा किया है.

इस खुलासे में उन्होंने सीबीआई-पुलिस की थ्योरी पर भी सवाल खड़े किए हैं और इन दोनों जांच एजेंसियों द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक ही उस रात क्या हुआ था, की जानकारी दी है. इतना ही नहीं, सुनील ने राजेश और नूपुर तलवार से भी इस संबंध में बातचीत की और उनके बयान भी डाले हैं और बताया है कि आखिर उनका क्या सोचना है.

आखिरी में यही कहना सटीक लगता है कि आरुषि-हेमराज मर्डर केस के मामले में अब एक नया मोड़ सामने आ गया है और यह ऐसा घुमावदार मोड़ है जो इस मिस्ट्री को या तो पूरी तरह सुलझाता नजर आता है या फिर उलझाता.

हालांकि इस बीच यह बताना जरूरी है कि फिलहाल तलवार दंपति ने विशेष सीबीआई अदालत द्वारा उन्हें दी गई आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की है और इसकी जल्द सुनवाई शुरू होनी है.

क्यों लिखी किताब

किताब के लेखक सुनील मौर्य से जब पूछा कि आखिर क्या वो वजह है जिसने उन्हें इतने सालों बाद यह किताब लिखने पर मजबूर किया? इसके जवाब में सुनील ने बताया कि आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस पर वो शुरुआत से लगे हुए थे और जिस हिसाब से इस मामले में जांच अधिकारी बदलते रहे, उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया.

इसके बाद उन्होंने खुद से एक तरह की जांच शुरू कर दी और इस केस से जुड़े तमाम लोगों से स्वयं मुलाकात की और यहां तक की जांच अधिकारियों से भी और उनसे जुड़े लोगों से भी पूछा और पाया कि जिन अधिकारियों से खुद को केस से अलग हटा लिया है वे नहीं चाहते थे कि ऊपर से पड़ रहे दबाव के चलते वे राजेश तलवार को गुनाहगार साबित करें.

इसके अलावा सारी जांच रिपोर्टों को भी यह पता चला कि अदालत में केस को मजबूती से नहीं रखा गया और उन महत्वपूर्ण बातों को दरकिनार कर दिया गया जिससे यह मामला बिल्कुल साफ हो जाता.

हालांकि वो जांच करते रहे और तमाम लोगों से उनकी चर्चा होती तो वे यही कहते कि जब तुम्हें इतना पता है तो सच्चाई को सामने क्यों नहीं लाते. इस बीच आरुषि पर बनी फिल्म भी रिलीज हो गई और जब इसे देखा तो लगा कि इस फिल्म में भी कई बातों को हटा दिया गया है. बस उस दिन ही सोच लिया कि अब कुछ भी हो जाए, सच्चाई सामने लाकर रहूंगा और फिर किताब लिखने में जुट गया.

किताब की अनोखी बात

इस किताब में आरुषि का मर्डर से कुछ घंटे पहले ली गई आखिरी फोटो और मर्डर के बाद की पहली फोटो से भी केस के रहस्य को सुलझाने की कोशिश की गई है. दरअसल, लेखक का यह मानना है कि दोनों फोटो बहुत बड़े सबूत हैं जो केस के लिए काफी अहम है. इस फोटो को लेकर सीबीआई की एक्सपर्ट कमेटी की उस रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है जिससे पता चलता है कि कत्ल वाली रात आखिर क्या हुआ होगा. दोनों फोटो अभी तक कभी मीडिया में इस तरह से सामने नहीं आईं.

इसके अलावा नोएडा पुलिस के रिटायर्ड डीएसपी केके गौतम के उस स्टिंग वीडियो को भी इस किताब में पहली बार बताया गया है जिससे पता चलता है कि आखिर इस सनसनीखेज मर्डर का अनसुलझा राज क्या है?

First published: 28 April 2017, 15:33 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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