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डीयू में पढ़ाई और एडमिशन दोनों जारी

प्रणेता झा | Updated on: 24 August 2016, 12:36 IST

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छठी कट-ऑफ का एडमिशन खत्म हो चुका है. अब 24 अगस्त को सातवीं कट-ऑफ लिस्ट आएगी. प्रोफसरों का कहना है कि इस साल लगभग 6,500 खाली सीटों पर प्रवेश को लेकर कट-ऑफ निकाली जा रही है. कक्षाओं में खाली सीटों को भरना बड़ी समस्या बनी हुई है.

पिछले साल दस कट-ऑफ लिस्ट निकाली गई थी. इस साल, हालांकि डीयू ने पहले केवल पांच कट-ऑफ लिस्ट निकालने का ही निश्चय किया था और खाली सीटों को मेरिट के आधार पर भरना तय हुआ था.

डीयू में जून में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हुई थी. विश्वविद्यालय ने पांच कट-ऑफ लिस्ट निकाली. इस सूची के आधार पर प्रवेश 22 जुलाई को खत्म हो गया. एडमिशन मेरिट लिस्ट के आधार पर हुए. मेरिट लिस्ट के आधार एडमिशन प्रोसेस 16 अगस्त को खत्म हो गया. इसके बाद भी सीटें खाली रह गईं. तब विश्वविद्यालय ने खाली सीटों को भरने के लिए तीन और कट-ऑफ लिस्ट निकालने का निश्चय किया. 20 अगस्त को छठवीं कट-ऑफ निकाली गई और उसी दिन से एडमिशन शुरू हुए. अब 24 अगस्त को सातवीं कट-ऑफ आएगी. इसके बाद आठवीं लिस्ट 29 अगस्त को निकाली जाएगी और 30 अगस्त तक एडमिशन होंगे.

वैसे कक्षाएं शुरू हुए एक माह से ज्यादा हो चुका है. लेकिन अधिकांश कॉलेजों में इस साल छात्रों की संख्या को लेकर अनिश्चय की स्थिति बनी हुई है. इसकी एक वजह यह है कि डीयू ने इस बार पहले ही प्रथम वर्ष के छात्रों को अन्य कॉलेजों में मेरिट लिस्ट की व्यवस्था के आधार पर फिर से आवेदन करने की अनुमति दे दी थी. और इसके बाद अब तीन और मेरिट लिस्ट निकाली जा रही है.

डीयू ने यह अनुमति छात्रों की मांग पर दी थी. क्योंकि हर छात्र यही चाहता है कि उसे ज्यादा प्रतिष्ठित कॉलेज मिले और इसके लिए उसे मौके दिए जाएं. इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में प्रवेश पाए छात्र साधारण तौर पर एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में चले गए. ऐसे में सीटें एकबार तो भर गईं और बाद में फिर खाली हो गईं.

एक कॉलेज में एडमिशन प्रक्रिया से जुड़ीं दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर अपने नाम का खुलासा न किए जाने की शर्त पर कहती हैं कि आम तौर पर चलन यही है कि अन्य छात्र जब तक सेटल-डाउन होते हैं, उसके पहले ही टॉप कॉलेजों में सीटें भर जाती हैं. प्रवेश पाने वाले सभी नए छात्रों को फिर से आवेदन करने की अनुमति देने से अधिकांश कक्षाओं में छात्रों की संख्या कम हो गई है. इसका एक परिणाम यह भी निकला है कि कॉलेजों में शिक्षकों की संख्या को लेकर भी सुनिश्चित नहीं हुआ जा सका है.

वह कहती हैं कि मेरे कॉलेज के साथ ही अन्य कॉलेजों में भी कुछ तदर्थ शिक्षकों को नियुक्त किया गया था. अब कक्षाओं में छात्रों की संख्या घट जाने से उनकी नियुक्ति निरस्त की जा सकती है. वह सवाल करती हैं कि यदि एक बार फिर छात्रों की संख्या बढ़ जाए तो हम क्या करेंगे?

एक अन्य समस्या जनरल कैटेगरी के छात्रों के प्रवेश को लेकर है. पुनः आवेदन की प्रक्रिया से हालात और जटिल हुए हैं. वह बताती हैं कि यदि 120 योग्य छात्र हैं और उनकी कट-ऑफ 92 फीसदी तक है तो हम उन सभी का एडमिशन कर लेंगे. हालांकि हमारे पास उन्हें पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक और ढांचागत व्यवस्था नहीं है.

अक्सर कई छात्र बेहतर कॉलेज मिलने पर छोड़कर चले जाते हैं. लेकिन इस साल तो अस्थिरता बनी हुई है. छात्रों की संख्या भी घट-बढ़ रही है. क्या हम और ज्यादा अध्यापक नियुक्त करते रहें, बाद में उनकी नियुक्ति निरस्त करते रहे और जब छात्र संख्या बढ़ जाए, उन्हें फिर से नियुक्त करें?

दिल्ली विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के सदस्य और मिरांडा हाउस में लेक्चरर आभा देव हबीब कहते हैं कि सबसे ज्यादा समस्या यह है कि एक तो छात्रों की एक माह की पढ़ाई छूट गई है. अब ज्यादातर जगहों पर सेमेस्टर सिस्टम है. कोई भी छात्र, जो देर से कॉलेज में एडमिशन लेगा, उसकी पढ़ाई को कम समय मिलेगा. हबीब कहते हैं कि वार्षिक व्यवस्था में कोई छात्र जब देर से कॉलेज में एडमिशन लेता था तो वह परीक्षा से पहले अपनी पिछला कोर्स पूरा कर लेता था. लेकिन सेमेस्टर व्यवस्था में ऐसा नहीं हो सकता है.

वह कहते हैं कि कक्षाएं एक माह से ज्यादा समय से चल रही हैं. अभी भी नए छात्र आ रहे हैं और कुछ छात्र अन्य कॉलेजों में जा रहे हैं. ऐसे में छात्रों के लिए बहुत थोड़े से अंतराल में महीने भर की पढ़ाई कर अपना छूटा हुआ कोर्स पूरा करना कठिन है. सेमेस्टर खत्म होते ही इम्तहान शुरू हो जाएंगे. अध्यापकों को भी परेशानी महसूस होती है जब वे हर दो दिन पर अपनी कक्षाओं में नए छात्र को देखते हैं. क्या वे पढ़ाए गए पाठ को फिर से पढ़ाएं या आगे का पढ़ाएं?

हबीब यह भी कहते हैं कि अनेक कारणों में से एक कारण यह नुकसान भी है जिसकी वजह से अध्यापक सेमेस्टर सिस्टम का विरोध करते रहे हैं.

नाम ना उजागर करने की शर्त पर एक प्रोफेसर ने कहा कि देखा जाए तो प्रवेश प्रक्रिया का समय बढ़ा देने से दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा के स्तर की वृद्धि वास्तव में नहीं हुई है.

वे कहते हैं कि हम हकीकत में व्यवस्था को खुला नहीं कर रहे हैं. छात्रों को उसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है जिसकी उन्हें व्यवस्था के भीतर जरूरत है. सभी कॉलेजों में रिजर्व्ड कैटेगिरी की सीटें ज्यादा खाली हैं और हर कट-ऑफ लिस्ट ज्यादा कम नहीं हुई है. ऐसे छात्रों को, जिन्हें प्रवेश मिल गया है, वे बेहतर कॉलेज में अगली कट-ऑफ लिस्ट में भी स्थान पा जाते हैं और खुशी-खुशी इस कॉलेज से उस कॉलेज में कूदते रहते हैं.

वह कहते हैं कि जनरल कैटेगरी में कम से कम 1,100 सीटें, ओबीसी कैटेगरी में 2,900, एससी कैटेगरी में 1,000 और एसटी कैटेगरी में 1,500 सीटें खाली हैं.

First published: 24 August 2016, 12:36 IST
 
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