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क्यों आडवाणी ने मचाया मार्गदर्शक मंडल के भीतर खड़मंडल?

अतुल चौरसिया | Updated on: 4 December 2015, 16:31 IST
QUICK PILL
  • बिहार में मिली हार के बाद भाजपा के मार्गदर्शक मंडल ने पत्र लिखकर हार की जिम्मेदारी तय करने की मांग की थी. लेकिन ये मांग जिस तेजी से उठी उसी तेजी से दब भी गयी. इस दौरान ऐसा बहुत कुछ हुआ जो सामने नहीं आया.
  • इस बात की अटकलें हैं कि लालकृष्ण आडवाणी ने  बगावत के दरम्यान ही मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा को बीच राह में छोड़कर मोदी का समर्थन कर दिया.
सहिष्णुता और संविधान की जबर्दस्त बहसों के बीच बीते पखवारे में एक घटना बिल्कुल अछूती रह गई. भाजपा और मार्गदर्शक मंडल के बीच उठा बवंडर तेजी से उठा और फिर शांत हो गया.

घात-प्रतिघात का इतिहास भाजपा के मामले में बार-बार देखने को मिलता है. कभी संजय जोशी, कभी कल्याण सिंह, कभी उमा भारती और कभी लालकृष्ण आडवाणी.

भाजपा से सेवानिवृत्त कर दिए गए लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को कभी भी दोस्ताने के लिए नहीं जाना गया. दोनों दिग्गजों का टकराव मीडिया और सत्ता के गलियारों की कुछ खास सुनी-सुनाई जाने वाली गॉसिप का हिस्सा है. हालांकि दोनों दिग्गजों ने अपने टकराव की पर्देदारी हमेशा बनाए रखी.

इन्हीं दोनों नेताओं को 10 नवंबर को एक साथ पाकर कई लोगों को आश्चर्य हुआ. उस रोज मुरली मनोहर जोशी के घर से भाजपा मार्गदर्शक मंडल के नाम से एक पत्र जारी हुआ. जिसमें आडवाणी, जोशी के साथ शांता कुमार, यशवंत सिन्हा की रजामंदी शामिल थी.

यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी और आडवाणी ने पत्र जारी करके बिहार की हार के लिए मोदी-शाह पर निशाना साधा था

भाजपा के "बुजुर्गों का क्लब" नाम से मशहूर मार्गदर्शक मंडल ने जो पत्र जारी किया था उसका मजमून यह था कि बिहार की हार के बाद पार्टी में गहराई से मंथन होना चाहिए, इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा मिलनी चाहिए, पार्टी में खत्म हो चुकी आम सहमति की परंपरा को फिर से जीवित करना चाहिए और यह सारा काम किसी निष्पक्ष व्यक्ति या संस्था के जरिए करवाया जाना चाहिए न कि उन लोगों द्वारा जो इस हार के लिए जिम्मेदार हैं.

इसके बाद बात आई-गई हो गई. इस दिशा में कोई खास प्रगति देखने को नहीं मिली. लेकिन यह अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गई. किन परिस्थितियों में पत्र को कूड़ेदान में डाल दिया गया, पत्र में उठाए गए कुछ जरूरी मुद्दों को नजरअंदाज क्यों किया गया. क्यों अचानक से सक्रिय हुए भाजपा के बुुजुर्ग एक बार फिर से शीतनिद्रा में चले गए आदि.

ऐतिहासिक संदर्भ

कहानी का सिरा दिसंबर 2005 से पकड़ना होगा. भाजपा अपनी स्थापना का सिल्वर जुबली समारोह मुंबई में मना रही थी. भाजपा के दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी ने अगला चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी थी. अपने उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन का नाम घोषित कर दिया था.

लेकिन आडवाणी और उनके समर्थक इस खुशी का पूरा लुत्फ नहीं उठा सके. अटल बिहारी वाजपेयी के बनते-बिगड़ते स्वास्थ्य की अटकलें साल 2006-07तक जारी रहीं. इसकी आड़ में 2006 में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अटल बिहारी वाजपेयी के हवाले से एक पत्र बंटवाया गया जिसमें उन्होंने कथित रूप से पूरी तरह स्वस्थ और चैतन्य होने के साथ दोबारा से सक्रिय राजनीति में आने की बात कही थी.

गोविंदाचार्य और संजय जोशी को भी साथ लेने का प्रयास किया गया था लेकिन दोनों ने ऐन मौके पर इनकार कर दिया

भाजपा के पूर्व विचारक रहे संघ नेता गोविंदाचार्य बताते हैं, "इस पत्र को बंटवाने के पीछे कौन लोग हो सकते हैं, कहना मुश्किल है लेकिन एक बात भरोसे से कही जा सकती है कि इसके पीछे मकसद आडवाणी के नेतृत्व को डावांडोल करना था.” 

बाद में यह अफवाहें उड़ी कि वह पत्र मुरली मनोहर जोशी खेेमे की ओर से बंटवाया गया था, आडवाणी को वाजपेयी का उत्तराधिकारी बनने से रोकने के लिए. इस घटना से भाजपा के दोनों वरिष्ठों के बीच के रिश्तों की असलियत का अंदाजा मिलता है.

यही दोनों दिग्गज जब 10 नवंबर की रात को अचानक से एक दूसरे के सुर में सुर मिलाते दिखे तब सर्दी की शुरूआती सिहरन से शांत पड़ी लुटियन दिल्ली का तापमान यकायक चढ़ने लगा. हालांकि अगले दिन यानी 11 नवंबर को शाम ढलते-ढलते चढ़ा हुआ तापमान सामान्य हो गया. इस चढ़ने और उतरने के दरम्यान क्या हुआ किसी को ज्यादा जानकारी नहीं है.

राष्ट्रपति की कुर्सी

मार्गदर्शक मंडल द्वारा पत्र जारी करने का समय बड़ा दिलचस्प है. यह समूह भाजपा की दिल्ली की करारी हार के बाद भी चुप रहा था. दादरी में हुई अखलाक की हत्या पर भी उसने चुप्पी को तरजीह दी. फिर अचानक से बिहार को उसने मुद्दा क्यों बना लिया.

कह सकते हैं कि पार्टी के भीतर किसी भी तरह के परिवर्तन या सुधार के सुझाव देना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है. हालांकि राजनीति में नैतिक जिम्मेदारी बड़ी फिसलन भरी सड़क है. इस पर चलने से राजनेता अक्सर बचते हैं.

पार्टी के एक नेता गोपनीयता की शर्त पर बताते हैं, "किसी गंभीर परिवर्तन की बजाय ये नेता अपने-अपने लिए कुछ काम पाना चाहते हैं, खुद को पार्टी में प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए पार्टी ने बहुत आसानी से इस विद्रोह को संभाल लिया.”

वरिष्ठ संघ विचारक गोविंदाचार्य इस बात की तस्दीक करते हैं, "आडवाणीजी की नजर 2017 में राष्ट्रपति पद पर टिकी है. यशवंत सिन्हा ब्रिक्स का चेयरमैैन बनना चाहते थे, वो हो न सका. पर अब वे कुछ और से संतोष करना चाहते हैं. तो ऐसे हितों के तहत जुड़े किसी समूह में अलगाव के बीज पड़ने की संभावना बहुत प्रबल होती है.”

मुलाकात जो बनी निर्णायक मोड़

मार्गदर्शक मंडल के इस अचानक हमले से पार्टी में सत्ता संचालित कर रहा समूह सक्रिय हो गया. अगले कुछ दिनों तक प्रधानमंत्री के खासमखास वित्तमंत्री अरुण जेटली काफी सक्रिय दिखे. पहले वे जोशी के घर गए फिर आडवाणी के घर गए. इन मुलाकातों का बहाना बना जेटली की बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र.

इसके अलावा कोई ज्यादा गतिविधि देखने को नहीं मिली. जोशी के घर जिन लोगों ने मीटिंग करके विस्फोटक पत्र जारी किया था उनमें शांता कुमार, यशवंत सिन्हा भी थे. इसके अलावा गोविंदाचार्य और अरुण शौरी भी कुछ समय पहले इनसे मुलाकात करके जा चुके थे.

पत्र जारी होने के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने जोशी और आडवाणी से मुलाकात की

मार्गदर्शक मंडल ने नापतौल कर एक खतरा उठाया था. उनका आकलन था कि इस विद्रोह के बाद भाजपा में मोदी-शाह से असंतुष्टों का पूरा खेमा उनके साथ आ मिलेगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

पार्टी के अंदर मोदी अपने सभी विरोधियों को किनारे लगा चुके हैं जिनमें खुद आडवाणी भी शामिल हैं. मोदी की पीढ़ी वाले ज्यादातर नेता उनकी कैबिनेट में शामिल हैं. कोई भी मोदी के खिलाफ जाकर अपना मंत्री पद दांव पर नहीं लगाना चाहता.

अपने छोटे से अध्यक्षीय कार्यकाल में अमित शाह ने केंद्रीय टीम के अलावा राज्यों के भी संगठन में अपने वफादारों को बिठा दिया है. लिहाजा पार्टी में उनके खिलाफ जाने संभावना बहुत कम हो गई. बल्कि इसका उल्टा हुआ, संगठन में शामिल कई लोग मोदी की नजर में खुद को वफादार साबित करने के लिए शाह का समर्थन करने लगे हैं.

सूत्रों के मुताबिक गोविंदाचार्य और संजय जोशी को भी साथ लेने का प्रयास मार्गदर्शक मंडल ने किया, लेकिन दोनों ने साथ देने से इनकार कर दिया. गोविंदाचार्य और संजय जोशी के इनकार का बड़ा संदेश था. आज भी संघ के भीतर दोनों नेताओं की पहुंच और पकड़ है. लिहाजा संघ से भी मार्गदर्शक मंडल को कोई खास समर्थन नहीं मिला. कृष्ण गोपाल जरूर आडवाणी से मिलने पहुंचे.

एक और दिलचस्प बात यह रही कि इस पूरे प्रकरण के सूत्रधार के रूप में मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा का नाम सामने आया. आडवाणी ने खुद को ऐसे दिखाया जो कि इन लोगों के कहने पर वे बाद में इसमें शामिल हुए थे. जो पत्र जारी हुआ वह भी यशवंत सिन्हा के हस्ताक्षर से जारी हुआ.

हो सकता है यशवंत सिन्हा की अपनी सीमाएं हो. उनके पुत्र जयंत सिन्हा सरकार में वित्त राज्यमंत्री हैं. बेटे का करियर और परिवारवाद जैसी बातें यशवंत सिन्हा को नैतिकता की कोई बड़ी लड़ाई के आड़े आ सकती हैं.

आडवाणी की कभी हां, कभी ना

इस बात पर बहस हो सकती है कि मार्गदर्शक मंडल की इस पूरी कवायद से हासिल क्या हुआ. एक तो उसे थोड़े समय के लिए सुर्खियां मिल गईं और दूसरा पार्टी अब योजनाबद्ध तरीके से मार्गदर्शक मंडल के बेमायने होने का इंतजाम कर सकती है. क्योंकि पार्टी में किसी बड़े बदलाव की कोई संभावना नहीं है. पार्टी और सरकार ने अपना रुख थोड़ा नरम जरूर किया है.

भाजपा नेता के मुताबिक 11 नवंबर को मार्गदर्शक मंडल को चारों तरफ से अलग-थलग पड़ता देख आडवाणी ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदलते हुए खुद को इस अभियान से अलग कर लिया. 24 घंटे के भीतर उन्होंने जोशी और बाकी सहयोगियों को बीच राह में छोड़ दिया. सूत्रों की माने तो इस बदलाव के सूत्र आडवाणी-जेटली की मुलाकात में भी छिपे हो सकते हैं.

पार्टी ने इस दौरान आडवाणी के साथ मिलकर एक काम किया. उन्हें गांधीनगर में स्थानीय निकाय के चुनावों में वोट डालने के लिए भेजा. वहां उनकी एक जनसभा हुई, जहां आडवाणी ने महत्वपूर्ण बयान दिया- “सरकार एकदम सही दिशा में आगे बढ़ रही है. अच्छे दिन जल्द ही आएंगे.” यह 21 नवंबर की बात है.

गांधीनगर में आडवाणी ने बयान दिया कि केंद्र सरकार सही दिशा में जा रही है और अच्छे दिन जल्द आएंगे

बदले हुए घटनाक्रम से मुरली मनोहर जोशी की चिंताएं बढ़ गईं, लिहाजा वे भी सक्रिय हो गए. 23 नवंबर को उन्होंने अपने घर पर पत्रकारों को चाय पार्टी दी. वहां मौजूद कुछ पत्रकारों के मुताबिक जोशी, आडवाणी द्वारा दिए गए इस झटके से निराश थे. कहा जा रहा है कि उन्होंने नागपुर में अपनी बात रखने का फैसला किया. यह दिलचस्प संयोग है कि 27-28 नवंबर को जोशी नागपुर में थे. तक उस दौरे का जमा हासिल अभी तक सामने नहीं आया है.

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान साथ रहे पार्टी के वरिष्ठ नेता शांता कुमार से जब इस बाबत बात की गई तो उनका जवाब था, 'पार्टी ने यह पूरा मामला ही खत्म कर दिया है, इसलिए अब इस पर बात करने का कोई मतलब नहीं है.' यह पूछने पर कि क्या आडवाणी ने आप लोगों का साथ छोड़ दिया, वे कहते हैं, 'मैं उनके बारे में कोई बात नहीं करूंगा. जो कहना था हमने कह दिया. वो बात ही खत्म हो गई.'

शाह को मिली शह

इस घटनाक्रम से दो चीजें हुई हैं. पार्टी के भीतर कार्य संस्कृति में बदलाव को लेकर शुरू हुई बहस फिलहाल समाप्त हो गई है. पार्टी में जारी मोदी-शाह एकाधिकार को लेकर उत्पन्न हुई चुनौती खत्म हो गई है.

इसके साथ ही अमित शाह को अध्यक्ष पद का अगला कार्यकाल मिलने का रास्ता भी साफ हो गया है. आडवाणी के बयान के बाद पार्टी में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी मोदी के फैसलों पर दबाव बना पाने की हैसियत हो.

उस अटकल के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है जिसका इशारा गोविंदाचार्य कर रहे थे कि आडवाणी की नजर राष्ट्रपति पद पर टिकी हुई है. लेकिन उन्होंने राजनीति का जो चरखा दांव चला है उससे उनके वरिष्ठ सहयोगी चकरायमान हैं.

First published: 4 December 2015, 16:31 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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