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काबुल पर चढ़ाई के लिए तैयार एक कसाई हिकमतियार

विवेक काटजू | Updated on: 26 September 2016, 2:38 IST
QUICK PILL
  • 1996 में अफगानिस्तान की राजधानी से हिकमतयार की रवानगी के लिए तालिबान जिम्मेदार थे और अब तालिबान के कारण ही उनकी काबुल वापसी होगी.
  • हिकमतयार को कभी अमेरिका और उसके कहने पर संयुक्त राष्ट्र ने, वैश्विक आतंकी करार दिया था लेकिन अपनी तमाम धारणाओं को दरकिनार करते हुए अमेरिका ने समझौते का स्वागत किया है. 
  • अफगानी लोग चाहते हैं कि अब इस सब का अंत हो और इनमें कुछ तो इसके लिए हिकमतयार जैसे कसाइयों को सहने के लिए भी तैयार हैं. 

अफगानिस्तान की नेशनल यूनिटी सरकार और गुलबुद्दीन हिकमतयार की हिज्ब-ए-इस्लामी पार्टी के बीच समझौता भले कितना ही चर्चा में रहा हो, मगर अब भी यह सौदा मुकम्मल नहीं है. सौदा पक्का करने के लिए, जिन लोगों ने दस्तख़त कर दिए हैं उनके अलावा, हिकमतयार और राष्ट्रपति अब्दुल गनी को भी इस पर अपने हस्ताक्षर करने हैं.

काबुल से प्राप्त ताजा रिपोर्टों से पता चलता है कि हिकमतयार अफगानिस्तान की राजधानी आने में झिझक रहे हैं और नेशनल यूनिटी सरकार इस बात पर अड़ी हुई है कि उन्हें यहीं आकर दस्तख़त करने चाहिए. फिर भी, अगर हिकमतयार काबुल आते हैं तो उन्हें व अन्य अफगानों को यह याद रखना होगा कि 1996 में अफगानिस्तान की राजधानी से हिकमतयार की रवानगी के लिए तालिबान जिम्मेदार थे और विडम्बना यह होगी, जैसा कि इस लेख में बताया गया है, तालिबान के कारण ही उनकी काबुल वापसी होगी.

औचित्य

एनयूजी नेता अपनी निजी बातचीत में इस बात पर जोर देते हैं कि अफगान जिहाद का यह हिंसक और जालिम नेता अब उस समय के हिकमतयार की छाया भर है और अफगान जनता के बीच उनकी भागीदारी हानिकारक नहीं होगी. वैसे ऐसा जरूरी भी नहीं क्योंकि भारी तबाही मचाने वाले यह नेता, इसके ठीक उलट, शांत, मृदुभाषी और विनम्र दिखाई देते रहे हैं. वह चालाक और राजनीतिक निष्ठाओं की अदला-बदली में काफी माहिर हैं, और साथी बदलने को हमेशा तैयार रहते हैं. साल 1996 में काबुल छोड़ने के बाद, शुरुआती तौर पर वह ईरान में रहे लेकिन पिछले एक दशक से वह आईएसआई के संरक्षण में पाकिस्तान में रह रहे हैं. वे उसका उपयोग करते रहे हैं और अब भी कर रहे हैं लेकिन 1992 में नजीबुल्लाह के पतन के बाद वह काबुल पर कब्जा नहीं कर पाए तो तालिबान उनके चहेते बन गए. जिहाद के दौरान यही स्थान हिकमतयार के पास था.

हिकमतयार कड़े सलाफी इस्लामी सिद्धान्तों को मानते हैं. इसी कारण सऊदी उन्हें पसंद करते हैं. उस समय चहेता होने के कारण ही सोवियत मुजाहिदीन विरोधी अमरीकी और सऊदी सहायता का बड़ा हिस्सा आईएसआई ने उन्हें सौंप दिया. इन्हीं सब कारणों से जिहाद के दौरान हिज्ब ए इस्लामी कैडर की कारगुजारियों को अहमद शाह मसूद के आदमियों की करतूत नहीं मानी जाती थी, जिससे उनकी जानी दुश्मनी थी.

यह भी मुमकिन नहीं लगता कि मसूद और सीईओ अब्दुल्लाह के गढ़ पंजशीर घाटी में हिकमतयार की वापसी को आसानी से कुबूल कर लिया जाएगा। इस कारण, चाहे अब्दुल्लाह को कई महीनों की हीलोहुज्जत के बाद, समझौते को स्वीकार करने के लिए मना लिया गया है और चाहे पंजशीरी नेता भी उसका साथ देते दिख रहे हैं लेकिन वे दबाव में होंगे और इससे उनके गढ़ में और आगे जाकर स्वयं एनयूजी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

अशरफ गनी यह दिखाने को बेताब हैं कि मेलमिलाप की चतुराई काम कर सकती है. तालिबान के साथ तो उनकी बात बनी नहीं जो पाकिस्तान से मिल रहे प्रोत्साहन से सफलतापूर्वक उग्रवादी गतिविधियां चला रहे हैं और इसी कारण हिकमतयार पर दबाव बना. अपने राष्ट्रपतिकाल के दौरान हामिद करजई भी यह साबित करने को उत्सुक थे कि सशस्त्र गुटों को हिंसा छोड़ने के लिए मनाया जा सकता है और वे भी अफगानिस्तान में चल रही संवैधानिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बन सकते हैं.

रियायतें

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एनयूजी ने ठोस व सांकेतिक दोनों ही प्रकार की महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं. पहली श्रेणी में इस आश्वासन को शामिल किया जा सकता है कि, ‘कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर हिज्ब ए इस्लामी से सलाह मशविरा किया जाएगा और पार्टी के सैनिक काडर व कमांडरों को सुरक्षा व रक्षा बलों में भर्ती के योग्य समझा जाएगा. हिकमतयार के हिज्ब ए इस्लामी के ‘अमीर’ के रूप में उल्लेख को सांकेतिक रियायत के तौर पर देखा जा सकता है. इसके तहत हिकमतयार को विशेष आयोग द्वारा तय विशेष प्रोटोकोल सुविधाएं दी जाएंगी.’  

एनयूजी ने हिकमतयार के खिलाफ अमेरिकी व संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध हटवाने का भी वादा किया है. साफ है हिकमतयार यही चाहते हैं कि जिहाद में उनकी अग्रणी भूमिका को मान्यता मिले और काबुल के लोगों के नरसंहार को भुला दिया जाए. समझौते को अंतिम रूप दे दिए जाने के बाद, हिज्ब इस्लामी ने, वक्त-जरूरत पर काम आने वाले प्रमाण के तौर पर काबुल के लोगों की हत्याओं पर खेद व्यक्त किया है. 

अमेरिकी कार्मिकों को मारे जाने में हिकमतयार की भूमिका के बावजूद अमेरिका ने इस समझौते का स्वागत किया है

हिकमतयार के बारे में, जिसे कभी स्वयं अमेरिका और बाद में उसके कहने पर संयुक्त राष्ट्र ने, वैश्विक आतंकी करार दिया था, अपनी तमाम धारणाओं को दरकिनार करते हुए अमेरिका ने समझौते का स्वागत किया है. उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्मिकों की हत्याओं में हिकमतयार की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया है. यह इतिहास के सबसे लम्बे युद्ध में से निकल जाने और तालिबान के लिए नजीर बन जाने की अमेरिका की सामरिक निराशा का संकेत है.

फिर भी, इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि तालिबान, इस बात पर गम्भीरता से विचार करेगा, चाहे हिकमतयार वक्ती तौर पर मुल्ला उमर के प्रभाव में हों। ईयू ने भी समझौते का स्वागत किया है और वह चाहता है कि इसे शीघ्र ही लागू कर दिया जाए.

राजनीतिक तंत्र में हिंसक तौर-तरीकों से आए बदलावों, सामाजिक उथल-पुथल और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में अक्षम अर्थव्यवस्था के कारण अफगानिस्तान करीब चार दशक से अस्थिर रहा है. अफगानी लोग चाहते हैं कि अब इस सब का अंत हो और इनमें कुछ तो इसके लिए हिकमतयार जैसे कसाइयों को सहने के लिए भी तैयार हैं. फिर भी कई लोग हैं जिनके लिए उन्हें मंजूर कर पाना मुश्किल होगा. इस कारण उनकी वापसी से चाहे सुरक्षा हालात पर भले ही कोई फर्क न पड़े, इससे राजनीतिक असमंजस और असंतोष जरूर पैदा हो सकता है. जाहिर तौर पर गनी और अब्दुल्ला प्रचार की चाह में यह कीमत देने को इच्छुक हैं. समझदारी का रास्ता तो यह होता कि हिकमतयार की अनदेखी कर दी जाती.

First published: 26 September 2016, 2:38 IST
 
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