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सुप्रीम कोर्ट: अनिश्चितकाल तक इस्तेमाल करने का औजार नहीं है आफ्स्पा

सुहास मुंशी | Updated on: 12 July 2016, 7:51 IST
(कैच न्यूज)

सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (आफ्स्पा) की सबसे घातक आलोचना शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के रूप में सामने आई. संदेश था- आप किसी को मारने के लिए गोली नहीं चला सकते.

यह सेना और अर्धसैनिक बलों के लिए बड़ा झटका था जो पिछले 60 वर्षों से मणिपुर में आफ्स्पा के तहत असीम शक्तियों का आनंद उठा रहे हैं. इन पर इसी कानून की आड़ में अनेक हत्याएं करने का आरोप है, जो कभी न्यायालय के सामने नहीं आए.

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सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने कहा, सशस्त्र बल "एक मक्खी को मारने के लिए लुहार के हथौड़े" का उपयोग नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट पिछले 20 सालों के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए 1528 लोगों के मामले की सुनवाई कर रहा था. पीठ ने मामले की सुनवाई में पाया कि जिन मामलों में सेना को कट्टरपंथी आतंकवादियों का सामना करना पड़ा था उनमें सरकार का तर्क था कि बंधे हाथ के साथ आतंकवादियों, उग्रवादियों और विद्रोहियों से लड़ाई संभव नहीं है.

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अदालत ने पाया कि यह तर्क वैध नहीं है. अदालत ने कहा, "यह मुठभेड़ या ऑपरेशन नहीं है जो जांच के दायरे में है, बल्कि यह तो बंदूक से उठता धुआं है जिसकी जांच हो रही है. एक ऑपरेशन में बल के उपयोग और एक ऐसे घातक बल के उपयोग में गुणात्मक रूप से बहुत अंतर है जो एक मक्खी को मारने के लिए लुहार का हथौड़ा इस्तेमाल करने पर उतारू है. इनमें से पहला जहां आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम है, वहीं दूसरा प्रतिशोध के किया गया काम है."

क्या परिवर्तन आ रहा है?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 85 पन्नों के आदेश में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बातें कही हैं, जिसका प्रभाव मणिपुर ही नहीं, बहुत दूर तक नजर आने की संभावना है. असम, मणिपुर, मिजोरम और कश्मीर जैसे क्षेत्रों में भी इसका असर दिखेगा, जहां आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के नाम पर इसी तरह मानव अधिकारों का उल्लंघन बड़े पैमाने पर हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस देश का प्रत्येक नागरिक "संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन जीने का अधिकार) के तहत सहित सभी मौलिक अधिकारों" के हकदार है, चाहे वह अशांत क्षेत्र में ही क्यों न रहता हो. और इसी कारण "मुठभेड़ के दौरान हुई हत्या" के प्रत्येक मामले में गहन जांच की जरूरत है.

अदालत की टिप्पणियां

1- आंतरिक गड़बड़ी से प्रभावित क्षेत्रों में युद्ध जैसी स्थिति वाला बर्ताव नहीं किया जा सकता. लोगों से दुश्मन की तरह बर्ताव नहीं किया जा सकता और उन्हें गोली नहीं मारी जा सकती.

2- यहां तक कि पहचाने जा चुके उग्रवादियों, आतंकवादियों और खूंखार अपराधियों के मामलों में भी सेना की नियम पुस्तिका (रूल बुक) लागू होगी, जिसमें स्पष्ट निर्देश है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है.

3- यदि सशस्त्र बल किसी व्यक्ति के खिलाफ इतना अधिक प्रयोग करते हैं कि उसकी मौत हो जाए तो इसकी एक स्वतंत्र निकाय द्वारा गहन जांच कराई जानी चाहिए.

4- सेना के अधिकारी किसी हत्या के मामले में आफ्स्पा के तहत प्रदत्त शक्तियों का दावा करने के योग्य नहीं होंगे.

5- आपराधिक मुकदमे के मामले में सेना के अधिकारियों को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा.

6- अशांत घोषित क्षेत्र में भी केवल इस अनुमान पर किसी की हत्या नहीं की जा सकती कि वह दोषी है.

एक महत्वपूर्ण कदम

इन कारणों से कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय को महत्वपूर्ण बताया है. मणिपुर में ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटंगबम उनमें से एक है.

"अदालत ने बहुत उदार तरीके इस कानून की व्याख्या की है. इसमें मानवीय रवैया अपनाया गया है, जो निश्चित रूप से अच्छा और न्याय पाने के रास्ते में एक महत्वपूर्ण कदम है. मुझे लगता है, इस फैसले का असर सिर्फ मणिपुर में ही नहीं, पूरे देश में महसूस किया जाएगा, जहां भी आफ्स्पा लागू हैं."

उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह निर्देश देने की भी जरूरत थी कि इन कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच कैसे की जानी चाहिए. केवल तभी हम न्याय पाने के एक कदम और करीब होते.

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उन्होंने कहा, "जैसा कि कहा जाता है, हलवे का स्वाद उसे खाने में है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है कि इन मामलों की जांच कैसे की जाएगी. यह महत्वपूर्ण बात है. एक बार ऐसा जो जाए, हम पीड़ितों के लिए न्याय पाने के बेहद करीब पहुंच जाएंगे."

जामिया मिलिया इस्लामिया में सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च के निदेशक संजय हजारिका के अनुसार, यह निर्णय "केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को चुभने वाला निर्णय है."

वह कहते हैं, "अटॉर्नी जनरल ने दलील दी थी कि इस तरह के उपायों की बहुत जरूरत थी, क्योंकि उनके अनुसार स्थितियां बहुत खराब थीं. लेकिन मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह सिर्फ खब्दों का खेल है और वह इससे आश्वस्त नहीं है. अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है."

एक बेहतर प्रणाली

लेकिन हजारिका के अनुसार त्रासदी का एक पहलू यह है कि जिन परिवारों ने बंदूक के कारण किसी अपने को खो दिया है, उनकी मदद की जरूरत को हर कोई भूल गया.

"हमें याद रखना होगा कि यह मामला सिर्फ 1,528 व्यक्तियों का नहीं है. यह उन 1,528 परिवारों का मामला है जिन्होंने अपूर्णीय नुकसान झेला है. कोई भी उस पहलू की ओर नहीं देख रहा. ये वे लोग हैं जिन्होंने गहरा आघात झेला है, लेकिन इस पर मंत्रणा के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया, सिवाय उसके जो मंत्रणा उस परिवार के भीतर हुई थी."

उनके अनुसार, आफ्स्पा से प्रभावित लोगों को मानसिक रुप से चंगा करने में मदद करने के लिए एक व्यवस्था, एक प्रणाली बननी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संतोष हेगड़े लंबे समय से इस मानवीय संकट को देख-सुन रहे थे. वे इससे पहले मणिपुर में कथित फर्जी मुठभेड़ों के कई मामलों की जांच के लिए गठित सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी का नेतृत्व कर चुके हैं.

हेगड़े कहते हैं, "मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सेना को उसके कुकृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराकर एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. हम हमेशा यह तर्क देते रहे हैं कि ऐसे क्षेत्रों में सेना की जगह बीएसएफ जैसे कुछ अन्य बल की जरूरत है. क्योंकि सेना को सिर्फ मारने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. जब आप आफ्स्पा के माध्यम से इसे व्यापक अधिकार दे देते हैं तो यह स्वाभाविक रूप से उन्हें और अधिक आक्रामक बना देता है."

हेगड़े के मुताबिक सेना क्या कर सकती है और क्या नहीं, इस पर एक मजबूत न्यायिक मिसाल सुप्रीम कोर्ट ने कायम की है. यह इन क्षेत्रों में रह रहे लोगों और मानव अधिकारों की वकालत करने वालों के लिए राहत का बड़ा सबब है.

First published: 12 July 2016, 7:51 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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