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खैरलांजी के 10 साल: तब दलित सड़कों पर थे, आज मराठे नाराज हैं

अभिषेक पराशर | Updated on: 29 September 2016, 8:22 IST
QUICK PILL
  • 26 सितंबर 2009 को महाराष्ट्र के खैरलांजी गांव में भैयालाल भोटमांगे के पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी. भोटमांगे परिवार के साथ हुई इस बर्बरता के बाद महाराष्ट्र का दलित समुदाय सड़कों पर उतर आया था. 
  • 2016 में मराठा सड़कों पर हैं. वह मराठा लड़की के बलात्कारियों को तत्काल गिरफ्तार किए जाने की मांग के साथ एससी-एसटी एक्ट को खत्म किए जाने की मांग कर रहे हैं. मराठा लड़की के बलात्कार के आरोपी दलित समुदाय से हैं.
  • 29 सितंबर 2016 को खैरलांजी प्रकरण के दस साल पूरे होने जा रहे हैं लेकिन इस एक दशक में महाराष्ट्र की राजनीति ने बड़ी करवट ली है. 2006 में दलित सड़कों पर थे और आज मराठा सड़कों पर हैं जो न केवल बलात्कारियों को मौत की सजा दिए जाने की मांग कर रहे हैं बल्कि अपने लिए आरक्षण भी मांग रहे हैं.

2006 में 29 सितंबर को महाराष्ट्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में था. खैरलांजी गांव में रहने वाले दलित भैयालाल भोटमांगे जब खेत से काम कर घर लौटे तो उनका परिवार उजड़ चुका था. 

गांव में राजनीतिक तौर से शक्तिशाली कुंबी मराठा समुदाय के लोगों ने भोटमांगे की पत्नी सुरेखा, बेटी प्रियंका, बेटे सुधीर और रौशन की हत्या कर दी थी. हत्या किए जाने से पहले भोटमांगे की पत्नी और बेटियों को भीड़ ने पुलिस के सामने नंगा कर पीटा और फिर पूरे परिवार की हत्या कर दी. नागपुर में इस घटना का विरोध कर रहे दलितों की बड़ी रैली के हिंसक होने के बाद ही मीडिया का ध्यान इस तरफ गया.

महाराष्ट्र दलित चेतना की भूमि रहा है. महाराष्ट्र में दलित और उनसे जुड़ा आंदोलन देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले ज्यादा जागरूक रहा है लेकिन इसके बावजूद भोटमांगे घटना के एक दशक बाद भी अपनी न्याय की लड़ाई जारी रखे हुए हैं. 

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक के बाद आता है. 

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में 261 जातियों की सूची दी गई है और इसमें मराठों का कोई जिक्र नहीं है. लेकिन कुनबी जाति को इस सूची में जगह दी गई है. पिछड़े मराठों को कुनबी कहा जाता है.

29 सितंबर 2016 को खैरलांजी प्रकरण के दस साल के बीच महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह से बदल चुकी है.

सितंबर 2008 में भोटमांगे परिवार की हत्या के आरोप में फास्ट ट्रैक अदालत ने छह लोगों को दोषी पाते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई. जुलाई 2010 में बंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने यह कहते हुए दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कैद में बदल दिया कि यह मामला 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' की श्रेणी में नहीं आता था.

जजों ने इस मामले में एससी-एसटी एक्ट लगाने से भी इनकार कर दिया क्योंकि यह मामला जातीय संघर्ष का नहीं था. अदालत ने पाया कि जिन लोगों ने भोटमांगे परिवार की हत्या की वे जातिगत पूर्वाग्रह से पीड़ित नहीं थे बल्कि उन्होंने बदला लेने की नीयत से भोटमांगे परिवार की हत्या की.

कोर्ट के इस फैसले से दलित समुदाय को निराशा हुई. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और भैयालाल भोटमांगे को उम्मीद है कि उन्हें इस मामले में न्याय जरूर मिलेगा. 

दस सालों में बदल गई राजनीति

29 सितंबर 2016 को खैरलांजी प्रकरण के दस साल पूरे होने जा रहे हैं लेकिन इस एक दशक में महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह से बदल चुकी है. 2006 में दलित सड़कों पर थे और आज मराठा सड़कों पर हैं जो न केवल बलात्कारियों को मौत की सजा दिए जाने की मांग कर रहे हैं बल्कि अपने लिए आरक्षण भी मांग रहे हैं.

2006 में दलित समुदाय भोटमांगे परिवार के गुनाहगारों को सजा दिए जाने की मांग के खिलाफ सड़कों पर था और 2016 में कोरपडी गांव की 14 साल की मराठा लड़की का बलात्कार किए जाने के खिलाफ मराठा समुदाय सड़कों पर है. बलात्कार के आरोपी दलित हैं और मराठा समुदाय एससी एसटी एक्ट को खत्म किए जाने की मांग कर रहा है. 

दलितों ने खैरलांजी घटना के गुनाहगारों को इसी कानून के तहत सजा दिए जाने की मांग की थी लेकिन उनके खिलाफ इस कानून की धाराएं नहीं लगाई गईं. 

नौ अगस्त को शुरू हुए मराठा आंदोलन की मांग कोपरडी घटना के आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने के साथ मराठाओं को आरक्षण देने की है. उनकी अहम मांग एससी एसटी एक्ट में बदलाव की है. हालांकि मराठा आंदोलनकारियों का यह कहना है कि उनका आंदोलन दलितों के खिलाफ नहीं है. 

मराठा आंदोलनकारियों का यह कहना है कि उनका आंदोलन किसी भी तरह से दलितों के खिलाफ नहीं है.

लेकिन एससी-एसटी एक्ट को खत्म किए जाने की मांग को लेकर सवाल उठ रहे हैं. आंदोलनकारियों का कहना है कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल हो रहा है लेकिन वह शायद इस बात को भूल रहे हैं कि खैरलांजी कांड के अभियुक्तों के खिलाफ भी एससी-एसटी एक्ट की धाराएं नहीं लगाई गई थीं.

दलित उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए बनाए गए कानून को खारिज किए जाने की मांग का असर केवल महाराष्ट्र की राजनीति तक ही सीमित नहीं रहेगा. 2016 में भी देश में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध में कमी नहीं आई है.

गुजरात के उना में दलित युवाओं के साथ की गई बर्बरता 2016 की ही घटना है. 2014 के मुकाबले देश में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामलों में भले ही कमी आई हो लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा में देश भर के कुल मामलों के मुकाबले 70 फीसदी से अधिक मामले दर्ज हुए.

सरकार की उदासीनता

दूसरी मांग मराठा आरक्षण को लेकर है. दलितों के किसी नेता नेे अभी तक मराठाओं की इस मांग का विरोध नहीं किया है. मतलब साफ है कि उन्हें मराठा आरक्षण को लेकर किसी तरह की आपत्ति नहीं है. लेकिन क्या इससे मराठाओं को आरक्षण मिल पाएगा?

मराठा आरक्षण के मामले में सरकार की भूमिका और उसकी मंशा अहम हो जाती है. पूर्व राज्य सरकार ने मराठाओं को सियासी फायदे की वजह से 16 फीसदी आरक्षण दिया था लेकिन वह अदालत में टिक नहीं पाया. 

मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद कुल आरक्षण संवैधानिक सीमा 50 फीसदी के पार हो जाएगा और इस आधार पर यह कोर्ट में टिक नहीं सकता. 

गुजरात में भी पटेल आंदोलन का सामना कर रही बीजेपी सरकार ने उन्हें 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने की घोषणा की थी लेकिन वह कोर्ट में टिक नहीं पाया.

खैरलांजी कांड के अभियुक्तों के खिलाफ भी एससी-एसटी एक्ट की धाराएं नहीं लगाई गई थीं.

मराठाओं की आरक्षण की मांग मानने और खारिज करने के मामले में सरकार की ही भूमिका सबसे अहम है क्योंकि इस आंदोलन के विरोध में कोई विरोधी आंदोलन नहीं चल रहा है. 

सरकार के सामने विकल्प है कि राज्य सरकार संविधान संशोधन कर आरक्षण विधेयक को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करे. तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण है और यह संवैधानिक 50 फीसदी की सीमा से अधिक है. लेकिन 9वीं अनुसूची में होने की वजह से सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द नहीं कर पाया. 

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा सबसे अहम और शक्तिशाली वोट बैंक है. इसके बावजूद उन्हें आरक्षण नहीं मिलना उनकी मदद से बनती आ रही सरकारों की मंशा का सवाल है. 

इस बीच हर साल की तरह न्याय की आस में 29 सितंबर को दलित और बौद्ध संगठन उस जगह पर रौशनी करेंगे जहां भोटमांगे के पूरे परिवार को मौत की नींद सुला दी गई थी. उस जगह अब वह झोंपड़ी नहीं है, केवल एक लोहे की खाट है जिसे भैयालाल भोटमांगे ने उसी जगह पर रखा है जहां उनके परिवार को जलाया गया था. यह खाट उनकी उम्मीद और यादों का ठिकाना है.

First published: 29 September 2016, 8:22 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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