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सैकड़ों साल से घुमंतु नंदीवाले बन रहे हैं किसान और करने लगे हैं पढ़ाई

शिरीष खरे | Updated on: 3 June 2016, 13:16 IST
(दीपा कृष्णन)

"पहले हमारी जिंदगी नौटंकी से ज्यादा कुछ न थी. रोजी-रोटी के लिए नंदी को लेकर एक गांव से दूसरे गांव, एक शहर से दूसरे शहर मारे-मारे फिरते थे. खेल दिखा-दिखाकर जिंदगी से ऊब चुके थे. न हमारे पास घर थे, न खुद की जमीन ही. हमारे बच्चे स्कूलों में पढऩे नहीं जा पाते थे. ऐसे में तुम्ही बताओ कि हमारी किस्मत बदलती भी तो कैसे?"

यह कहना है तिरमली नंदीवाले नामक बंजारा जाति से जुड़े भूरा गायकबाड़ का. भूरा गायकबाड़ बदलाव की इस कहानी के प्रमुख सूत्रधार हैं.

भूरा गायकवाड़ आगे कहते हैं, "फिर कोई 25 साल पहले हमने इस गांव के पास ही ठहर कर यहां की बंजर जमीन पर खेती करने का फैसला लिया. खेती करना हमारे लिए आसान काम तो था नहीं, इसलिए हमने खेती सीखने का फैसला किया. तब पड़ोसी गांव के दलित समुदाय के किसानों ने खेतों में कुदाली-फावड़ा चलाना सीखाया. कई सालों की मेहनत के बाद अब देखो यह पथरीली जमीन कैसे उपजाऊ बन गई है. और हम लोग कुशल किसान बन गए हैं." 

आबादी का सही आंकड़ा

महाराष्ट्र के जिला बीड़ से करीब 110 किलोमीटर दूर है कनाडी बुड़रुक गांव. तिरमली नंदीवाले बंजारा जाति की कोई 300 लागों की आबादी यहीं बसी है. नंदी बैल पर गृहस्थी लादे चलना और गाना-बजाना तिरमली नंदीवाले बंजारों की पहचान रही है. 

इस जाति के लोग आमतौर पर एक जगह स्थायी निवास बनाकर नहीं रहते, परंपरागत तौर पर यह जाति नंदी बैल के सहारे महाराष्ट्र के एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते हैं. नंदी बैल के साथ खेल दिखाते यह लोग छोटे-छोटे गांव से लेकर पुणे, मुंबई जैसे शहरों की गली मोहल्लों में जाते हैं.

हक के लिए हबूड़ों का संघर्ष

मतदाता सूची में नाम न होने के कारण नंदीवालों की आबादी का सही आंकड़ा सरकार के पास भी नहीं है

घुमक्कड़ जाति होने के कारण ज्यादातर तिरमली नंदीवाले परिवारों के नाम मतदाता सूची से छूट जाते हैं, इसलिए इनका स्थायी पता भी नहीं होता है. आमतौर पर इनके पास कोई दूसरा पहचान-पत्र भी नहीं होता. 

मतदाता सूची में नाम और स्थायी पता न होने के कारण वो आम नागरिकों को मिलने सभी बुनियादी अधिकारों से महरूम हो जाते हैं.  वहीं मतदाता-सूची में नाम न होने कारण महाराष्ट्र सरकार के पास इनकी कुल आबादी का ठीक-ठाक आंकड़ा भी नहीं है.

जहां बलात्कार अनसुना है, शारीरिक संबंध पवित्र कर्म हैं

महाराष्ट्र की जाति व्यवस्था में तिरमली नंदीवाले जाति को उस श्रेणी में रखा गया है जिसकी आजीविका कथित ऊंची जातियों को मंनोरजन कराने से संबंधित है. इस प्रकार की सभी 18 जातियों को यहां 'अलातुदार' नाम से एक श्रेणी में रखा गया है और तिरमली नंदीवाले इसी श्रेणी के अंतर्गत आने वाली एक जाति है. इस पंरपरागत व्यवस्था के बीच कनाडी बुड़रुक गांव में सैकड़ों की संख्या में स्थायी पता बनाकर खेती-बाड़ी करने वाले तिरमली नंदीवाले बंजारों के होने की बात चौंकाती है.

शिक्षा में रुचि

तिरमली नंदीवाले के इस संघर्ष के साथी रहे एडवोकेट सतीश बताते हैं, "आजादी के छह दशक बाद इन्होंने बंजारों जैसी जीवनशैली छोड़कर यहां स्थायी ठिकाना बनाया है. 25 वर्षों के लंबी जद्दोजहद के बाद तिरमली को बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं हासिल हुई हैं. दिलचस्प है कि यह 150 एकड़ जमीन पर सामूहिक खेती भी कर रहे हैं."

मराठवाड़ा के प्रसिद्ध दलित कार्यकर्ता वाल्मिक निकालजे उर्फ वाल्मिक तात्या बताते हैं, "महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज्य भूमि राजस्व संहिता और चारागाह जमीन अधिनियम को 1964 से 2011 के बीच कई बार समय-समय पर संशोधित किया गया है. यह अधिनियम सभी दलित और आदिवासी समुदाय की सभी जाति और उपजातियों को मान्यता देती है कि यदि वे 1991  के पहले से किसी भूमि पर खेती कर रहे हैं तो राज्य सरकार से उस भूमि का पट्टा हासिल करने के पात्र हैं." 

'जनहित' है इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी की वजह

तात्या कहते हैं, "मगर तिरमली नंदीवाले जाति के लोग तो यहां 25 साल से भी अधिक समय से खेती कर रहे हैं, बावजूद इसके उन्हें इस जमीन पर कानूनी मान्यता नहीं मिली है. इसलिए अब अगला संघर्ष जमीन के मालिकाना अधिकार के लिए होगा. मगर इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि तिरमली नंदीवाले जाति के लोगों के भीतर आज किसान होने का विश्वास कूट-कूटकर भरा है और इस भाव ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है."

आत्मनिर्भरता और संगठन

पिछले कुछ समय से अहम बात यह है कि तिरमली नंदीवाले जाति के कुछ युवा अब स्नातक की डिग्रियां हासिल कर रहे हैं. जैसे बीए पास रमेश फुलमारी विशेष सुरक्षा बल का जवान बन गए हैं. रमेश के ही परिवार की रामा फुलमारी ने भी बीए की डिग्री पा ली है. रमेश स्थानांतरण के बाद इनदिनों राज्य पुलिस प्रशासन के तहत बीड़ जिले में ही पदस्थ है.

इसी तरह, कनाड़ी बुड़रुक गांव की साहिबा बाजीराव, यल्लाप्पा, रामा और अप्पा जैसी युवा महिलाएं सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं. 

साहिबा कहती हैं, "हम शिक्षित, आत्मनिर्भर और संगठित हो गए हैं. पंचायत के चुनाव में पंच बनने से लेकर सभी अधिकार पाने की लड़ाई अब खुद लड़ सकते हैं. इस तरह के संघर्ष से हमारे भीतर गर्व महसूस होता है."

मूलत: नंदीवाले आंध्रप्रदेश की जाति है जो पलायन करके महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में आ गई

पापुलर प्रकाशन, मुंबई द्वारा प्रकाशित और बीव्ही भानु द्वारा संपादित पुस्तक 'भारत के लोग: महाराष्ट्र, भाग-3' में नंदीवाले बंजारा जनजाति के बारे में विस्तार से जानकारियां दी गई हैं.

इस पुस्तक में बताया गया है, "नंदीवाले जनजाति के लोग कई छोटे-छोटे समूह में बंटे हैं, जैसे फुलमाली नंदीवाले, देववाले नंदीवाले और तिरमली नंदीवाले. ये अपने नाम के आगे और पहचान के लिए पाटिल, चौगले, कोमती और डौंडीवाले शब्दों का इस्तेमाल करते हैं."

पुस्तक के अनुसार, "मूलत: नंदीवाले आंध्रप्रदेश की जाति है जो पलायन करके महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में आ गई है. तिरमली नंदीवाले कोई 800 साल पहले आंध्रप्रदेश से महाराष्ट्र में आए. वहीं, फुलमाली नंदीवाले 250 साल पहले यहां आए. यह लोग खेल दिखाने के लिए नंदी बैल को प्रशिक्षित करते हैं. नंदीवाले महाराष्ट्र के अहमद-नगर, पुणे, सांगली, सतारा, कोल्हापुर, औरंगाबाद, जलगांव और बीड़ जिलों से खेल दिखाने के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाते हैं."

बदलाव के लिए लंबा संघर्ष

किताब में नंदीवाले समुदाय की संस्कृति इत्यादि के बारे में भी जानकारी दी गई है.

पुस्तक के अनुसार, "खेल दिखाने के दौरान इस समुदाय की महिलाएं बिंदी, चूड़ी और देसी औषधियां बेचती हैं. महिलाओं के साथ पुरुष खेल दिखाते समय पंरपरागत कपड़ों में होते हैं. उनके सिर पर टोपी, बदन पर एक विशेष प्रकार की धोती और कमीज होती है. वे माथे पर कुमकुम का लंबा टीका लगाते हैं. यह टीका भगवान शिव का प्रतीक चिन्ह है जो शिव के प्रति सम्मान व्यक्त करता है. महिलाएं खास तरह की लुंगी और चोली पहनती हैं. यह लोग आमतौर पर पढ़-लिखे नहीं होते. व्यापार, राजनीति और प्रशासनिक सेवा के निचले पदों पर भी नंदीवाले नहीं मिलते."

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भले ही देश के बड़े मानचित्र पर कनाड़ी बुड़रुक गांव कहीं नहीं दिखता हो, लेकिन बदलाव की यह छोटी-सी दिखने वाली कामयाबी के पीछे तिरमली नंदीवाले बंजारा जाति के लोगों का लंबा संघर्ष छिपा है. 

इसके चलते वे बंजारा जीवनशैली से मुक्ति पाकर आज एक अच्छे किसान के तौर पर अपनी पहचान बना सके हैं. इसके लिए दलित कार्यकर्ता वाल्मिक निकालजे और उनके संगठन 'राजश्री शाहु ग्रामीण विकास प्रकल्प, बीड़' के कार्यकर्ताओं की भी अहम सहयोगी भूमिका रही है.

हिंदू धर्म में नंदी बैल शिव की सवारी माना गया है जिसके सिर पर मूर्ति, गले में घंटी और कमर में रंग-बिरंगा कपड़ा बांधने के बावजूद इनकी जिंदगी थी तो मटमैली ही, जिसे आज यह पूरी तरह से अलविदा कह चुके हैं.

First published: 3 June 2016, 13:16 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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