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पांच साल सूखे के बाद मराठवाड़ा पर बाढ़ की मार

अश्विन अघोर | Updated on: 5 October 2016, 7:53 IST
(श्याम भट्ट)
QUICK PILL
  • पांच साल से लगातार सूखे की मार झेलने वाला मराठवाड़ा इलाक़ा इस बार भीषण बाढ़ की चपेट में है. टरना, सीना, मांजरा जैसी जिन नदियों में पांच साल से एक बूंद पानी नहीं था, आज सभी खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं हैं.

महाराष्ट्र के मराठावाड़ा क्षेत्र के आठ जिले लगभग पांच सालों से सूखे से त्रस्त थे. मराठवाड़ा की सभी नदियां और जलाशय सूख गए थे और लोगों को रोजगार के लिए मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पलायन करना पड़ा था. किसानों के लिए सूखे में रहना मुश्किल हो गया था. उन्होंने अपने पशु तक बेच दिए थे. लातूर जिला तो उस समय सूखे का ब्रांड अंबेसडर बन गया था, जब मिराज से सांगली जिले तक पीने का पानी ट्रेन से पहुंचाया जा रहा था.

इस साल मानसून की शुरुआत में भी मराठवाड़ा में पर्याप्त बारिश नहीं हुई. जब महाराष्ट्र के दूसरे क्षेत्रों में औसत से ज्यादा बारिश हुई, मराठावाड़ा न्यूनतम के लिए भी हाथ-पैर मार रहा था. बारिश के शुरुआती दौर से हालात आशाजनक लग रहे थे, पर जब लगातार दो महीने तक सूखे का दौर जारी रहा, तो हालात विकट हो गए.

सरकार 'क्लाउड सीडिंग' शुरू करने की योजना बना रही थी ताकि सूखे इलाके और हताश किसानों को राहत मिल सके. पंद्रह दिन पहले जब बारिश शुरू हुई, सबके चेहरे खिल उठे. इस उम्मीद में कि अब हालात बदलेंगे, किसानों ने खेती शुरू कर दी. बारिश से हरेक के चेहरे पर मुस्कराहट थी. पर यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रही क्योंकि बारिश लगभग पंद्रह दिनों तक लगातार जारी रही.

देखते ही देखते खुशी एक बुरे सपने में बन गई. टरना, सीना, मांजरा जैसी इस क्षेत्र की नदियां, जिसमें लगभग पांच साल से एक बूंद पानी नहीं था, खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं. मांजरा बांध में भरे पानी को नदियों में जाने के लिए खोलना पड़ा, जिसकी वजह से तट के गांवों में बाढ़ आ गई. इससे अनुमानत: अरबों रुपयों की पूरी फसल डूब गई.

सूखे के बाद बाढ़ की तबाही

लातूर के अरुण समुद्रे ने कहा, 'यह इस इलाके पर दोहरी मार है. पहले हम सूखा झेल रहे थे और अब पांच सालों बाद बारिश है, तो तबाही मचा रही है. सूखे के बाद बाढ़ ने मराठवाड़ा की पूरी खरीफ फसल को उजाड़ दिया. आठ जिलों में से चार-नांदेड़, लातूर, बीड और ओसमानानड़ पर सबसे ज्यादा मार हुई है. अकेले लातूर जिले में पांच लाख हैक्टेयर जमीन की फसल बह गई.

मानसून के शुरुआती दिनों में संतोषजनक बारिश से उत्साहित किसानों ने कॉटन, सोयाबीन, अनाज और दालों की बोवाई की थी. पांच साल की टूटन के बाद उन्हें अच्छी आय की उम्मीद थी. पर अब उनकी खुशी को सच में बाढ़ खा गई. लगातार बारिश से न केवल फसलें बह गईं, बल्कि जीवन और संपत्ति का भी नुकसान हुआ.

नागरिक स्रोतों के मुताबिक बाढ़ से इलाके के 1700 गांव, 20 से ज्यादा लोग और लगभग 200 पशु प्रभावित हुए हैं. हालात इतने खराब हो गए हैं कि एनडीआरएफ को उनके बचाव के लिए बुलाया गया. एनडीआरएफ की टीम ने लातूर और नांदेड़ जिलों में विभिन्न इलाक़ों में फंसे 65 लोगों को बचाया.

कैसे मनाएंगे दशहरा दीवाली

समुद्रे ने कहा, 'एक ओर चार सालों तक बिल्कुल बारिश नहीं थी, और इस साल औसत से 140 फीसदी ज्यादा बारिश है. किसानों ने बिना किसी सर्वे के तुरंत क्षतिपूर्ति की मांग की है. यह जायज मांग है, क्योंकि यदि उनके हाथ में पैसे नहीं होंगे, तो वहां दशहरा-दीवाली नहीं मन पाएगी. किसान मराठवाड़ा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.' इलाके में 1 जून से 30 सितंबर तक कुल 556 एमएम बारिश हुई और पिछले तीन दिनों में 581 फीसदी ज्यादा.

राज्य के प्राकृतिक आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बाढग़्रस्त इलाके से लगभग 600 लोगों को स्थानांतरित किया है. उनमें से ज्यादातर लातूर जिले से हैं, जहां से अब तक 525 लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है, जबकि बीड जिले के विभिन्न स्थानों से 70 लोगों को.

प्राधिकरण के स्रोतों के मुताबिक पिछले तीन दिनों में 12 लोग फंस गए. विडंबना यह है कि जो लातूर जिला सूखे का ब्रांड अंबेसडर था, अब बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है. अतिवृष्टि से यहां के 888 गांवों में तबाही मची है.

First published: 5 October 2016, 7:53 IST
 
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