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यूपी बीजेपीः सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ...

रोहित घोष | Updated on: 19 November 2015, 19:07 IST
QUICK PILL
  • बिहार में मिली हार के बाद यूपी बीजेपी में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का दबाव बढ़ रहा है.
  • राजनाथ सिंह, वरुण गांधी, लक्ष्मीकांत बाजपेयी, स्वतंत्र देव सिंह और कुमार महेंद्र सिंह के नाम संभावित उम्मीदवार के तौर पर लिया जा रहा है. लेकिन उम्मीदवार घोषित करने के बाद पार्टी में गुटबाज़ी उभरने का डर.

बीजेपी ने 2014 के बाद से सभी विधान सभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए बगैर चुनाव लड़ा. इसका एकमात्र अपवाद दिल्ली विधान सभा चुनाव है जिसमें पार्टी ने किरण बेदी को आखिरी वक़्त में उम्मीदवार घोषित किया था.

पार्टी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इमेज वोट पाने के लिए काफी है. महाराष्ट्र, झारखण्ड और हरियाणा में ऐसा हुआ भी.

दिल्ली में पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार होने के बाद भी उसे बुरी तरह हार मिली. दिल्ली के बाद पहला विधान सभा चुनाव बिहार में हुआ जिसमें पार्टी ने किसी स्थानीय नेता को मुख्यमंत्री के रूप मे पेश नहीं किया. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में बीजेपी की बड़ी हार के पीछे ये एक प्रमुख कारण रहा.

दिल्ली के बाद पहला विधान सभा चुनाव बिहार में हुआ जिसमें पार्टी ने किसी स्थानीय नेता को मुख्यमंत्री के रूप मे पेश नहीं किया

बिहार के नतीजों के बाद से पार्टी का एक धड़ा इस रणनीति पर पुनर्विचार की मुद्रा में है. उसे अगले साल होने वाले यूपी विधान सभा चुनावों की चिंता है. कुछ नेता तो इस बात को लेकर हैरान नजर आए कि पार्टी ने आखिर इस रणनीति को अपनाया ही क्यों.

यूपी बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कैच न्यूज़ से कहा, "पार्टी ने 2014 के लोक सभा से पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था." वो आगे बताते हैं, "लोक सभा के प्रचार अभियान के दौरान हमने कांग्रेस पर अपना पीएम कैंडिडेट नहीं घोषित करने को लेकर लगातार हमला किया था."

बीजेपी नेता आगे कहते हैं, "फिर हमने विधान सभा चुनावों में अपना सीएम कैंडिडेट घोषित नहीं किया." यूपी में सीएम कैंडिडेट घोषित करके चुनाव लड़ने की बात कहने में जितनी आसान है, उसपर अमल करना इतना आसान नहीं होगा.कैंडिडेट घोषित करने का एक सीधा नतीजा ये हो सकता है कि पार्टी के भीतर गुटबाजी शुरू हो जाए.

यूपी में सीएम कैंडिडेट घोषित करके चुनाव लड़ने की बात कहने में जितनी आसान है, उसपर अमल करना इतना आसान नहीं

चाहे जो हो सबसे बड़ा सवाल ये है कि पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री के उम्मीदवार किसे बनाया जा सकता है? और फिर उसके विरोधी इसपर क्या प्रतिक्रिया करेंगे? कैंडिडेट की तलाश बिहार चुनाव के नतीजे आने से एक दिन पहले यूपी के बीजेपी नेता राज्य के आगामी चुनाव की रणनीति बनाने के लिए कानपुर में बैठक की.

ये नेता लखनऊ से नेशनल हाईवे 25 होते हुए कानपुर जा रहे थे तो रास्ते में वरुण गांधी की तस्वीर और बैनर लगे हुए थे. बैनरों पर लिखा हुआ था, "वरुण लाओ, प्रदेश बचाओ", "प्रदेश को बचाना है तो वरुण गांधी लाना है." अगर प्रदेश बीजेपी का एक धड़ा वरुण गांधी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखना चाहता है तो एक दूसरा धड़ा चाहता है कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह को उम्मीदवार बनाया जाए.

बीजेपी का एक धड़ा वरुण गांधी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखना चाहता है तो दूसरा गृह मंत्री राजनाथ सिंह को

राजनाथ साल 2000 से 2002 तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह सूर्य ने कैच न्यूज़ से कहा, "पार्टी को यूपी चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए." उन्होंने कहा, "मेरी राय में राजनाथ सिंह सबसे अच्छी पसंद हो सकते हैं. उऩकी उम्र भी ज्यादा नहीं है, और वो पहले भी राज्य में मुख्यमंत्री रह चुके हैं." सूर्य कहते हैं कि बीजेपी हर चुनाव में मोदीजी के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकती.

कई नेता बीजेपी की यूपी इकाई के नेतृत्व में भी बदलाव चाहते हैं. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी का कार्यकाल जल्द ही ख़त्म होने वाला है. कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी जगह कोई बिल्कुल नया चेहरा लाया जाए. अध्यक्ष पद की दौड़ में स्वतंत्र देव सिंह और कुमार महेंद्र सिंह को सबसे आगे माना जा रहा है. दोनों ही ठाकुर हैं. बाजपेयी ब्राह्मण हैं और माना जाता है राजनाथ सिंह के खेमे के हैं.

लाख टके का सवाल ये है कि क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह इन नेताओं की बात सुनेंगे?

प्रदेश के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कैच न्यूज़ से कहा, "बाजपेयी ज़मीनी नेता हैं. वो अपने कार्यकाल के दौरान काफ़ी सक्रिय रहे हैं. उन्हें 2017 में अखिलेश यादव के सामने उतारने के लिए एक विकल्प हो सकते हैं." वो कहते हैं, "सीएम कैंडिडेट न होने के कारण हम बिहार में बुरी तरह हारे. इसलिए हमें ऐसा तेजतर्रार पार्टी अध्यक्ष चाहिए जिसे बाद में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी बनाया जा सके."

प्रदेश के कई दूसरे नेताओं ने भी माना कि बिहार में मिली हार के बाद पार्टी के अंदर यूपी में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग जोर पकड़ सकती है. लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह इन नेताओं की बात सुनेंगे?

First published: 19 November 2015, 19:07 IST
 
रोहित घोष @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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