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क्या नीतीश पर हावी हो रहे हैं लालू यादव?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सक्रियता बिहार की महागठबंधन सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है. पटना में जिस तरह से उन्होंने अस्पताल का दौरा कर अधिकारियों को निर्देश दिए उसने सत्ता के दो वैकल्पिक केंद्रों की धारणा को मजबूत किया है.
  • इस दौरान राजधानी पटना में एक ज्वैलर की हत्या ने फिर से जंगलराज की आशंकाओं को हवा दी है. कहा जा रहा है कि सत्ता के दो केंद्रों की वजह से प्रशासन में दुविधा बढ़ रही है.

बेशक वो एक सजायाफ्ता व्यक्ति हैं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं लेकिन आज भी बिहार की राजनीति में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद एक अहम ताकत हैं. हालिया विधानसभा चुनाव में जीत के बाद उनकी धमक फिर से स्थापित हुई है.

नवंबर 2015 का विधानसभा चुनाव परिणाम राज्य की सियासत में उनकी मजबूत दखल को साबित करता है. चुनाव बाद वह न केवल अपनी स्थिति वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि लगे हाथ उसे मजबूत भी करते चल रहे हैं. यादव ने नीतीश कुमार को शासन चलाने की जिम्मेदारी दी लेकिन अब वह बिहार की जनता और सरकार को यह बताना चाहते हैं कि लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति में वापस आ चुका है.

बिहार की राजनीति में 13 जनवरी को उस वक्त गहमागहमी मच गई जब दरभंगा के सिविल सर्जन डॉ. श्रीराम सिंह ने अपने डीएमसीएच के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को चिट्ठी लिखकर कुछ बर्खास्त किए गए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को बहाल किए जाने की बात रखी.

बर्खास्त किए गए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को बहाल किए जाने की मांग यादव के निर्देश पर की गई थी. चिट्ठी में यह भी कहा गया था कि डॉ. सिंह इन कार्यकर्ताओं की नियुक्ति के बारे में सूचित करें ताकि लालू यादव को इस बारे में जानकारी दी जा सके.

आरजेडी प्रमुख की पहचान फिलहाल डिप्टी सीएम तेजस्वी यादस्व के पिता के तौर पर है जिनके पास स्वास्थ्य मंत्रालय का भी प्रभार है. आरजेडी प्रमुख ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्होंने इस मसले को लेकर डॉ. सिंह से बातचीत की थी. उन्होंने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि लोग हर दिन उनसे मदद मांगने आते हैं और वह इससे इनकार नहीं कर सकते हैं.

अगर लोग अभी भी लालू के पास मदद के लिए जाते हैं तो यह उनका अपने नेता पर भरोसा है. उनकी यह धारणा गलत हो सकती है कि लालू यादव सरकारी अधिकारियों को सीधे-सीधे निर्देश दे सकते हैं लेकिन राज्य के लोग अभी भी उन्हें वैकल्पिक सरकार के तौर पर देखते हैं.

अगर लोग अभी भी मदद के लिए लालू के पास जा रहे हैं तो यह लालू में उनके भरोसे की मुहर है

पिछले एक दशक के दौरान जेडीयू और बीजेपी ने लालू को बिहार की सत्ता से बाहर रखा लेकिन उन्होंने यह कभी जाहिर नहीं होने दिया कि उनका दौर बीत चुका है. अब उनकी पार्टी सरकार में बड़ी भूमिका में है और उनका एक बेटा राज्य का डिप्टी सीएम है.

पटना के अस्पताल की निगरानी

तीन जनवरी को लालू ने पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिक साइंसेज का दौरा किया. उन्होंने न केवल अस्पताल का दौरा किया बल्कि इस दौरान मरीजों से मुलाकात करते हुए अस्पताल के अधिकारियों को कई निर्देश दिए. उन्होंने इस बात को माना कि वह जांच करने गए थे लेकिन सबसे अहम बात यह रही कि अस्पताल ने उन्हें यह सब करने दिया.

इंस्टीट्यूट के कर्मचारी और दरभंगा के डॉक्टरों को पता है कि वह आदेश लालू के बेटे की बजाए उनके बेटे और स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव से लेते हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने लालू को 'ना' कहने की हिम्मत नहीं दिखाई.

राज्य में सत्ता के दो केंद्रों की मौजूदगी की भनक से अपराध की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है

क्यों? ऐसा तो नहीं कि राज्य के लोगों को यह लगने लगा है कि भले की सीएम नीतीश कुमार हो लेकिन सत्ता का केंद्र लालू यादव के हाथों में ही है.

राजनीतिक विश्लेषक इस तरह की स्थिति के बारे में आशंका जता ही रहे थे. बल्कि कुछ तो यहां तक कह रहे हैं कि राज्य में सत्ता के दो वैकल्पिक केंद्र होने की वजह से ही अपराध में बढ़ोतरी हो रही है.

कानून और व्यवस्था की स्थिति

जानकारों के मुताबिक राज्य में दो वैकल्पिक केंद्रों की वजह से अपराधियों का मनोबल बढ़ा है. 29 दिसंबर को लालू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य में खराब होती कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर चिंता जताई थी.

उन्होंने 'लुंज-पुंज' अधिकारियों को हटाए जाने की सलाह देते हुए कहा, 'नीतीश सरकार के कुछ अधिकारियों की पोस्टिंग के फैसले को देखे जाने की जरूरत है.' उन्होंने कहा कि अधिकारियों की अपराधियों के साथ मिलभगत है. इसे लोग लालू यादव के प्रशासन में हस्तक्षेप के तौर पर भी देख रहे हैं.

दरभंगा में दो इंजीनियरों की हत्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यदि जांच में कोताही बरती जाती है तो नीतीश कुमार को अधिकारियों को छोड़ना नहीं चाहिए. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर लोगों को उन्हें फोन करना चाहिए और इस घोषणा के साथ ही उन्होंने अपना टेलीफोन नंबर भी सार्वजनिक कर दिया.

नीतीश कुमार को इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को खतरे की घंटी के तौर पर लेना चाहिए था लेकिन जेडीयू ने ऐसा कुछ नहीं किया.

दरभंगा सिविल सर्जन वाले हालिया मामले का हवाला देते हुए जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने लालू का बचाव किया. उन्होंने कहा कि इसमें ऐसा कुछ भी बुरा नहीं है क्योंकि बीजेपी के नेता भी इस तरह से दखल देते रहे हैं.

वहीं विपक्ष ने इसे लेकर सरकार पर हमला बोल दिया. बीजेपी के नेता नंद किशोर यादव ने कहा कि लालू की कार्रवाई सुपर सीएम की तरह है. उन्होंने कहा कि बिहार में साफ तौर पर सत्ता के दो केंद्र हैं और यह सही समय है जब नीतीश कुमार को स्थिति साफ करनी चाहिए.

लालू को सलाह देने का अधिकार: जेडीयू

मुख्यमंत्री अभी तक इस मामले में चुप रहे हैं लेकिन पार्टी के अधिकारी जो कहना चाह रहे हैं उसे जेडीयू के महासचिव और राज्यसभा सांसद केसी त्यागी के बयान से समझा जा सकता है. उन्होंने कैच को बताया, 'यह एकता वाली सरकार है. लालू जी हमारी गठबंधन पार्टी के प्रमुख है और वह राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. उन्हें सरकार को सलाह देने का पूरा अधिकार है.'

पार्टी के एक नेता ने अपना नाम नहीं प्रकाशित किए जाने शर्त पर कहा कि  एक जनप्रतिनिधि होने के नाते हम कई बार सरकारी अधिकारियों से बात करते हैं. हालांकि जब उनसे यह पूछा गया कि लालू सरकारी अधिकारियों को आदेश देने की बजाए उनसे आग्रह भी तो कर सकते थे. इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, 'बेहतर होगा यदि आप यह सवाल आरजेडी नेताओं से पूछें. यह हमारी दोस्ताना पार्टी है. अगर हम कुछ वैसा कहते हैं तो इससे अनावश्यक तौर पर दोनों दलों में दरार पैदा होगी.'

बयान यह बताता है कि स्थिति जेडीयू के लिए अब सुविधाजनक नहीं रही है. लेकिन पार्टी सतर्कतापूर्वक स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और उसे लगता है कि अभी इस मामले में प्रतिक्रिया जाहिर करने का समय नहीं आया है. उन्होंने कहा, 'लोगों को अभी किसी मसले पर हमारे बारे में राय बनाने के लिए कम से कम छह महीने का समय तो देना ही होगा.'

First published: 18 January 2016, 8:15 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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