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निवेदिता मेनन के बाद ‘प्रखर राष्‍ट्रवादियों’ का नया निशाना प्रोफ़ेसर मुकुल मांगलिक

नासिरूद्दीन | Updated on: 26 February 2017, 12:58 IST


‘प्रखर राष्‍ट्रवाद’ भी अजीब शै है. उसे दोस्‍त की नहीं, दुश्‍मन की तलाश रहती है. वह हमेशा अपने दुश्‍मन की खोज में लगा रहता है. जब वह आसानी से नहीं मिलता है तो वह दुश्‍मन खड़ा भी कर देता है. उसका विचार ही दुश्‍मनी के दायरे में सिमटा हुआ है. इसलिए नफरत उसका कुदरती गुण है. उसकी राय में हां में हां न मिलाने का मतलब, ‘राष्‍ट्रवाद की ताप’ का न होना है. यानी सीधे-सरल लफ्ज में राष्‍ट्रद्रोही होना है.


दिलचस्‍प बात है कि ये प्रखर लोग, देश-भक्‍त, समाज-भक्‍त, जन-भक्‍त, गरीब-भक्‍त, स्‍त्री-भक्‍त, दलित-भक्‍त, आदिवासी-भक्‍त नहीं तलाशते हैं. ‘प्रखर राष्‍ट्रवाद’ के खेवैया तो राष्‍ट्रभक्‍त बनाते हैं. ठीक इसी तरह वे राष्‍ट्र-द्रोही भी बनाते हैं. झूठ, प्रपंच, सही को गलत और गलत को सही, ठहरी और बोलती तसवीरों में हेराफेरी, जुमलेबाजी, सोशल मीडिया पर बदजुबानी – राष्‍ट्रद्रोही बनाने के इनके कुछ खास तरीके हैं.


यही नहीं, आमतौर पर ये ऐसे निशाने तलाशते हैं- जो खुद तो जिंदा दिमाग होते ही हैं, वे अपने साथ और कई लोगों को जिंदा सोचने वाला दिमाग बनने के बीज डालते हैं. आमतौर पर ये वे लोग हैं जिनके लिए देशभक्ति के मायने भारत के संविधान का पहला पन्‍ना पर एलानिया लिखे गए लफ्ज हैं.


हम याद करें, ‘प्रखर राष्‍ट्रवादियों’ ने हैदराबाद केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय में ‘दुश्‍मन’ तलाश किया था. पिछले साल जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालयल में यही हुआ. हालांकि, उन्‍होंने वैसे ‘दुश्‍मन स्‍टूडेंट’ और ‘दुश्‍मन टीचर’ तलाश किए जिनके ख्‍याल कभी ढके-छिपे नहीं रहे हैं. इनमें से वे कुछ को जेल भेजने भी कामयाब हो गए.... और लगभग एक साल बाद उन्‍होंने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में यही काम किया है. अभी तक यहां वे स्‍टूडेंट में वे किसी सटीक ‘दुश्‍मन’ की निशानदेही नहीं कर पाए हैं. मगर टीचर में उन्‍होंने एक ‘दुश्‍मन’ पहचान लिया है. यह प्रोफेसर मुकुल मांगलिक हैं. रामजस कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं.

 

निशाने पर मांगलिक

रामजस कॉलेज में एक सेमिनार के आयोजन और उसमें बुलाने वालों के नाम से शुरू हुआ वितंडा ‘राष्‍ट्रवादी’ बनाम ‘राष्‍ट्रविरोधी’ में तब्‍दील होता हुआ मुकुल मांगलिक तक पहुंच गया है. एक वीडियो का छोटा सा हिस्‍सा कुछ साइटों और सोशल मीडिया के मार्फत खूब घूम रहा है. अगर हमारे पास थोड़ा वक्‍त हो तो इसे देखने की जरूर जहमत उठाएं.
एक साइट की हेडिंग कहती है,
DU Professor Caught on Camera Provoking Students to Raise Anti-India Slogans यानी भारत- विरोधी नारे लगाने के लिए स्‍टूडेंटों को उकसाता प्रोफेसर कैमरे में कैद हुआ. अंग्रेजी में लिखी ‘खबर’ कहती है,

‘वह सरकारी कर्मचारी है. दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रामजस कॉलेज में इतिहास का प्रोफेसर है. हम करदाता उसकी और देश भर में फैले दूसरे वामपंथियों की तनख्‍वाह देते हैं. लेकिन मौका मिलते ही, रामजस कॉलेज में एक प्रदर्शन के दौरान वह स्‍टूडेंटों को भारत विरोधी नारे लगाने के लिए उकसाना शुरू कर देता है. हमें एक्‍सूलिसिव वीडियो फुटेज मिला है. इस फुटेज में डीयू के इतिहास के प्रोफेसर मुकुल मांगलिक को ‘कश्‍मीर में आजादी’ के नारे लगाते हुए देखा जा सकता है.

आखिर अब तक भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस प्रोफेसर को बर्खास्‍त क्‍यों नहीं किया गया? क्‍या दिल्‍ली पु‍लिस सो रही है? टीचरों का मुखौटा लगाए इस्‍लामी आतंकवाद के हिमायतियों द्वारा लगातार किए जा रहे विष वमन को क्‍या इंटिलिजेंस ब्‍यूरा ऑफ इंडिया नजरअंदाज करने की कोशिश कर रही है?’तो दूसरी साइट ने शीर्षक दिया है- डीयू प्रोफ़ेसर ने किया शर्मसार , खुलेआम लगाए देशविरोधी नारे ! इस खबर का यह हिस्‍सा पढ़िए-

 

‘वह सरकारी कर्मचारी है. दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रामजस कॉलेज में इतिहास का प्रोफेसर है.'


‘… जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगने के एक साल बाद फिर से कुछ अलगाववादी संगठनों ने इस बार डीयू के रामजस कॉलेज को अपना निशाना बनाया! अलगाववादी नारों के साथ उन्होंने प्रदर्शन शुरू किया और सबसे ज्यादा शर्मनाक बात ये रही कि कथित वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर डीयू के कुछ प्रोफेसर्स भी देश विरोधी नारे लगाते नजर आये ! छात्र संगठन Abvp ने कई विडियो जारी किये है जिनमे छात्र और प्रोफेसर अलगाववादी नारे लगाते नजर आ रहे है.


बताया जाता है कि इस विडियो में देश विरोधी नारे लगाने वाला ये व्यक्ति हिस्ट्री विभाग का प्रोफेसर है और छात्रों को बरगलाने का काम कर रहा है. यदि इस विडियो में दिखाए जा रहे प्रोफेसर वास्तव में इस तरह की गतिविधियों में शामिल है तो ये वाकई चिंता का विषय है! और पुलिस के साथ साथ सरकार को भी इस विषय पर ध्यान देने की जरुरत है कि आखिर क्यों हमारे शिक्षण संस्थान ऐसी गतिविधियों का अड्डा बनते जा रहे है ! इन प्रोफेसर्स को सैलरी किस बात की दी जाती है | क्या हमारे संस्थान भविष्य में अलगाववादी और देशद्रोही पैदा करेगे ??’ ....


SHOCKING- This Man is the Mastermind of Anti-National Drama in Ramjas College !! यानी खौफनाक- रामजस कॉलेज में राष्‍ट्रविरोधी ड्रामा का मास्‍टरमाइंड यही शख्‍स है. इसने पहले वाली खबर को थोड़ा हेर–फेर के साथ पोस्‍ट किया है. और अंत में खबर कहती है, ‘अगर यह सब वे कैमरा के सामने करते हैं तो ज़रा कल्‍पना कीजिए बंद क्‍लासरूमों में वे उन स्‍टूडेंट के दिमागों में कैसी नफरत पैदा करते होंगे जिन्‍हें वे पढ़ाते हैं.’

खबर क्‍या कह रही है

केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय का टीचर सरकारी कर्मचारी होता है.
तथ्‍य- केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय स्‍वायत्‍त संस्‍थान होते हैं. इनमें काम करने वाले लोग, सचिवालय के बाबू की तरह सरकारी कर्मचारी नहीं होते हैं.

हमारे टैक्‍स के पैसे से यह राष्‍ट्रविरोधी काम कर रहे हैं.
तथ्‍य- पहली बात कि अब तक ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि पूरे देश के टीचर सामूहिक रूप से संगठित होकर राष्‍ट्रविरोधी काम में लगे हैं. दूसरी बात, टैक्‍स वे भी उतना ही देते हैं, जितना कोई दूसरा नौकरी पेशा शख्‍स. यही नहीं, किसी को इसी आधार पर अपनी राय रखने से नहीं रोका जा सकता है.


कुछ अलगाववादी संगठनों ने रामजस को निशाना बनाया है.
तथ्‍य- कौन है, अलगाववादी संगठन, यह साफ नहीं है. रामजस का आयोजन कॉलेज का था. तो क्‍या रामजस आतंकवादी संगठन है. रही बात छात्र संगठनों की तो वे कब से अलगाववादी संगठन हो गए हैं. उन पर किसी तरह की कोई पाबंदी तो है नहीं.


ये इस्‍लामी आतंकवाद के हिमायती हैं.
तथ्‍य- अभी तक ऐसा सुबूत नहीं मिला है कि दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय का कोई टीचर तालिबान, आईएसआईएस, जैश ए मोहम्‍मद या लश्‍कर ए तैयबा का कारकून है. या उनके विचार फैलाता है.


‘प्रखर राष्‍ट्रवादियों’ की इन सभी खबर का आधार सिर्फ एक ही वीडियो है. खबर कितनी पढ़ी गई और वहां कितने लोगों ने वीडियो देखा- पता नहीं है. हालांकि फेसबुक के महज दो अकाउंट के मार्फत 24 तारीख को शाम 7 बजे तक इसे 80 हजार से ऊपर लोग देख चुके थे. सवा सौ से ज्‍यादा लोगों ने कमेंट किए हैं. इसके अलावा यह व्‍हाट्सएप पर बहुत तेजी से घूम रहा है.

यह कुल दस सेकेंड की क्लिप है. मुकुल मांगलिक ढेरों स्‍टूडेंट के साथ खड़े हैं और अपने अंदाज में ‘आजादी’ गीत गा रहे हैं. वे क्‍या गा रहे हैं, यह देखना और सुनना बहुत जरूरी है. फिर अपनी राय बनाने की हमें पूरी आजादी है.

 

...क्‍या मांगे


आजादी

अरे मी‍ठी-मीठी

आजादी

अरे प्‍यारी प्‍यारी

आजादी

अरे सुंदर वाली

आजादी

इस वीडियो में मुकुल कहीं से आक्रामक नहीं हैं और न ही उनके स्‍टूडेंट के बाजू फड़क रहे हैं. इनके चेहरे पर हिंसक तनाव नहीं है. वे मुस्‍कुराते हुए आजादी गीत गा रहे हैं. मीठी, प्‍यारी और सुंदर आजादी के गीत. इसमें भारत के संविधान के मूल्‍यों से कौन सी बात टकरा रही है, ये बात तो ‘प्रखर’ लोग ही बता पाएंगे. लेकिन उनकी बातें कानून के दायरे में है. उम्‍मीद है हममें से ज्‍यादातर को जेएनयू के वक्‍त इसी आजादी गीत से शुरू हुई हिंसक बहस याद होगी. यहां भी इसी आजादी के जरिए यह निशाना साधा जा रहा है. लेकिन लखनवी तहजीब में रचे-बसे मुकुल मांगलिक क्‍यों?


मुकुल यानी सौम्‍य, आमतौर पर गर्म जबान से परहेज करने वाले. सुनने की सलाहियत रखने वाले. ज्ञान का आतंक न फैलाने वाले. स्‍टूडेंट के प्रिय. स्‍टूडेंट, जिनके लिए न सिर्फ कॉलेज बल्कि विषय भी बदल कर आते हों. मुरीदों में वे भी हैं, जिन्‍होंने इनकी क्‍लास में बैठने का मौका नहीं मिला. जाहिर है, मुकुल मांगलिक में कुछ तो कशिश है. पर सवाल है, यह कशिश किस चीज की है.

 

क्यों निशाने पर मुकुल

 

दिल्‍ली विश्‍विद्यालय, जेएनयू जैसा एक दायरे में सिमटा कैम्‍पस नहीं है. यहां ऊपरी तौर पर स्‍टूडेंट से संवाद या विमर्श या सवाल-जवाब का सेहतमंद खुला माहौल नहीं दिखाई देता है. हां, जैसा कि पता चलता है कि कुछ कॉलेजों में कुछ टीचरों ने विमर्श की परम्‍परा जरूर बरकरार रखने की कोशिश की है. इनमें मुकुल मांगलिक एक बड़ा अहम नाम हैं.


गौरतलब है, कॉलेजों में आने वाले विद्यार्थी स्‍कूल की दहलीज से सीधे लांघते हैं. उनकी जहनी इमारत बनने की बुनियाद ज्‍यादातर इन्‍हीं कॉलेजों में पड़ती हैं. मुकुल जैसे टीचर इस बुनियाद की नींव पुख्‍ता करने की कोशिश करते हैं. वे आजाद होकर सोचने और सवाल करने का बीज रोपते हैं. वे इस मायने में बड़ा काम कर रहे हैं. इसीलिए उनके स्‍टूडेंट उनसे खौफ नहीं खाते हैं. वे उनसे सवाल करने और उन्‍हें चुनौती देने से घबराते नहीं हैं.


यही बात ‘प्रखर राष्‍ट्रवादियों’ को दिल में कांटे की तरह चुभती है. इन्‍हें तार्किकता भाती नहीं है. सवाल करना तो कतई पसंद नहीं है. उनके सोचने की क्रिया इकतरफा और इकरंगा है. वे चुनौतियों से घबराते हैं. मुकुल मांगलिक कई वजहों से उनके लिए आसान निशाना हैं. हालांकि, वे मुकुल के जरिए दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के सभी सोचने वाले तार्किक दिमागों को निशाने पर ले रहे हैं. यही नहीं, वे जब हमला कर रहे हैं तो मुकुल के साथ कोई भी ‘विशेषण’ लगाने से चूक नहीं रहे हैं. फेसबुक के चंद कमेंट देखें-


‘ऐसे सभी प्रोफेसर को आजादी दो पहले इनकी गर्वमेंट जॉब से फिर भारत से. पकड़ कर सबको तिहाड़ में डालो’
‘ऐसे लोग इस देश में जिंदा क्‍यों हैं’
‘मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि सरकार ऐसे टीचरों के खिलाफ एक्‍शन क्‍यों नहीं ले रही है. बिना जरा भी विचार किए इन्‍हें कैम्‍पस से बाहर फेंक देना चाहिए. खाते हिन्‍दुस्‍तान का है, गाते पाकिस्‍तान का हैं. वहीं भेजो इन सबको जिनको आजादी चाहिए.’
‘इन लोगों की गलत शिक्षा और नीतियों से ये लेफ्टिस्‍ट देश को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर रहे हैं. ... ऐसे सभी गद्दारों को सभी पदों से निकालकर देशद्रोह के लिए कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए.’

‘ऐसे सभी प्रोफेसर को आजादी दो पहले इनकी गर्वमेंट जॉब से फिर भारत से. पकड़ कर सबको तिहाड़ में डालो’


इनमें कई बात तथ्‍यहीन हैं. इन कमेंट में मां-बहन की गालियां, हत्‍या करने की धमकी सभी मिल रही. कहां तक गिनाया जाए. मगर इन सबके बीच भी मुकुल सर के स्‍टूडेंट गाली खाते जूझ रहे हैं. रामजस के एक पुराने स्‍टूडेंट शायद अपने एक साथी के फेसबुक कमेंट के जवाब में अंग्रेजी में लिख रहे हैं,


‘आप मुकुल के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं. वह स्‍टूडेंट की कई पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत रहे हैं. हम उन्‍हें बखूबी जानते हैं. हम सभी जानते हैं कि वे किस तरह की ‘आजादी’ की बात कर रहे हैं’… जब यह सब हो रहा था मैं वहीं था. उन्‍होंने कश्‍मीर के बारे में एक लफ्ज भी नहीं कहा.

उनके लिए, इस आजादी का मतलब है बिना किसी समाजी और सियासी बाधाओं के विचार-विमर्श करने, बोलने और सोचने की आजादी है. हम सब यह आजादी चाहते हैं, जहां जहन पर खौफ का साया न हो और न ही किसी तरह का पूर्वग्रह हो. रामजसियन होने के बाद भी तुम इतनी सामान्‍य सी बात नहीं समझ सके. यह कल्‍पना से परे है.’


इनकी तरह कई और हैं. मगर मुकुल के खिलाफ जिस तरह झूठ के बिना पर नफरत का माहौल बनाने की कोशिश हो रही है, वह बहुत ही चिंताजनक है. खौफनाक भी कहा जा सकता है. ये हिंसा का खुलेआम गौरवगान कर रहे हैं. लोगों को उकसा रहे हैं. इनकी बातों में जहर घुला है. ध्‍यान रहे, नफरती विचार और लफ्जों का हमला, बदन पर हमले की पहली सीढ़ी है. इसमें हमने कई दिमाग पिछले दिनों खोए हैं.

First published: 26 February 2017, 9:16 IST
 
नासिरूद्दीन @CatchHindi

वरिष्ठ पत्रकार

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