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आनंदीबेन की कहानी दरकते भगवा दुर्ग की निशानी है?

अभिषेक पराशर | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
QUICK PILL
  • रविवार को अहमदाबाद में हुई दलितों की रैली में करीब 25 हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया और उन्होंने मरे हुए जानवरों को नहीं उठाने का संकल्प लिया.
  •  इस रैली के अगले ही दिन सोमवार को गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने सोशल मीडिया पर अपना इस्तीफा दे दिया. 
  • पटेल आंदोलन से हुए नुकसान की भरपाई करने में जुटी भाजपा को दलित उत्पीड़न की घटना ने बड़ा झटका दिया जब बड़ी संख्या में दलित सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. 
  • गुजरात में यह बड़ा बदलाव है. 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान दलित कट्टर हिंदुत्व की पहली पंक्ति का सिपाही थे.
  • गुजरात में एक नई राजनीति आकार ले रही है जिसमें मुस्लिम-दलित एक साथ खड़े दिख रहे हैं. गोधरा दंगों के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है.

पाटीदार आंदोलन के बाद अहमदाबाद में हुई दलितों की रैली दूसरी ऐसी बड़ी और सफल रैली रही जिसमें सत्ताधारी भाजपा की कोई भूमिका नहीं थी, बल्कि यह दोनों रैलियां भाजपा के खिलाफ थीं. उना में कथित गोरक्षकों द्वारा दलितों की बर्बरतापूर्वक पिटाई के खिलाफ राज्य के दलित बीजेपी सरकार के खिलाफ तेजी से गोलबंद हुए हैं.

रविवार को हुई रैली में करीब 25 हजार दलितों नेे हिस्सा लिया और उन्होंने मरे हुए जानवरों को नहीं उठाने का संकल्प लिया. रैली के अगले ही दिन मुख्यमंत्री आनंदी बेन ने सोशल मीडिया पर अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए पार्टी आलाकमान से गुजरात बीजेपी को नया नेतृत्व दिए जाने की मांग की. 

आनंदीबेन ने 75 साल की उम्र का हवाला देते हुए खुद को हटाए जाने की मांग की है, लेकिन विश्लेषकों की माने तो उनसे इस्तीफा लिया गया है. पटेल होने के बावजूद आनंदीबेन न केवल पाटीदार आंदोलन बल्कि दलित आंदोलन से पैदा हो रहे सामाजिक असंतोष को खत्म करने में विफल रही हैं. 

बिहार चुनाव में हार के बाद और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित आंदोलन को लेकर बीजेपी परेशान है. वह किसी तरह का जोखिम लेने की हालत में नहीं है. 

गुजरात केडू समाज के महासचिव सागर रबारी बताते हैं, 'बीजेपी इस बात को बखूबी समझती है कि गुजरात में चल रहा दलित आंदोलन सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा.'

गुजरात में पटेल बीजेपी के परंपरागत और वफादार समर्थक रहे हैं. लेकिन हार्दिक पटेल की अगुवाई में चले आंदोलन के बाद पटेलों का एक बड़ा समूह बीजेपी से कट चुका है. पिछले 15 सालों में बीजेपी को सत्ता में पहुंचाने में प्रभावशाली पटेल जाति की अहम भूमिका रही है. 

पटेल आंदोलन से हुए नुकसान की भरपाई करने में जुटी पार्टी को उस वक्त एक और बड़ा झटका लगा जब हाल ही में उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं के खिलाफ दलित बड़ी संख्या में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. उना प्रकरण ने लंबे समय से पनप रहे इस आक्रोश को तात्कालिक अभिव्यक्ति दी.

बीजेपी इस बात को बखूबी समझती है कि गुजरात में चल रहा दलित आंदोलन सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा

पटेल कुछ स्वाभाविक कारण से कांग्रेस को पसंद नहीं करते. इसलिए बीजेपी को यह उम्मीद थी कि पाटीदार आंदोलन के बाद वह नाराज पटेलों को मना लेगी. इसी रणनीति के तहत गुजरात सरकार ने छह लाख रुपये से कम आय वालों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया.

पटेलों की नाराजगी दूर करने की एक और कोशिश के तहत गुजरात सरकार ने पाटीदार आंदोलन के दौरान दर्ज हुए कुल 438 मामलों में से 391 मामलों को वापस लेने का फैसला किया है.

लेकिन अहमदाबाद में हुए दलित महासम्मेलन और उसे मिले मुस्लिम समर्थन ने बीजेपी के सामने वैसी चुनौती खड़ी कर दी है, जिससे निकलने का रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है.

2002 में हुए गुजरात दंगों में दलित कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के सिपाही थे और इन्हें मुस्लिमों के खिलाफ अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया गया था. लेकिन 2016 में एक नई राजनीति आकार ले रही है. अब गुजरात के मुस्लिम और दलित एक साथ खड़े होते दिख रहे हैं. गोधरा दंगों के बाद पहली बार दलित और मुस्लिम किसी मौके पर साथ खड़े हुए हैं. 

हालांकि अहमदाबाद के महादलित सम्मेलन के आयोजक जिग्नेश मेवानी इस पर अलग राय रखते हैं, 'गुजरात के दंगों में दलितों की भागीदारी को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाता रहा है. वास्तव में दलितों और मुस्लिमों के बीच किसी तरह का दुराव नहीं था. लेकिन यह सच है कि वह कभी एक राजनीतिक ताकत के तौर पर उभर नहीं पाए.'

2002 के बाद गुजरात में मुस्लिम समुदाय की स्थिति खराब हुई और दूसरी तरफ दलितों की माली हालत भी बद से बदतर होने लगी. नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बने रहने के दौरान दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शायद ही कोई नीति या योजना बनाई गई और दूसरी तरफ उनके खिलाफ होने वाले उत्पीड़न की घटनाओं में भी तेजी आई. 

मेवानी ने कहा, 'गुजरात में अभी भी करीब 100 गांवों के दलितों को पुलिस सुरक्षा में जीना पड़ रहा है और उनके खिलाफ अपराध के मामलों में कनविक्शन रेट 3 फीसदी से भी कम है.' 

उन्होंने कहा कि हमने अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से हथियार का लाइसेंस देने की मांग की है. साथ ही महासम्मेलन में आए दलितों ने अब मरे हुए जानवरों को हाथ नहीं लगाने का संकल्प लिया है.

दलित-मुस्लिम एका

हालांकि विश्लेषकों की माने तो अभी इस समर्थन को दलित-मुस्लिम एका के मजबूत समीकरण के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी. 

सागर रबारी कहते हैं, 'मुस्लिमों ने बिना किसी शर्त दलितों के आंदोलन को समर्थन दिया है. लेकिन यह देखना होगा कि दलित इस समर्थन को किस तरह से लेते हैं. अगले कुछ महीनों में आंदोलन की संभावित तस्वीर से इस एकता की तस्वीर साफ हो जाएगी.'

पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान गुजरात सरकार की उद्योगपरस्त नीति की कीमत कृषि क्षेत्र पर निर्भर आबादी को चुकानी पड़ी है. गुजरात में अभी भी करीब 45 फीसदी लोग सीधे-सीधे कृषि पर निर्भर है और इनकी एक बड़ी आबादी में बीजेपी की नीतियों को लेकर गहरा असंतोष है. पाटीदार आंदोलन मेंं इस असंतोष की भी भूमिका थी.

हार्दिक पटेल आंदोलन के बाद अब बीजेपी एकमुश्त पटेल वोट बैंक का दावा करने की स्थिति में नहीं है. पिछले दो चुनाव में बीजेपी के खिलाफ पनप रहे असंतोष की आवाज को मजबूत होते हुए देखा जा सकता है.

चुनावी गणित

गुजरात की राजनीति पूरी तरह से कांग्रेस और बीजेपी के बीच घूमती रही है. पिछले चार विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने लगातार जीत दर्ज की है. पिछला लोकसभा चुनाव भी पार्टी एकतरफा जीतने में सफल रही. गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटें उके खाते में गईं.

यह तस्वीर का एक पहलु है जिसमें बीजेपी लगातार जीत रही है. लेकिन इन नतीजोंं का थोड़ा बारीक विश्लेषण करें तो कुछ और चीजें उभरकर समाने आती हैं. मसलन बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट हिस्सेदारी का अंतर तेजी से कम हुआ है.

2002 का चुनाव सांप्रदायिक विभाजन के बीच हुआ था. 182 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी को 127 सीटें मिली जबकि कांग्रेस महज 51 सीटों पर सिमट गई. कांग्रेस के लिहाज से यह आंकड़ा बहुत खराब नहीं रहा.

हिंदुत्व की लहर के बीच बीजेपी को 49.85 फीसदी मत मिला जबकि कांग्रेस को 39.45 फीसदी मत मिले. अगले दो विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के मतों के अंतर में कमी आई है.

2007 और 2012 में बीजेपी को क्रमश: 49.12 फीसदी और 48.30 फीसदी वोट मिले जबकि कांग्रेस को क्रमश: 39.63 फीसदी और 40.59 फीसदी मत मिले.

गुजरात के अहमदाबाद में रविवार को हुए दलितों के महासम्मेलन से बीजेपी सकते में है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दिल्ली आने के बाद राज्य में न केवल पार्टी के जनाधार में कमी आई है बल्कि गुजरात बीजेपी में संगठन के स्तर पर गुटबाजी भी तेज हुई है. आनंदीबेन पार्टी को एकजुट रखने में भी फिसड्डी साबित हुईं. इसका नतीजा स्थानीय चुनाव के परिणामों पर दिखा. 

2010 से  2015 के बीच जिला और तालुका पंचायत में बीजेपी के वोटिंग हिस्सेदारी में तेज गिरावट आई है, वहीं कांग्रेस की मत हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है. इसी साल हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है.

किस्मत भरोसे कांग्रेस

स्थानीय चुनाव के नतीजे साफ बताते हैं कि गुजरात में बीजेपी के खिलाफ असंतोष बढ़ा है. लेकिन कांग्रेस इस असंतोष को भुनाने की स्थिति में नहीं है.

पार्टी का कमजोर संगठन, आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व क्षमता होने केे बावजूद किसी नेता को खुलकर आगे नहीं बढ़ाने की रणनीति से वह बीजेपी के खिलाफ समाज के विभिन्न हिस्सों में पनप रहे असंतोष को आवाज नहीं दे पा रही है. 

यही वजह है कि पार्टी के वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी के दौरे के बावजूद दलित आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस से बराबर दूरी बनाए हुए हैं. 

मेवानी कहते हैं, 'दलितों को लेकर कांग्रेस का कोई अलग रुख नहीं रहा है. जब दलितों के साथ कुछ हो जाता है, तब राहुल गांधी महज दिखावे के लिए वहां चले जाते हैं. दलित इस सांकेतिक समर्थन को बखूबी समझते हैं.' 

उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश गुजरात के विभिन्न जिलों में चल रहे दलित संगठनों को एक मंच पर लाने की है. मेवानी ने कहा कि हमने यह साफ कर रखा है कि हम अपने मंच पर कांग्रेस को जगह नहीं देंगे. लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) को लेकर मेवानी नरम नजर आते हैं.

उन्होंने कहा, 'अगर आम आदमी पार्टी हमारी सभी मांगों को अपनी घोषणापत्र में जगह देती है तो मैं गुजरात के दलितों से इस पार्टी को वोट देने की अपील करुंगा. हालांकि इसे अंतिम फैसला कहना जल्दबाजी होगी.'

मेवानी का इशारा पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजों की तरफ है. गुजरात चुनाव के पहले पंजाब विधानसभा का चुनाव होना है, जहां दलितों की बड़ी आबादी है. पंजाब चुनाव के नतीजों के बाद गुजरात में आम आदमी पार्टी को लेकर दलित आंदोलन के राजनीतिक झुकाव की तस्वीर साफ होगी.

राहुल गांधी के दौरे के बावजूद गुजरात दलित आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस से बराबर दूरी बनाए हुए हैं.

गुजरात में बीजेपी की ताकत सवर्ण, पटेल और ओबीसी रहे हैं जबकि कांग्रेस को एससी, एसटी और मुस्लिमों का समर्थन मिलता रहा है. गुजरात में पटेलों की आबादी करीब 14 फीसदी है और दलितों की संख्या करीब 7 फीसदी है. 

पाटीदार आंदोलन के बाद पटेलों का एक धड़ा बीजेपी से अलग जाता दिख रहा है जबकि दूसरी तरफ मुस्लिम और दलित करीब डेढ़ दशक के अलगाव के बाद एक साथ आते नजर आ रहे हैं. गुजरात बीजेपी का गढ़ रहा है लेकिन अब उसे इसके ढहने का डर सताने लगा है. 

बीजेपी का वोट बिखर रहा है वहीं कांग्रेस को मिलने वाले वोटों का एकीकरण हो रहा है. गुजरात में हमेशा से लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच रही है. बीजेपी अब कमजोर पड़ रही है तो क्या उसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलेगा?

रबारी बताते हैं, 'गुजरात की राजनीति हमेशा से ही दोधुव्रीय रही है. आम आदमी पार्टी गुजरात में दलितों का मुद्दा उठाकर गुजरात की नहीं बल्कि पंजाब और उत्तर प्रदेश की राजनीति कर रही है. उन्हें इसका फायदा पंजाब में मिलेगा. ऐसे में निश्चित तौर पर गुजरात मेें इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा.'

हालांकि कांग्रेस अभी भी हरकत में नहीं आई है. उन्होंने कहा कि अगर पार्टी ने गुजरात में समय पर उम्मीदवारों की घोषणा और मुख्यमंत्री के चेहरे को आगे कर दिया तो स्थिति दूसरी होगी. उत्तर प्रदेश को देखते हुए गुजरात में भी कांग्रेस के ऐसा करने की उम्मीद बनती हैं. 

ऐसे हालात में बीजेपी के पास सांप्रदायिक धुव्रीकरण के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा. देश के अन्य राज्यों के मुकाबले गुजरात इस लिहाज से थोड़ा ज्यादा संवेदनशील है. लिहाज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक धुव्रीकरण को रोकने की होगी. 

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी की इस रणनीति को नाकामयाब करने में सफल रहा है. 

First published: 2 August 2016, 7:57 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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