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क्या उत्तराखंड के बाद अरुणाचल से मिले सबक को याद रखेगी भाजपा?

पाणिनि आनंद | Updated on: 11 February 2017, 6:43 IST

जब बुधवार को अमित शाह अपनी महत्वाकांक्षी राजनीतिक परियोजना नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (एनईडीए) की गुवाहाटी में लांचिंग करने वाले थे, उसी दिन अरुणाचल प्रदेश पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बीजेपी और साथ ही साथ मोदी सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में सामने आया.

एनईडीए के पीछे विचार यह है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में सभी गैरकांग्रेसी दलों को एक साथ लाया जाए और कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर के लिए गठबंधन तैयार हो. हालांकि मुक्ति कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि खुद बीजेपी के लिए आयी है जिसने अरुणाचल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को गिरा कर अपनी सरकार बनाने की काम किया था.

अरुणाचल में बीजेपी के समर्थन से बनी सरकार है. इसका नेतृत्व कांग्रेस के बागी नेता कलिको पुल कर रहे हैं. लेकिन कोर्ट के आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य में 15 दिसंबर 2015 की स्थिति बहाल की जाये, जिसका मतलब यह हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नबाम तुकी सत्ता में वापस आ गये हैं.

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हालांकि तुकी की अल्पमत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा, लेकिन हार पहले से ही बीजेपी की नियति बन चुकी है और राजनीतिक विफलता की वजह से उसे बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है. इससे राज्य में उनका और नुकसान तय है.

दूसरी ओर दिल्ली में भी बीजेपी के लिए काफी पीड़ा और शर्मिंदगी की स्थिति बन गई है. अरुणाचल में इसने जो राजनीति की है, उसे उचित ठहराना इसके लिए काफी मुश्किल साबित हो रहा है.

बड़ा झटका

मौजूदा झटके को इस बात से जोड़ कर देखा जाना चाहिए कि दो महीने पहले उत्तराखंड में भी बीजेपी को इसी तरह की शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी. दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को बीजेपी ने अस्थिर करने की कोशिश की थी. बीजेपी ने इन राज्यों में षडयंत्र रचने और सरकारें गिराने में अहम भूमिका निभायी. दोनों ही राज्यों में कोर्ट का फैसला भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार की कोशिशों और राजनीति के खिलाफ गया है.

यह जगजाहिर है कि मोदी सरकार में बीजेपी के मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता इन राज्यों को कांग्रेस मुक्त बनाने में सक्रिय थे. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के करीबी और प्रबंधक इन राज्यों में सरकारों को गिराने के लिए नियुक्त किये गये थे. कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन और विधानसभा में विरोध का तरीका अपनाया गया. लेकिन, यह सब कुछ उल्टा पड़ गया. और यह दोनों ही राज्यों में हुआ.

आने वाले सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है, मोदी सरकार को अपने कृत्य का खामियाजा दोनों ही सदनों में भुगतना पड़ेगा. बीजेपी के एक नेता बताते हैं, 'सहयोगी संघवाद के प्रति मोदी की प्रतिबद्धता औंधे मुंह गिर चुकी है. 

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बीजेपी कभी ऐसी पार्टी नहीं रही, जिसने राज्यों में ऐसा काम किया हो. दरअसल हमने हमेशा इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी. लेकिन अब सदन के भीतर और बाहर हमारे लिए बड़ी शर्मिंदगी की स्थिति है.” 

ऐसे में यह झटका मोदी सरकार और बीजेपी के लिए भारी शर्मिंदगी है. इससे सदन का मिजाज तय होगा

कोर्ट के इस फैसले के बाद मानसून सत्र में कांग्रेस को सदन में अधिक साथी हासिल होंगे. कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कर दिया कि मोदी सरकार के जो मंत्री यह षडयंत्र रच रहे थे, उनसे पार्टी जवाबदेही और माफी की मांग करेगी.

सिब्बल ने यह भी मांग की है कि कथित तौर पर बीजेपी नेताओं और कुछ कारोबारियों के बीच बातचीत के टेप और ऑडियो रिकॉर्ड की भी जांच होनी चाहिए. सिब्बल ने बताया कि पार्टी पहले ही ये टेप कोर्ट में जमा करा चुकी है.

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ठीक उसी दिन, जब अमित शाह अपनी स्वप्निल परियोजना एनईडीए के उद्घाटन में व्यस्त थे और अगले हफ्ते से संसद का नया सत्र शुरू हो रहा है, ऐसे में यह झटका मोदी सरकार और बीजेपी के लिए भारी शर्मिंदगी है. इससे सदन का मिजाज तय होगा.

गैरबीजेपी दलों द्वारा शासित राज्य अब कांग्रेस के सुर में सुर मिलायेंगे. असम में हुआ लाभ अब अरुणाचल की हार में तब्दील हो रहा है. बीजेपी नेता और अरुण जेटली जैसे कैबिनेट मंत्री, जिन्होंने इन राज्यों में फायदे के बाद मीडिया को संबोधित किया था, सदन में विपक्ष के कटघरे में खड़े होंगे.

बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे ने उसे काफी नुकसान पहुंचाया है. अब मानसून सत्र में मोदी सरकार और बीजेपी के लिए काले बादल और घने होते दिखाई दे रहे हैं.

First published: 14 July 2016, 6:57 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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