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सीबीआई हिरासत में भेजे गए एसपी त्यागी: क्या वे अगस्ता घोटाले की सबसे 'बड़ी मछली' हैं?

प्रकाश नंदा | Updated on: 11 December 2016, 8:12 IST
QUICK PILL
  • अगस्ता वेस्टलैंड डील में कथित घूसखोरी के मामले में पूर्व वायु सेना प्रमुख एस पी त्यागी समेत संजीव त्यागी और वकील गौतम खेतान को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 14 दिसंबर तक की सीबीआई रिमांड पर भेजा दिया है. 
  • तीन साल पहले सामने आए इस घोटाले में पहली गिरफ्तारी एस पी त्यागी की सीबीआई ने की है. उन्हें शुक्रवार को सीबीआई मुख्यालय में पूछताछ के लिए बुलाया गया था और करीब चार घंटे की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया. 
  • वहीं रक्षा सौदों पर पैनी नज़र रखने वाले डिफेंस एक्सपर्ट का मानना है कि इस घोटाले में एस पी त्यागी बड़ी मछली नहीं हैं. 

पूर्व वायु सेना प्रमुख एस पी त्यागी की पहचान अब एक ऐसे बदनाम व्यक्ति के रूप में हो गई है जिन्हें पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार करने के आरोप में सीबीआई ने गिरफ्तार किया है. यह पहली बार है जब सैन्य सेवा के किसी प्रमुख को गिऱफ्तार किया गया है. उनकी ख्याति देश के सबसे अच्छे लड़ाकू पायलट के रूप में है लेकिन गिरफ़्तारी की कार्रवाई से उनकी छवि बुरी तरह कलंकित हो गई है. मगर अगर कोर्ट में उनका बचाव तार्किक तरीके से हो जाता है तो वे अपने सम्मान पर लगे इस धब्बे से मुक्ति पा जाएंगे.

अब तक सीबीआई का जो इतिहास रहा है तो कोर्ट में पेश किए जाने वाले मामलों में बहुत ही कम लोगों को दोषी ठहराया जा सका है. उसे केन्द्र सरकार का 'पालतू तोता'  कहे जाने की थ्योरी के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है. यह भी कहा जाता है कि कई मामलों में सरकार द्वारा अपने उद्देश्यों की खातिर हस्तक्षेप करने के लिए (अपने मित्रों का पक्ष लेने और दुश्मनों को दंडित करने) उसे हुक्म दिया जाता है. आरोपों की असलियत (या इसके अभाव में भी) पर ध्यान दिए बिना ही आरोप मढ़ दिए जाते हैं.

जहां तक त्यागी का सवाल है, तो आरोप है कि पूर्व वायु सेना प्रमुख ने यूपीए के कार्यकाल में अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर (हेलीकॉप्टर बनाने वाली कम्पनी फिनमेकैनिका से) खरीद का जो सौदा हुआ था, उसके मानकों में कमी की और पक्षपात किया. भारतीय अधिकारी वीवीआईपी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे वरिष्ठ नेताओं के लिए 560 मिलियन यूरो (लगभग 3,600 करोड़ रुपए) की लागत वाले 12 हेलीक़ॉप्टरों की खरीद पर सहमत हुए थे. लेकिन जो आरोप लगाए गए हैं, उससे जवाब की बजाए सवाल ही ज्यादा उठते हैं.

डील की प्रक्रिया

यहां यह बताना ज़रूरी है कि जब सरकार सेना के लिए कोई खरीद करती है तो उसके तीन चरण होते हैं. खरीद चाहे देशज हो या विदेश से. पहले चरण में उत्पाद को देखा जाता है कि वह मानक पर खरा है या नहीं. इसका मतलब यह हुआ कि इसे पहले मानकों पर खरा उतरना चाहिए. इसे 'क्वॉलिटी रिक्वॉयरमेन्ट्स' कहा जाता है. दूसरा चरण यह है कि क्वॉलिफाइड प्रोडक्ट को परफॉरमेन्स बेंचमार्क्स पर उसकी क्वॉलिटी कसौटी पर कसा जाता है. इसके बाद तीसरे चरण में कीमत और बिक्री के बाद सर्विस फैक्टर्स पर विचार किया जाता है. इन तीन चरणों से गुजरने के बाद ही सरकार द्वारा खरीद के किसी समझौते या सौदे पर हस्ताक्षर किए जाते हैं.

अगर ऊपर के तीन चरणों से गुजरकर ही खरीद की गई है तो लगता नहीं है कि चीफ ऑफ एयर चीफ (सीएएस) के रूप में त्यागी ने कोई बड़ी भूमिका निभाई होगी. क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने जब 22 दिसम्बर 2003 को संशोधित 'क्वॉलिटी रिक्वॉयरमेन्ट्स' को मंजूरी दी, उस समय सीएएस एयर चीफ मार्शल श्रीनिवासपुरम कृष्णास्वामी थे. 

एयर चीफ मार्शल त्यागी ने वायु सेना के 20वें सीएएस के रूप में 31 दिसम्बर 2004 को प्रभार संभाला था और वे 31 मार्च 2007 को रिटायर्ड हो गए थे. प्रतिस्पर्धा में शामिल शार्टलिस्टेड दो अन्य कम्पनियों का निर्धारण एसीएम फली एच मेजर के कार्यकाल में किया गया था जबकि अनुबंध पर हस्ताक्षर 2010 में हुए थे. उस समय एसीएम पीवी नायक सीएएस थे. कॉन्ट्रैक्ट नम्बर HQ/S96062/6/ASR था.

डील की कहानी

इस कहानी की थोड़ी गहराई में जाएं तो चीज़ें साफ़ हो जाएंगी. 1999 में, भारतीय वायु सेना ने तत्कालीन एमआई-8टी वीवीआईपी हेलीकॉप्टर्स को बदलने का प्रस्ताव किया क्योंकि रात में, विपरीत मौसम के हालात में उनके संचालन में दिक्कत आ रही थी. इसके बाद मार्च 2002 में ग्लोबल रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया गया.

इसके जवाब में चार ऑरिजनल इक्विपमेन्ट मैन्यूफैक्चर्रस (ओईएमएस) अगस्ता वेस्टलैंड, यूरोकॉप्टर एसए, रोसोबोरोन एक्सपोर्ट स्टेट कॉर्प और सिकोरस्की हेलीकॉप्टर्स सामने आए. भारतीय वायु सेना की टेक्निकल इवेल्यूशन कॉमेटी (टीईसी) ने तीन हेलीकॉप्टर्स को शॉर्टलिस्टेड किया.

अगस्ता वेस्टलैंड का AW-101, 6000 मीटर की ऊंचाई पर खरा नहीं उतरा. इसलिए वह उड़ान मूल्यांकन से भी दूर रहा. रूस का एमआई-172  ऑपरेशनल रिक्वायरमेन्ट्स की सात जरूरी शर्तों को पूरा नहीं कर सका. उड़ान परीक्षण के बाद केवल यूरोकॉप्टर के ईसी-225 को खरीद के योग्य पाया गया. 

19 नवम्बर 2003 को तत्कालीन प्रिंसिपल सिक्रेटरी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा ने इस विषय पर एक बैठक ली. इस बैठक में मिश्रा ने कहा कि उनकी मुख्य चिन्ता ऑपरेशनल रिक्वायरमेन्ट्स को लेकर है. बैठक में यह भी कहा गया कि बहुत ही आवश्यक होने पर ही भारत के राष्ट्रपतियों या प्रधानमंत्रियों को ऐसी जगहों पर जाना होता है जहां उनके हेलीकॉप्टर के उड़ान की ऊंचाई 4,500 से ज्यादा होती है.

क्या त्यागी को गिरफ्तार करना राजनीतिक और नौकरशाही के सबसे ताकतवर लोगों को बचाने की कोशिश है

इस बैठक में, हालांकि, ऑपरेशनल ऊंचाई 4,500 मीटर तय कर दी गई. उड़ान की उच्च ऊंचाई सीमा 6,000 मीटर है. अंदर के केबिन जिसकी ऊंचाई 1.8 मीटर होना जरूरी है, को “इच्छानुसार” (जरूरी नहीं) कर दिया गया. दरअसल, मिश्रा का सुझाव था कि वीवीआईपी के सुरक्षा कर्मियों की लम्बाई ज्यादा होने से केबिन की ऊंचाई ज्यादा करना बेहतर होगा क्योंकि वे ज्यादा समय तक खड़े ही रहते हैं.   

बाद में, 22 दिसम्बर 2003 को एक पत्र मिश्रा ने तत्कालीन सीएएस, एसीएम श्रीनिवासपुरम कृष्णास्वामी को लिखा. पत्र में लिखा गया था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो पीएमओ और न ही स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) ने उनसे इस बारे में सलाह-मश्विरा किया जबकि इन ओआर की दिशा तय कर दी गई थी. 

मिश्रा ने यह भी सुझाव दिया था कि सीएएस और रक्षा सचिव संयुक्त रूप से इस मामले में ऑपरेशनल, सुरक्षा और वीवीआईपी की सुविधाजनक जरूरतों को देखते हुए मानक बना सकते हैं. पत्र में यह भी लिखा गया था कि हेलीकॉप्टर को बदलने के लिए चयन और अधिग्रहण प्रक्रिया जल्द शुरू की जाए.

इस निर्देश के अनुपालन में भारतीय वायु सेना, एनएसए, एसपीजी और रक्षा मंत्रालय के बीच मार्च 2005 से सितम्बर 2006 के मध्य ऑपरेशनल रिक्वॉयरमेन्ट्स तय की गईं और बदलावों को अमल में कहा गया. इसमें अस्पष्टता कहीं से नहीं थी. ऊंचाई को कम करने का फैसला आधिकारिक था और बोर्ड के ऊपर था. इस फैसले पर प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सिक्रेटरी कम एनएसए (उस समय एम के नारायणन थे) की अध्यक्षता वाली बैठक में भी चर्चा हुई.

तत्कालीन रक्षा सचिव ने इस पर रिव्यू किया. उड़ान की ऊंचाई को कम करने का फैसला अमल में लाने से पहले 18 महीने तक एसपीजी और वायु सेना के अधिकारियों ने इसे देखा-परखा और ये सभी तथ्य अंतिम आरएफपी दस्तावेजों में शामिल किए गए. इसी के अनुरूप रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद परिषद ने 12 वीवीआईपी हेलीकॉप्टर्स की खरीद के लिए अपनी स्वीकार्यता दी.

संदिग्ध कार्रवाई?

इस तरह से यह तो तय है कि क्यूआर पैरामीटर्स में बदलाव का फैसला तत्कालीन सीएएस त्यागी का नहीं था. अगर कोई यह कहता है कि प्रचलन है कि हमारी तीनों सेनाओं में जो व्यक्ति नम्बर दो पर होता है, वही अपनी सेना के लिए अधिग्रहण प्रस्तावों को रक्षा मंत्री को भेजता है (प्रमुख तो केवल प्रस्तावों का अनुमोदन करते हैं) तो यह भी सही है कि अगस्ता मामले में क्यूआरएस में बदलाव का फैसला दो सरकारों (वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार), दो प्रधानमंत्री कार्यालयों  (वाजपेयी और मनमोहन सिंह) और दो रक्षा मंत्रियों (जार्ज फनार्डींज और प्रणब मुखर्जी) ने लिया था. 

तत्कालीन सीएएस के रूप में तो त्यागी ने आदेशों का पालन किया था. तब वह कैसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं, जैसा कि सीबीआई ने कहा है? 

एक बात और, जो ज्यादा दिलचस्प है कि सीबीआई ने उस एक व्यक्ति से बातचीत करना जरूरी नहीं समझा जो अगस्ता वेस्टलैंड सौदे के बारे में ज्यादा बातें जानता है. वह व्यक्ति और कोई नहीं, वरन भारत के नियंत्रक और लेखा परीक्षक (कैग) शशिकांत शर्मा हैं. वह सभी तरह की आंतरिक प्रक्रिया के गवाह रहे हैं.

शर्मा 1976 बैच के बिहार कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं. वह रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (वायु सेना) के रूप में 2003 के मध्य में आ गए थे. वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अगस्ता वेस्टलैंड खरीद का सूत्रपात किया था और वे 2007 में डीजी (अधिग्रहण) बने. वह 2010 तक महत्वपूर्ण पद पर रहे और बाद में उन्हें रक्षा सचिव बनाया गया. 

इस पद पर वह मार्च 2011 से मई 2013 तक रहे. वास्तव में, जब मनमोहन सिंह सरकार द्वारा कैग बनाया गया, तब लोगों की भौहें इस पर उठी थीं और लोगों को एक रक्षा सचिव को कैग बनाना असामान्य सा लगा था. देश का शीर्षस्थ अंकेक्षक, जिसका सबसे बड़ा काम भारत सरकार के बड़े खर्चों का अंकेक्षण करन है, वह रक्षा मंत्रालय से आया हुआ है.

क्या त्यागी को गिरफ्तार करना राजनीतिक और नौकरशाही के सबसे ताकतवर लोगों को बचाने की कोशिश है जो वास्तव में विवादास्पद सौदे से जुड़े हुए हैं? इस सबके बाद, अन्ततोगत्वा कैबिनेट कॉमेटी के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री को भी शामिल किया जा सकता है. कैबिनेट कॉमेटी ही सभी बड़ी रक्षा खरीदों को अनुमति देती है. और यह बात तो हम सभी जानते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास सत्ता की वास्तविक शक्तियां नहीं थीं.   

वास्तव में, किसी भी अन्य पदस्थ व्यक्ति के मुकाबले त्यागी की गिरफ्तारी सभी तरह से ज्यादा विलक्षण है. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इसी साल संसद में कहा था कि सरकार अगस्ता घोटाले में  'बड़ी मछलियों' को पकड़ेगी और निश्चित रूप से त्यागी वह 'बड़ी मछली' नहीं हैं.

First published: 11 December 2016, 8:12 IST
 
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