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उग्रवाद के उभार की आशंका के बीच पंजाब में सजता चुनावी मंच

भारत भूषण | Updated on: 10 December 2015, 8:34 IST
QUICK PILL
  • पंजाब में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और नशाखोरी के चलते मिल रही है धार्मिक कट्टरपंथ को शह. खुद को सिखों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की होड़ में सभी पार्टियों ने दिया इसे बढ़ावा.
  • कुछ लोग  आशंका जता रहे हैं कि हालात 1980 के दशक जैसे हैं जब राज्य उग्रवाद की चपेट में आ गया था लेकिन जानकार ऐसी किसी संभावना से इनकार करते हैं.

पंजाब में पिछले कुछ समय में हुए दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रमों के बाद अस्सी के दशक की वापसी की आशंका जतायी जाने लगी है. सूबा एक बार फिर अव्यवस्था का शिकार हो सकता है, सिख उग्रवाद एक बार फिर उभर सकता है.

पहले हाल के दिनों में घटी कुछ घटनाओं पर एक नज़र डालते हैं. सिखों के एक उग्रपंथी संगठन ने दिवाली पर किए जाने वाले सिखों के सम्मेलन 'सरबत खालसा' का आयोजन किया. उनका मकसद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त के पांच जत्थेदारों को 'हटाकर' पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हवारा को जत्थेदार नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित करना था. दोषी हवारा फिलहाल जेल में सज़ा काट रहा है. इसके अलावा उन्होंने 'आज़ाद सिख राज' बनाने का प्रस्ताव भी पारित कराना चाहा.

दूसरी तरफ़ राज्य में कुछ जगहों से सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहब का अपमान करने की ख़बरें भी आयीं. इन घटनाओं के बाद से ही राज्य में सिख उग्रवाद के दोबारा पनपने की आशंका जतायी जाने लगी है.

सरबत खालसा में लोग बादल परिवार के खिलाफ ज्यादा हाथ उठा रहे थे और पंथिक मामलों पर कम

राज्य के ज़मीनी हालात कुछ कुछ वैसे ही हैं जैसे 1982 से 1984 के दौरान थे. खेती गंभीर संकट से जूझ रही है, शिक्षित युवकों में बेरोज़गारी बहुत ज्यादा है, एक बड़ा तबका नशे का शिकार हो चुका है, सुप्त पड़े उग्रवादी संगठन फिर से सिर उठाने लगे हैं जो धर्म की राजनीति को गरमाने की कोशिश करते दिखायी दे रहे हैं. 80 के दशक में सिख उग्रवाद कुछ ऐसे ही माहौल में पनपा था.

हालांकि जानकारों का मानना है कि सिख उग्रवाद की बातें भय का वातावरण तैयार करने के लिए की जा रही हैं.

पंजाब पिछले तीन दशकों में काफ़ी बदल चुका है. 80 के दशक की तुलना में पंजाब आज ज्यादा संपन्न है. 80 के दशक में मिले अनुभवों के बाद लोगों पहले से समझदार हो गए हैं. सबसे बड़ी बात इस समय हिंदूओं और सिखों के बीच कोई तनाव नहीं है.

चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक प्रमोद कुमार कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में कर्ज, नशा और बेरोजगारी से अगर राज्य में उग्रवाद पनपा था तो पंजाब में सेक्युलरिज्म भी इसी माहौल में उपजा था. इसलिए मौजूदा हालात में महत्वपूर्ण ये है कि राजनीतिक वर्ग इन समस्याओं से किस तरह निपटता है."

आज का पंजाब उग्रवाद से काफी आगे बढ़ चुका है. लोग अब उस तरफ वापस नहीं जाना चाहते

वरिष्ठ पत्रकार बलजीत बल्ली कहते हैं, "साल 1995 में शिरोमणी अकाली दल ने मोगा डिक्लेरशन में 'पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत' की घोषणा की थी. इसका उद्देश्य सिख कट्टरपंथ का आधार खत्म करना था. आज का पंजाब उग्रवाद से काफी आगे बढ़ चुका है. लोग अब उस तरफ वापस नहीं जाना चाहते."

ऐसे में सवाल है कि अकाली दल और बीजेपी ने 10 नवंबर को अमृतसर में दिवाली के दिन सरबत खालसा को आयोजन की अनुमति कैसे दी?

सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टी कांग्रेस इसके लिए एक दूसरे को दोषी बता रहे हैं. दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस करके परस्पर आरोप-प्रत्यारोप किया. उसी दिन शाम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस की तरफ से मीडिया से बात की.  वहीं उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल दिल्ली में पत्रकारों से मुखातिब हुए. स्थानीय स्तर पर दोनों धड़ों के नेताओं ने एक दूसरे को दोषी बताया.

सुखबीर सिंह बादल ही की तरह पंजाब के शिक्षा मंत्री दलजीत सिंह चीमा ने कांग्रेस पर सरबत खालसा का समर्थन करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, "हम ऐसे लोगों की मदद क्यों करें जिन्होंने प्रकाश सिंह बादल को  दिया गया 'फ़ख्र-ए-क़ौम पंथ रतन' खिताब वापस ले लिया था?"

वहीं फगवाड़ा जिले के कांग्रेस अध्यक्ष हरजीत सिंह परमार मानते हैं कि सरबत खालसा का आयोजन 'कट्टरपंथियों' ने किया था न कि किसी राजनीतिक पार्टी ने.

परमार कहते हैं, "अकाली इस समय कमजोर हैं. उन्होंने सिखों के नाराज हो जाने के डर से कोई एहतियाती कदम नहीं उठाया. लेकिन अब सिख कट्टरपंथ को पनाह देने वाला कोई नहीं है."

ज़मीनी हालात देखकर ऐसा लगता है कि पंजाब का मौजूदा संकट बादल परिवार के ईर्दगिर्द घूम रहा है

सरबत खालसा का आयोजन टीवी पर देखने वालों ने देखा होगा. जब जब बादल सरकार के खिलाफ कोई बात कही जा रही थी तो जनता हाथ उठा कर उसका समर्थन कर रही थी. लेकिन जब पंथ की बात आती थी तो वैसा उत्साह नहीं दिखायी दे रहा था.

ज़मीनी हालात देखकर ऐसा लगता है कि पंजाब का मौजूदा संकट बादल परिवार के ईर्दगिर्द घूम रहा है. लेकिन ऐसे हालात बने कैसे?

अकाली दल का मुख्य आधार राज्य के गुरुद्वारे हैं. पार्टी का सभी गुरुद्वारों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी(एसजीपीसी) से वही संबंध है जो बीजेपी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से है.

स्वर्गीय गुरुचरन सिंह तोहरा 27 सालों तक एसजीपीसी के अध्यक्ष रहे. उनके दौर में संस्था का अकाली दल पर पूरा नियंत्रण रहा. कई बार एसजीपीसी अकाली आमने-सामने भी नजर आए. साल 2004 में तोहरा के निधन के बाद एसजीपीसी पर अकाली दल के अध्यक्ष प्रकाश सिंह बादल का पूरा नियंत्रण है.

1997 से 2014 तक अकाली दल ने चुनावों में गैर-धार्मिक और गैर-पंथिक रास्ता अपनाया. इसके पीछे उसकी कई मजबूरियां थीं.

प्रमोद कुमार बताते हैं, "डिलिमिटेशन और जनसंख्या वितरण की हकीकत ने अकाली दल में सबसे प्रभावशाली जाट सिखों को शहरी हिंदुओं और दलितों को अपने साथ जोड़ने को मजबूर किया. उनका दिल जीतने के लिए पार्टी को अपने पंथिक एजेंडा से हटना पड़ा. वो विकास की बात करने लगी. एक साल पहले तक पार्टी का यही रुख था."

1984 के हिंदू-सिख दंगों के बाद से पंजाब में ये भावना लगातार बनी हुई है कि सिखों के संग नाइंसाफी हुई है

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "पहले पहल विभिन्न पार्टियों द्वारा दंगा पीड़ितों को मुआवजे देने और पुनर्वास करने की मांग के पीछे यही भावना थी. धीरे धीरे राजनीतिक होड़ के चक्कर में ये मांग सिख उग्रवादियों को माफी देने तक पहुंच गयी."

जगतार सिंह कहते हैं, "इसीलिए कांग्रेस और अकाली दल-भाजपा दोनों ने बेअंत सिंह की हत्या के लिए बब्बर खालसा के उग्रवादी बलवंत सिंह राजौना को दी गयी फांसी माफ करने की मांग का समर्थन किया. राज्य विधान सभा में एक प्रस्ताव पारित करके इस मांग का समर्थन किया गया."

वो बताते हैं, "अकाल तख्त ने राजौना को 'ज़िंदा शहीद' का खिताब दिया. अकालियों ने मौत की सज़ा पा चुके देविंदर पाल सिंह भुल्लर को भी माफ करने की मांग की थी. बाद में भुल्लर की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया गया."

उग्रवादियों को माफी दिलाने की होड़ इतनी बढ़ गयी कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर भुल्लर को माफी देने की मांग की थी. केजरीवाल को शायद राज्य में 2017 में होने वाले विधान सभा चुनाव की चिंता थी.

शायद इसी वजह से एसजीपीसी ने साल 2014 में स्वर्ण मंदिर के अंदर जरनैल सिंह भिंडरावाले का स्मारक बनाने की अनुमति दे दी. जबकि इससे पहले दो बार ऐसी मांग ठुकरायी जा चुकी थी. बादल सरकार ने भी एसजीपीसी के इस फ़ैसले का विरोध नहीं किया.

खुद को सिखों का हमदर्द दिखाने की होड़ में सभी पार्टियों ने कट्टरपंथियों के प्रति दबी सहानुभूति को उभरने का मौका दिया

एक तरफ ये माहौल है और दूसरी तरफ़ राज्य में अगस्त से नवंबर के बीच कई किसान आंदोलन हुए. किसान चावल और चीनी मिल मालिकों से अपना बकाया न मिलने के कारण नाराज हैं.

किसान अनाज की गिरती कीमत से भी बेहाल हैं. मसलन, बासमती पूसा-1509 चावल की कीमत साल 2013 में 3500 रुपये प्रति क्विंटल, पिछले साल 2500 रुपये प्रति क्विंटल और इस साल घटकर 1200 से 900 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गयी. यानी इसकी कीमत धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य 1450 रुपये प्रति क्विंटल से भी कम हो गयी.

कपास की फ़सल व्हाइटफ्लाई के कारण बर्बाद हो गयी. रही सही कसर नकली कीटनाशक घोटाले ने पूरी कर दी. कपास किसान इस दोहरी मार से बेहाल हो गए.

सितंबर में सरकारी क्षेत्रों में अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों ने भी नौकरी पक्की करने के लिए आंदोलन किया था.

शहरी और ग्रामीण पंजाब में सुलग रही नाराजगी के बीच सितंबर में अकाल तख्त ने अचानक ही डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को ईशनिंदा के आरोप में माफी दे दी. ये मामला साल 2007 का है जब राम रहीम गुरु गोविंद सिंह की वेशभूषा धारण करन के कारण विवादों में घिर गये.

ये माफी राम रहीम की एक चिट्ठी के बाद दी गई जिसमें उन्होंने अपना पक्ष रखा था. आम तौर पर ऐसा आरोप लगने पर व्यक्ति को अकाल तख्त सामने पेश होना होता है. स्वर्गीय ज्ञानी जैल सिंह और बूटा सिंह को ऐसे ही आरोपों के बाद अकाल तख्त में पेश होना पड़ा था.

इस फैसले ने आग में घी का काम किया. पहले से ही नाराज जनता को लगा कि बादल 2017 में होने वाले चुनावों के मद्देनजर वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं. पंजाब के मालवा क्षेत्र में राम रहीम के हिंदू और सिख अनुयायियों की काफी संख्या है.

पंजाब में बादल सरकार और जनता के बीच भरोसे का पुल टूट चुका है

आर्थिक और धार्मिक मुद्दों से जुड़ी नाराजगी अक्टूबर में एकसाथ फूटी. गुरुग्रंथ साहब के अपमान के बारे में आयी कई खबरों ने मामले को और हवा दी.

विरोध प्रदर्शन में दो प्रदर्शनकारियों की पुलिस की गोली से मौत हो गयी. दो लोगों को पवित्र ग्रंथ के कथित अपमान के लिए गिरफ़्तार भी किया गया.

पुलिस ने दावा किया कि इन प्रदर्शनों को ऑस्ट्रेलिया और दुबई से आर्थिक मदद मिली थी. लोगों का मानना है कि पुलिस की गोली के शिकार हुए लोग निर्दोष थे. इससे लोगों की नाराजगी और बढ़ गयी.

'विदेशी मदद' की बात बाद में मनगढ़ंत कहानी साबित हुई पुलिस को गिरफ़्तार लोगों को छोड़ना पड़ा.

कुमार कहते हैं, "सरकार और जनता के बीच भरोसे का पुल लगभग टूट चुका है. राज्य में जो भी गलत होता है जनता उसके लिए बादल को दोषी मान रही है. क्रेमिका ब्रेड ने जब अपनी कीमत बढ़ायी तो लोगों ने कहा कि सुखबीर बादल को ब्रेड के हर पैकेट पर एक रुपया मिलता है. सरकार को इस धारणा का सामना करना है."

जाहिर है कि राज्य में 2017 में होने वाले चुनाव के लिए मंच तैयार है.

बादल परिवार के खिलाफ तैयार होते माहौल से राज्य की राजनीति में आया बदलाव साफ देखा जा सकता है. ज्यादातर सिख किसान बादल सरकार से नाराज हैं तो गैर-किसान भी नाखुश हैं. जनता का रुख ही साल 2017 के चुनाव के नतीजे तय करेगा.

ये भी देखना होगा की मुख्यधारा की पार्टियां अपने चुनाव प्रचार में राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों के किस तरह इस्तेमाल करती हैं. नेताओं और पंजाब दोनों का भविष्य इसी पर निर्भर है.

First published: 10 December 2015, 8:34 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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