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अहमदनगर बलात्कार: यौन उत्पीड़न को जातीय रंग देने में लगे मराठा नेता

पार्थ एमएन | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरडी गांव के लिये यह एक बेहद तनावपूर्ण हफ्ता रहा. पूरे गांव में बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई थी और ऐसा लगता है कि यह तैनाती अगले दो सप्ताह तक जारी रहेगी.

तेरह जुलाई को गांव की एक 14 वर्षीय लड़की को कुछ लोगों द्वारा अगवा कर लिया गया था. उस लड़की के साथ बेहद क्रूरता के साथ बलात्कार करने के बाद गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी गई और शव को बेहद क्षत-विक्षत हालत में छोड़ दिया गया.

उसके बाल उखाड़ लिये गए, हाथ शरीर से अलग करने के अलावा उसके गुप्तांगों सहित शरीर का मांस भी कई जगहों से काट दिया गया गया था.

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इस अपराध की क्रूरता ने लोगों को भीतर तक झझकोर दिया और लड़की के लिये इंसाफ की मांग को लेकर अहमदनगर की जनता सड़कों पर उतर आई.

अबतक इस मामले में तीन गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और सरकार ने इस मुकदमें को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाये जाने और लोक अभियोजक के रूप में उज्जवल निकम को नियुक्त करने का भरोसा दिलाया है.

इस क्रूर अपराध में शामिल अपराधियों की संख्या कितनी थी यह पता लगाने के लिये जांच जारी है.

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अफसोस की बात यह है कि न्याय के लिये होने वाले इस विरोध-प्रदर्शन ने अब जातिवादी रंग ले लिया है. पीड़िता मराठा थी और उसके साथ नशे की हालत में बलात्कार करने वाले सभी लड़के दलित.

13 जुलाई की देर शाम को घटित हुई इस घटना के बाद पुलिस ने अगले दिन 14 जुलाई को पहली गिरफ्तारी की.

कानून व्यवस्था की बेहाल स्थिति

15 जुलाई को महाराष्ट्र में अच्छी पहुंच रखने वाले कुछ चुनिंदा मराठा समूहों ने सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया.

इसके बाद होने वाले धरना-प्रदर्शनों ने एकाएक दलित-विरोधी रूप धारण कर लिया. प्रदर्शनकारियों ने निचली जातियों के लोगों को न्याय सुनिश्चित करने के लिए लिये बने दलित एट्रोसिटी एक्ट (क्रूरता अधिनियन) पर जमकर प्रहार किये.

एक शक्तिशाली मराठा समूह शंभाजी ब्रिगेड से जुड़े शांताराम कुंजीर ने खुलेआम इस मामले को जातिगत रंग देते हुए कहा कि अगर पीड़ित लड़की मराठा की जगह दलित होती तो पुलिस, राज्य और मीडिया सभी की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती.

उन्होंने कहा, ‘इस बलात्कार की पृष्ठभूमि क्रूरता अधिनियम से जुड़ी हुई है. दलितों के कई ऐसे समूह हैं जो इस कानून का दुरुपयोग करते हुए दूसरों के साथ ब्लैकमेलिंग करते हैं. इस अधिनियम को लेकर पुनर्विचार किये जाने की आवश्यकता है.’

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जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता किरण मोघे ने कहा कि बलात्कार कानूनों को लेकर भी कुछ ऐसे ही तर्क पेश किये जाते हैं लेकिन इनकी पुष्टि के लिये कोई कागजी दस्तावेज पेश नहीं करता है.

उन्होंने कहा, ‘यह झूठे प्रचार-प्रसार के दम पर लोगों की मानसिकता और धारणाओं के साथ खिलवाड़ करने के प्रयास के अलावा और कुछ नहीं है. जब हम किसी भी कानून के बारे में बात करते हैं तो इस बात का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है कि किन वजहों के चलते उसे पहली बार लागू किया गया था. हमारा समाज अभी भी जातिवादी समाज हैं जहां दलितों को न्याय पाने के लिये कड़ा संघर्ष करना पड़ता है.’

कभी अपने प्रगतिशील विचारों और वामपंथी आंदोलनों के चलते महाराष्ट्र के केरल के रूप में जाने जाने वाला अहमदनगर बीते कुछ दशकों में मराठों द्वारा दलितों पर जातिगज आधार पर किये गए अत्याचारों के चलते बदनाम हो चुका है.

2013

सोनई गांव में तीन दलित युवकों की हत्या कर दी गई. इनमें से एक युवक उच्च जाति के एक किसान की पुत्री से प्रेम करता था. इसी अपराध में उसे सजा दी गई.

मई 2014

मराठा लड़की के साथ प्रेम करने वाले एक दलित युवक की हत्या

मई 2015

शिरडी में एक 23 वर्षीय दलित युवक की पीट-पीटकर सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसके मोबाइल पर बाबासाहेब अंबेडकर की प्रशंसा करने वाली रिंगटोन थी.

यह तो जिले को हिलाकर रखने वाली दलित क्रूरता के सिर्फ चुनिंदा उदाहरण भर हैं. स्थितियां यह आ गई थीं कि अहमदनगर को ‘‘क्रूरता से ग्रस्त’’ जिला घोषित करने की मांग भी उठने लगी थी.

जाति का मुद्दा

विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया मामले का सांप्रदायिकरण करके मराठा समूहों का प्रयास बीते तमाम वर्षों में उनके द्वारा दलितों पर किये गए जुल्मों से अपना पीछा छुड़ाना है.

अपराधियों के लिये कठोर दंड की मांग करते हुए मोघे कहती हैं कि इस विशेष मामले का जाति से कोई संबंध नहीं है और ऐसा करने का कोई भी प्रयास सिर्फ इन दोनों जातियों के बीच दुश्मनी को बढ़ाने का काम ही करेगा.

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उन्होंने कहा, ‘यह साफ तौर पर यौन उत्पीड़न का मामला है. अगर जाति या समुदाय के नाम पर हिंसा की गई हो तो उसके बारे में बात करना समझ में आता है. यहां अपराध का जाति का कोई लेना नहीं था बल्कि यह पूरी तरह से लिंग से संबंधित था. अहमदनगर में पूर्व में हुए अपराध पूरी तरह से सम्मान से जुड़े हुए थे जिनमें जाति केंद्रीय मुद्दा थी.’

हालांकि मराठा समूह यौन उत्पीड़न और जाति आधारित हमले के बीच के अंतर को स्वीकरने को तैयार नहीं है.

राजनीतिक पक्ष

इस मुद्दे ने अब एक राजनीतिक रंग ले लिया है. मुख्यतः मराठों की आबादी वाला अहमदनगर एनसीपी का राजनीतिक गढ़ रहा है और मराठे परंपरागत रूप से उनके वोट बैंक रहे हैं.

एक तरफ जहां एनसीपी के प्रवक्ताओं ने इस जातिवादी ध्रुवीकरण की कड़ी निंदा की है और उनमें से किसी ने इस क्रूरता अधिनियम के बारे में कुछ नहीं बोला है, रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि जमीनी हकीकत और सोच इससे कहीं अलग है.

इस आंदोलन में सबसे अधिक सक्रिय कुछ मराठा समूहों के एनसीपी के साथ काफी करीबी संबंध रहे हैं और रिपोर्टों के अनुसार वे पर्दे के पीछे से इन विरोध प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं.

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टिप्पणीकारों का मानना है कि बीजेपी सरकार की ओर से देर से दी गई प्रतिक्रिया के चलते एनसीपी और मराठा समूहों को इस पूरे मामले को जातीय रंग देने का मौका मिल गया.

जल संरक्षण मंत्री राम शिंदे जो बलात्कार वाले क्षेत्र के विधायक भी हैं ने पीड़ित परिवार को सांत्वना देने के इरादे से घटना होने के तीन दिन बाद घटनास्थल का दौरा किया.

हालांकि उनके प्रतिक्रिया देने तक बहुत देर हो चुकी थी. उस समय तक विपक्ष स्थितियों पर काबू कर चुका था.

एनसीपी के प्रवक्ता सुरेश दास का कहना है कि अगर संबंधित अधिकारियों ने समय रहते ध्यान दिया होता तो उन्हें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.

उन्होंने कहा, ‘शिंदे उस दिन अपने मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे. वे आराम से अपना टाइमटेबल समायोजित करके पुलिस को जनता के आक्रोश को शांत करने के लिये आवश्यक दिशा-निर्देश दे सकते थे. जहां तक क्रूरता अधिनियम की बात है तो हमने इसके बारे में कभी कुछ नहीं कहा है. हमारा सारा ध्यान केवल पीड़िता को न्याय दिलवाने तक सीमित है.’

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विधान परिषद में विपक्ष के नेता और एनसीपी विधायक धनंजय मुंडे ने राम शिंदे की एक तस्वीर साझा करते हुए दावा किया कि वे इस घटना के मुख्य आरोपी संतोष भुवल के बेहद करीबी हैं.

हालांकि बाद में यह स्पष्ट हुआ कि तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति आरोपी नहीं है. बाद में मुंडे ने माफी मांगी और अपना बयान वापस किया.

सदन के पटल तक लाना

महाराष्ट्र विधानसभा में मंगलवार को इस मामले पर लंबी बहस हुई जिसमें पृथ्वीराज चव्हाण, अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस भी वक्ता के रूप में शामिल हुए.

महाराष्ट्र के बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि शिंदे को पहले ही पीड़ित परिवार से मिलने जाना चाहिए था लेकिन उन्होंने साफ किया कि राज्य सरकार संवेदनशील मामलों में भेदभाव नहीं करती और उन्होंने इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाए जाने का आदेश देने के साथ विपक्ष की तमाम मांगे भी मान ली हैं.

फडणवीस ने कहा कि ऐसी घटनाएं महाराष्ट्र के चेहरे पर काला धब्बा हैं और उनकी सरकार आरोपियों के लिये मौत की सजा की मांग करेगी. इसके अलावा उन्होंने फाॅरेंसिक विशेषज्ञों से सुसज्जित एक पांच सदस्यीय जांच टीम का भी गठन किया है जो अगले पांच से छः दिनों में आरोप पत्र दाखिल करने में मदद करेगी.

गृहमंत्री के रूप में अपने इस्तीफे की मांग के जवाब में उनका कहना था, ‘मैं राज्य के लोगों से इस मुद्दे पर अपना गुस्सा निकालने से रोकने की अपील करता हूं. यह तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल गलत है कि पुलिस ने कार्रवाई करने में देरी की. तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इसके अलावा चौथे आरोपी के खिलाफ भी जल्द ही सख्त कार्रवाई की जाएगी.’

न्याय का इंतजार

हालांकि मोघे फास्ट ट्रैक अदालतों के उतना तेज न होने पर सवाल उठाती हैं जितना उन्हें होना चाहिये. वे पूछती हैं, ‘राज्य ने निकम को नियुक्त किया है लेकिन क्या वह पूर्व में सुगम न्याय सुनिश्चित कर पाई है? उन्होंने खैरलांजी मामले में गड़बड़ी की. सोनाई मामला उनके अदालत में पेश न होने के चलते अधर में लटका पड़ा है.’

टिप्पणीकारों का कहना है कि घटना का सांप्रदायीकरण और राजनीतिकरण होने के चलते पीड़ित के परिवार के साथ घोर अन्याय हो रहा है.

मुंबई विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख सुरेंद्र जोंधले कहते हैं कि अहमदनगर में बने दुश्मनी और तनाव के पीछे के मुख्य कारणों का विश्लेषण भी होना चाहिये.

उन्होंने कहा, ‘यह देखना भी बेहद आवश्यक है कि क्या अहमदनगर की राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक संरचना जातियों के बावजूद ऐसी गतिविधियों के लिये अनुकूल है. यह बेहद अफसोस की बात है कि नागरिक समाज और राजनीतिक वर्ग की प्रतिक्रियाएं पीड़ित की जाति और वर्ग के हिसाब से बदलती रहती हैं.’

First published: 23 July 2016, 7:39 IST
 
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