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संसद विशेषाधिकार कमेटी के सामने हाजिर हों एम्स निदेशक एमसी मिश्रा

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 11 February 2017, 7:51 IST

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स के निदेशक एमसी मिश्रा इन दिनों काफी मुश्किल में हैं. देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थान के वरिष्ठतम पद पर पदस्थ मिश्रा राज्यसभा के तीन सांसदों की तरफ से कार्रवाई का सामना कर रहे हैं. इन सांसदों ने उन्हें सांसदों के अपमान का दोषी ठहराया है.

जनता दल (यू) के सांसद अली अनवर अंसारी, कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (मार्क्सवादी) के ऋतुब्रत बनर्जी और समाजवादी पार्टी के मुनव्वर सलीम ने राज्यसभा चेयरमैन और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को चिट्ठी लिखकर कहा है कि उन्होंने सांसदों का अपमान किया है. अतः उन्हें राज्यसभा की विशेषाधिकार कमेटी के सामने तलब किया जाए.

विशेषाधिकार हनन किसी भी व्यक्ति की वह गतिविधि या आचरण है जिससे सांसदों, संसद या उसकी कमेटियों का अपमान होता हो. इसमें समाचार प्रकाशित करना, सम्पादकीय लिखना, अखबारों/ मैगजीन/टीवी में बयान जारी करना, साक्षात्कार देना अथवा जनसभा में भाषण देना आदि शामिल है.

मुद्दा क्या है

यह सारा बवाल स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसदीय स्टैंडिंग कमेटी की उस रिपोर्ट से शुरू होता है जो अगस्त 2015 में सदन के पटल पर रखी गई थी. कमेटी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को आड़े हाथों लिया था जिसमें एम्स में बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार के मामले उजागर होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. कमेटी ने कार्रवाई करने में मंत्रालय को अगंभीर बताया था.

उल्लेखनीय है कि एम्स ट्रॉमा सेंटर में सामान की खरीद से लेकर एम्स में निर्माण और भर्ती के 100 से अधिक घोटाले उजागर हुए थे. ये मामले 2012 से लेकर 2014 के बीच के थे. सीबीआई और सीवीसी ने इन मामलों में स्वास्थ्य मंत्रालय से कार्रवाई करने को कहा था.

संसदीय कमेटी ने सरकार की निष्क्रियता की कड़ी आलोचना करते हुए इन मामलों की जांच न होने पर नाराजगी जताई थी.

इसके बाद जून 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट में एम्स निदेशक की ओर से दाखिल एफिडेविट में कहा गया कि संसदीय कमेटी की इस रिपोर्ट के पैरा-5 में उल्लखित बातों का कोई आधार नहीं है और उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है. हलफनामे में यह भी कहा गया है कि एम्स संसदीय कमेटी की इस रिपोर्ट को मानने के लिए मजबूर नहीं है. यह केवल सलाह की प्रकृति की है.

कमेटी का निष्कर्ष

संसदीय कमेटी ने यह भी कहा है कि यह चिंताजनक बात है कि एम्स में भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले उजागर होने के बाद भी मंत्रालय ने कुछ नहीं किया. विशेष चिंता तो यह है कि मंत्रालय ने इन घोटालों को उजागर करने वाले एम्स के सीवीओ (संजीव चतुर्वेदी) की ही छुट्टी कर दी. एक एंटी-ग्राफ्ट ऑफिसर का तबादला मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर कर दिया गया.

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में चिकित्सा संस्थान में भ्रष्टाचार के कई मामलों की पोल खोली है. इसमें संस्थान के ही कई वरिष्ठ निदेशकों और चिकित्सकों के नाम भी शामिल हैं. इस सूची में अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति मामले, खरीद प्रक्रिया का पालन किए बिना कम्प्यूटर और अन्य सामानों की खरीद में संलिप्तता, खेल कोटा के तहत अधिकारियों की नियुक्तियों में अनियमितता के साथ ही ठेकेदारों समेत अन्य लोगों को बड़ी मात्रा में धन का भुगतान करना आदि शामिल है.

कुछ मामलों में तो संस्थान के निदेशक का नाम सीधे ही लिया गया है. इसके अलावा संस्थान और स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एम्स को प्रोफेशनल रूप से स्वायतत्ता दी गई है. स्वायतत्ता का अर्थ निदेशक की स्वायतत्ता नहीं है. नतीजा यह निकला कि अधिकृत कायदे-कानूनों और प्रक्रियाओं का पालन करने से ही मुक्ति पा ली गई.

बड़ी संख्या में ऐसे मामलों को देखते हुए एम्स के तत्कालीन सीवीसी संजीव चतुर्वेदी ने संस्थान के कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी. इसमें उनकी बर्खास्तगी तक शामिल थी. लेकिन अधिकांश मामलों में स्वास्थ्य मंत्रालय ने अंतिम निर्णय लिया ही नहीं.

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि चतुर्वेदी को विवादास्पद तरीके से हटाना संस्थान में भ्रष्टाचार मामलों की जांच से बचने की कोशिश है. चतुर्वेदी भ्रष्टाचार मामलों को उजागर करने और अधिकारियों के नामों का उल्लेख करने के कारण अपने साथ हुए कथित उत्पीड़न को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट भी गए थे. यह चतुर्वेदी का ही आरोप है कि एम्स का एफिडेविट अपने अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाने का प्रयास है.

मिश्रा के खिलाफ आरोप

जेडीयू सांसद अली अनवर ने पहले भी एम्स ट्रामा सेन्टर में खरीद घोटाले की सीबीआई जांच की मांग की थी. उन्होंने बार-बार कहा है कि एम्स द्वारा ही तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक एम्स के निदेशक एक साथ दो पदों पर नहीं रह सकते. जबकि वर्तमान निदेशक इस नियम का उल्लंघन कर रहे हैं. वे एम्स निदेशक के पद पर होने के साथ एम्स ट्रामा सेन्टर के भी मुखिया बने हुए हैं.

एम्स के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने कैच को बताया कि निदेशक खुद ही भ्रष्टाचार के कई मामलों में लिप्त हैं. दो मामले तो उनके खिलाफ निचली अदालतों में लंबित हैं. एक अन्य सूत्र का कहना है कि संसदीय कमेटी की रिपोर्ट को नकारने का कोई जवाब निदेशक के पास नहीं है. लगता है कि निदेशक अपने ही संस्थान में भ्रष्टाचार मुद्दे के प्रति उदासीन भाव रखे हैं.

इन आरोपों के संबंध में एम्स के निदेशक एमसी मिश्रा से संपर्क करने की सभी कोशिशें नाकाम रहीं. उनके घर और दफ्तर के फोन पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली.

First published: 5 August 2016, 7:46 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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