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अजय आर्य: यह कांग्रेस का दलित दांव हैं

अतुल चौरसिया | Updated on: 10 February 2016, 23:21 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में एक नए दलित चेहरे को एक नए पद का सृजन करते हुए आगे बढ़ाया है. अजय कुमार आर्य लखनऊ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.
  • माना जा रहा है कि वे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की पसंद हैं. उनकी नियुक्ति केंद्रीय एसटी-एससी सेल ने की है. इससे पार्टी की यूपी इकाई में थोड़ी असहजता है.

देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति साफ कर दी है. दलित वोटों में सेध लगाना दोनों की प्राथमिकता में है. कुछ दिन पहले भाजपा ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए राजा सुहैलदेव जयंती और संत रविदास दिवस बड़े पैमाने पर मनाने की घोषणा की है.

अब कांग्रेस ने दलित वोटों को लुभाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा दिया है. पार्टी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के जियोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर अजय कुमार आर्य को पार्टी की एसटी-एससी सेल का संयोजक नियुक्त किया है. यह नियुक्ति इस मामले में अलग है कि इस तरह का कोई पद अब तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में नहीं हुआ करता था.

34 वर्षीय अजय आर्य आईआईटी रुड़की के छात्र रहे हैं. उनका कांग्रेस से रिश्ता ज्यादा पुराना नहीं है. वे बताते हैं, 'तीन चार सालों से मैं कांग्रेस से जुड़ा हूं. हालांकि कभी किसी जिम्मेदारी या पद पर नहीं रहा.'

अपनी जिम्मेदारियों के बारे में अजय बताते हैं, 'हाल के दिनों में दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ कई तरह की घटनाएं हुई हैं. रोहित वेमुला के मामले में हमने देखा कि किस तरह से दलितों के साथ कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों में पक्षपात होता है. राहुलजी और पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं को लगता है कि ऐसे लोग जो खुद दलित छात्रों और शिक्षकों से जुड़े रहे हैं वो इस दिशा में पार्टी के काम आ सकते हैं.'

अजय कुमार की नियुक्ति इस मामले में अलग है कि इस तरह का कोई पद अब तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में नहीं था


चुंकि अजय की नियुक्ति अलग व्यवस्था के तहत हुई है इसलिए इसने एकबारगी सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है. उनकी आगामी योजनाओं के बारे में कहा जा रहा है कि वे पूरे प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों, दलित शिक्षकों के बीच एक समन्वय बनाने का काम करेंगे. इस समन्वय के माध्यम से दलित सममुदाय को अपनी बात सीधे कांग्रेस पार्टी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी.

अतीत में वे शिक्षक आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं. लखनऊ युनिवर्सिटी के शिक्षक संघ के सचिव भी रह चुके हैं. अपनी नई भूमिका के जरिए वे पूरे प्रदेश के अकादमिक संस्थानों में कांग्रेस के प्रति झुकाव रखने वालों अकादमिकों और पढ़े लिखे लोगों की एक पूरी श्रृंखला तैयार करेंगे. जाहिर है कांग्रेस का मकसद चुनावों से पहले दलित समुदाय के बीच एक प्रभावशाली दलित समर्थक वर्ग खड़ा करने की है.

कांग्रेस की राजनीति के लिहाज से यह बेहद अहम कदम है. अजय की नियुक्ति की घोषणा कांग्रेस द्वारा लखनऊ में 18 फरवरी को आहूत दलित सम्मेलन के ठीक पहले की गई है. दलित सम्मेलन कांग्रेस द्वारा दलितों को लुभाने की राजनीति का एक और अहम पड़ाव है. कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं के अलावा इस सम्मेलन में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी हिस्सा लेंगे.

दलितों और कांग्रेस का उत्तर प्रदेश की राजनीति से बड़ा दिलचस्प संबंध है. आजादी के बाद से कांग्रेस लगातार उत्तर प्रदेश की सत्ता में आती रही. इसके पीछे बड़ी वजह कांग्रेस के वोटों का अकाट्य समीकरण था. पार्टी को सवर्णों और अल्पसंख्यकों के साथ एकमुश्त दलितों का वोट मिलता था. यह ऐसा समीकरण था जो अकेेले ही पचास फीसदी के आस-पास जा पहुंचता था.

वे पूरे प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों, दलित शिक्षकों और कांग्रेस के बीच समन्वय बनाने का काम करेंगे


यह स्थिति कमोबेश 80 के दशक के उत्तरार्ध तक बनी रही. इस दौरान कुछेक मौकों पर समाजवादी धड़े ने गैरकांग्रेसवाद के नाम पर अपनी सरकार बनाई, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेसी वर्चस्व बना रहा. कांशीराम द्वारा स्थापित की गई सरकारी कर्मचारियों के संगठन बामसेफ ने पहली बार अस्सी के दशक की शुरुआत में इस कांग्रेसी समीकरण को झटका दिया. अस्सी का उत्तरार्ध आते-आते बामसेफ सरकारी कर्मचारियों के संगठन से बदल कर बहुजन समाज पार्टी नाम की राजनीतिक पार्टी बन गई और 1989 में ही पहली बार बसपा का विधायक उत्तर प्रदेश की विधानसभा में पहुंचा.

यहां से दलितों का कांग्रेस से दुराव शुरू हुआ जो आज तक जारी है. बसपा देखते ही देखते दलितों की निर्विवाद पार्टी बन गई. और कांग्रेस लगातार उत्तर प्रदेश में सिकुड़ती चली गई. जाहिर है कांग्रेस पार्टी को अगर उत्तर प्रदेश में अपने दिन फेरने है तो उसे अपने पुराने वोटबैंक की इस अहम कड़ी को अपने साथ जोड़ना होगा.

कांग्रेस ने शिद्दत से इस दिशा में प्रयास कर रही है. पहले से ही पार्टी पूरे प्रदेश में चार चरणों में भीम ज्योति यात्रा निकाल रही है. इसके दो चरण पूरे हो चुके हैं. अंतिम दो चरण में पार्टी अवध और बुंदेलखंड के इलाके में भीम ज्योति यात्रा निकालेगी. इसके अलावा आगामी 18 फरवरी को लखनऊ में पार्टी दलित सम्मेलन भी करने जा रही है. अजय आर्य बताते हैं, 'जल्द ही हम अपनी आगामी रणनीति की घोषणा करेंगे. लखनऊ के दलित सम्मेलन के बाद पूरे प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के दलित छात्रों और शिक्षकों को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद करेंगे.'

अस्सी के दशक तक कांग्रेस को सवर्णों और अल्पसंख्यकों के साथ एकमुश्त दलितों का वोट मिलता था


हालांकि अजय की नियुक्ति को पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई ने खुले मन से नहीं स्वीकार किया है. आर्य की नियुक्ति दिल्ली स्थिति केंद्रीय कार्यालय से हुई है. पार्टी की केंद्रीय एसटी-एससी सेल ने इस नियुक्ति को मुहर लगाई है जिसे राहुल गांधी की तरफ से अग्रिम हरी झंडी मिलने की बात कही जा रही है.

पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के एक वरिष्ठ नेता तंज कसते हुए 'टीम राहुल' को कांग्रेस पार्टी का एनजीओ करार देते हैं. वो बताते हैं, 'यह नियुक्ति एनजीओ (टीम राहुल) की तरफ से हुई है. प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को भी इस नियुक्ति की जानकारी नहीं थी. पार्टी अभी भी समझ नहीं पा रही है कि स्थानीय इकाई को भरोसे में लिए बिना की गई कोई भी नियुक्ति एक सीमा से ज्यादा सफल नहीं हो सकती.'

उनका इशारा लंबे समय से पार्टी के पदों पर केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नियुक्त किए जा रहे पदाधिकारियों की ओर है. खुद प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को भी पार्टी ने इसी तरह प्रदेश अध्यक्ष बनाने की घोषणा दिल्ली से कर दी थी. बाद में इसका नतीजा इस रूप में दिखा कि अपनी नियुक्ति के डेढ़ साल बाद तक खत्री अपनी टीम का गठन नहीं कर सके थे.

सियासी पंडित भी उत्तर प्रदेश समेत तमाम राज्यों में कांग्रेस की खस्ताहालत के लिए दिल्ली से होने वाली नियुक्तियों को जिम्मेदार मानते हैं. कांग्रेस को लेकर यह विचार बार-बार सामने आता है कि केंद्रीय नेतृत्व को राज्यों का जिम्मा स्थानीय नेताओं के भरोसे छोड़ना चाहिए. यह बात हाल के बिहार विधानसभा के चुनावों में सफल होती भी दिखी, जहां पार्टी 41 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीतने में सफल रही.

एक नेता कहते हैं कि स्थानीय इकाई को भरोसे में लिए बिना की गई कोई भी नियुक्ति एक सीमा से ज्यादा सफल नहीं हो सकती


बिहार  के चुनाव प्रचार से गांधी परिवार और केंद्रीय नेता लगभग ओझल रहा था. उस समय भी यह बात कही गई कि स्थानीय चुनाव, स्थानीय नेताओं के हाथ में छोड़ना हितकर रहेगा न कि नेताओं की पैराशूट लैडिंग करवा कर. अजय आर्य को लेकर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के भीतर एक उहापोह की स्थिति देखने को मिल रही है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच दलित वोटों की इस होड़ के बीच दलितों की सबसे बड़ी हितैषी पार्टी बसपा फिलहाल चुप्पी साधे हुए है. आर्य कहते हैं, 'शुरुआत में बसपा दलितों के लिए अच्छा काम कर रही थी, लेकिन 2007 में सत्ता में आने के बाद वह भी बाकी पार्टियों जैसी हो गई. दलित समुदाय को उसने निराश किया. अगर सिर्फ चेहरा को दलित राजनीति माना जाय तो मायावती बेहतर हो सकती हैं लेकिन नीतिगत स्तर पर वे असफल रहीं हैं. उनके रहते दलित हितों से जुड़ी पॉलिसी में पैरालिसिस की स्थिति रही.'

यह अजब संयोग है कि कांग्रेस जिन अजय आर्य पर दांव लगाने जा रही है वह गोंडा जिले के रहने वाले हैं और भाजपा भी अपना दलित दांव गोंडा के पड़ोसी जिले बहराइच से खेलने जा रही है. गोंडा-बहराइच का पूरा इलाका राजा सुहैलदेव के समर्थक दलितों की बहुलता वाला है. दलित वोटों की इस होड़ में सबसे अहम किरदार बसपा की एंट्री होना अभी बाकी है.

First published: 10 February 2016, 23:21 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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