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'अजमेर दरगाह में बम रखा जाना चाहिए जिससे हिंदू डर जाएंगे और वहां नहीं जाएंगे'

कैच ब्यूरो | Updated on: 22 March 2017, 14:29 IST
(फाइल फोटो)

स्वामी असीमानंद की पैदाइश पश्चिम बंगाल के हुगली के गांव कमारपुकुर की है. कॉलेज में उनके नाम का पंजीकरण नब कुमार के नाम से है. 1971 में फिजिक्स की पढ़ाई की दौरान ही वह पहली बार आरएसएस के संपर्क में आए. इसी साल एमएससी में दाख़िले के लिए वह बर्धमान ज़िले में आ गए और पूरी तरह आरएसएस में सक्रिय हो गए. 1981 में वह एक गुरु स्वामी परमानंद की शरण में आए जिन्होंने उनका नाम नब कुमार से बदलकर स्वामी असीमानंद कर दिया.

असीमानंद शुरू से ही आदिवासियों के लिए काम करना चाहते थे. लिहाज़ा, वह आरएसएस की एक शाखा वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ गए. उन्होंने बीरभूम, पुरुलिया, बांकुरा के अलावा अंडमान निकोबार जाकर आदिवासियों के लिए काम किया और 1997 में स्थायी रूप से गुजरात के डांग ज़िले में बस गए. यहां का वातावरण बेहतर देखकर उन्होंने एक ट्रस्ट शबरी माता सेवा समिति का गठन किया.

इस ट्रस्ट के लिए पैसा जुटाने के लिए उन्होंने 2002 में एक राम कथा का आयोजन किया. इस आयोजन की सफलता ने असीमानंद के हौसले बुलंद कर दिए. उन्होंने शबरी कुंभ नाम से इससे भी बड़ा आयोजन करने का फैसला किया, जिसे करवाने की ज़िम्मेदारी आरएसएस ने ली. शबरी कुंभ का भी आयोजन बड़े पैमाने पर हुआ.

शबरी माता सेवा समिति ट्रस्ट के अध्यक्ष जयंती भाई केवट थे, जिन्होंने पहली बार 2003 में साध्वी प्रज्ञा और असीमानंद की पहली मुलाक़ात कराई. प्रज्ञा ने मुलाक़ात के बाद कहा कि वह उनसे अगले महीने उनके वाघई स्थित आश्रम में मिलना चाहेंगी. अगली मुलाक़ात में प्रज्ञा के साथ सुनील जोशी भी थे.

अप्रैल-मई 2004 में असीमानंद उज्जैन के कुंभ मेले में गए थे. यहां प्रज्ञा सिंह ने जय वंदे मातरम नाम के एक संगठन का तंबू लगाया था जिसकी वह अध्यक्ष थीं. गुजरात के वलसाड़ के आए एक व्यक्ति भारतभाई प्रज्ञा सिंह के तंबू में ठहरे थे.

जज को दिए गए अपने बयान में स्वामी कहते हैं, "2002 में हिंदू मंदिरों पर मुस्लिमों द्वारा बम हमले हो रहे थे. मैं बहुत विचलित होता था. इस बारे में मैं भारत भाई, प्रज्ञा और सुनील जोशी से चर्चा करता था. मुझे समझ आया कि उनके अंदर भी मेरे जैसी सोच थी. इसके बाद 2006 में काशी स्थित संकटमोचन मंदिर में बम हमले ने हम सभी को विचलित कर दिया."

स्वामी का कहना है, "मार्च 2006 में भारतभाई, प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी शबरी धाम आए. यहीं तय हुआ कि इसका जवाब देना चाहिए. हमने यहां मीटिंग के दौरान तय किया कि सुनील जोशी और भारतभाई झारखंड जाएंगे और कुछ सिम कार्ड और पिस्टल जैसे हथियार खरीदेंगे. मैंने उन दोनों को सुझाव दिया कि गोरखपुर और आगरा भी जाना. मैंने कहा कि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ से मिलना और आगरा में राजेश्वर सिंह ने मिलना और इस बारे में बात करना. मैंने ये सामान लाने के लिए 25 हज़ार रुपए सुनील जोशी के हाथ में दिए." अप्रैल 2006 में दोनों इस काम के लिए निकल गए. 

अपने इकबालिया बयान में असीमानंद ने कहा, "अगली बैठक में सुनील जोशी, भारतभाई, प्रज्ञा सिंह असीमानंद साथ में मिले. इस बैठक में तय हुआ कि मालेगांव में 80 फीसदी मुसलमान रहते हैं, इसलिए हमारा काम नज़दीक से शुरू होना चाहिए और पहला बम यहीं रखा जाना चाहिए."

फिर असीमानंद ने कहा कि स्वतंत्रता के समय हैदराबाद के निज़ाम ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया था, इसलिए हैदराबाद को भी सबक सिखाया जाना चाहिए और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी धमाका करना चाहिए.

असीमानंद के मुताबिक यह तय हुआ कि अजमेर ऐसी जगह है जहां की दरगाह में हिंदू भी काफी संख्या में आते हैं. इसलिए अजमेर में भी एक बम रखा जाना चाहिए जिससे हिंदू डर जाएंगे और वहां नहीं जाएंगे.

First published: 22 March 2017, 14:29 IST
 
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