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कितना संजीदा है शिरोमणी अकाली दल का यूपी-उत्तराखंड चुनाव अभियान?

राजीव खन्ना | Updated on: 13 June 2016, 8:39 IST

शिरोमणि अकाली दल उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावों में अपनी ताकत आजमाने की सोच रहा है. यहां भी पंजाब के साथ ही विधानसभा चुनाव कराये जायेंगे. पंजाब में दल को भारी सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है जहां वह अपने साथी दल भाजपा के साथ तकरीबन दस सालों से सत्ता में है.

दूसरी तरफ भाजपा पूरे देश में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिहाज से उत्तर प्रदेश के चुनावों को काफी गंभीरता से लड़ने की तैयारी में है. अकाली दल नेतृत्व ने दावा किया है कि वह अपनी विचारधारा वाले दलों के साथ मिल कर साल 2017 के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में भाग लेगी. उसका उद्देश्य इन राज्यों में सिख और पंजाबी समुदाय को उचित सम्मान और अधिकार दिलाना है. लेकिन सवाल इस बारे में उठाए जा रहे हैं कि इन चुनावों को अकाली दल कितनी गंभीरता से लड़ेगा?

पिछले दिनों शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सिख और पंजाबी समुदाय के सामने आ रही समस्याओं के हल और उनकी स्थिति बेहतर करने के लिए एक विस्तृत अभियान चलायेगी. उसके बाद से दल संगठनात्मक ढांचे को तैयार करने में लगा हुआ है.

सुखबीर ने उत्तर प्रदेश में सिख और पंजाबी लोगों की संख्या को देखते हुए चुनाव की रणनीति बनाई है

दल ने पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. राय सिंह को उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों का अध्यक्ष नियुक्त किया है. पूर्व चीफ विजिलेंस कमिश्नर सिंह राज्यों का सघन दौरा कर रहे हैं, खास तौर पर उन विधानसभाओं का जहां सिख समुदाय बड़ी संख्या में है.

राय ने कैच को बताया, “हम उत्तर प्रदेश में कम से कम 40 सीटें जीतने की स्थिति में हैं. उत्तराखंड को देखें तो कम से कम 36 विधानसभाओं में सिख वोट निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं, वहां भी हमारी जीत की संभावनाएं हैं. हम उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन के बारे में सोच रहे हैं. चूंकि हम पंजाब में और राष्ट्रीय स्तर पर साझेदार हैं, ऐसे में यह (उत्तर प्रदेश में गठबंधन) उस गठबंधन का विस्तार ही होगा.”

सुखबीर ने उत्तर प्रदेश में सिख और पंजाबी लोगों की संख्या को देखते हुए अकाली दल को मजबूत करने पर ध्यान देना शुरू किया है. बादल ने उन संभावित 40-45 सीटों की पहचान करने के लिए पांच सदस्यों की एक समिति बनायी थी, जहां पार्टी चुनाव लड़ सकती है. राज्यसभा सांसद बलविंदर सिंह भुंडेर, श्री आनंदपुर साहिब के सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, कैबिनेट मंत्री गुलजार सिंह रनिके, दल की दिल्ली इकाई और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (डीएसजीएमसी) के अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके और वरिष्ठ नेता अवतार सिंह हित से मिल कर बनी इस समिति को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया है.

बड़ी संख्या में सिख और पंजाबी उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में बसे हैं जहां वे विभाजन के बाद आए थे. सुखबीर ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि सिख और पंजाबी समुदाय ने उत्तर प्रदेश के विकास के लिए काफी कुछ किया है और वहां विकास सूचकांक के मानकों में ये अहम योगदान देते हैं.

अकाली दल का लक्ष्य उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में रहने वाले सभी पंजाबियों और सिखों को शिरोमणि अकाली दल के झंडे के नीचे ला कर उनकी क्षमताओं का सही उपयोग करना है. अकाली नेतृत्व का मानना है कि अब तक विभिन्न राजनीतिक धड़ों ने उनसे बड़े-बड़े वादे करके उनका फायदा उठाया है. दरअसल इन धड़ों ने अब तक इनके साथ इस्तेमाल करो और भूल जाओ की नीति अपनायी है.

पंजाब में सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे अकाली नेतृत्व के पास उत्तर प्रदेश पर ध्यान देने के लिए समय नहीं होगा
कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी नेता तेजवंत सिंह रैना और समाजवादी पार्टी नेता हरजीत सिंह शिरोमणि अकाली दल के साथ जुड़ गये हैं और राय का दावा है कि बड़ी संख्या में लोग पार्टी में शामिल हो रहे हैं.

दरअसल तराई में बसने वाले इन लोगों का पंजाब के साथ काफी मजबूत सांस्कृतिक संबंध है. उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों और उत्तराखंड में रहने वाले पंजाबी लगातार पंजाब के लोगों के साथ संपर्क में रहते हैं.

उत्तर प्रदेश में अकाली दल के चुनाव लड़ने के फैसले से आम आदमी पार्टी (आप) नेतृत्व को अकाली नेतृत्व पर आक्रमण करने का मौका मिल गया है. आप के वरिष्ठ नेता और संगरूर से सांसद भगवंत सिंह मान ने पिछले दिनों बादल की आलोचना करते हुए कहा कि पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में भारी हार के आसार देखते हुए ये लोग उत्तर प्रदेश भाग रहे हैं.

मान ने आगे कहा कि केवल वोट हासिल करने के लिए बादल परिवार ने हमेशा पंजाबियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है और विभिन्न समुदायों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की है. उन्होंने पूछा कि प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर वहां यह कैसे समझायेंगे कि वे बाहरी नहीं हैं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक जगतार सिंह के मुताबिक, अगर अकाली उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव लड़ते हैं, तो यह पहला ऐसा मौका होगा. हालांकि वह सुखबीर की घोषणा के बारे में संदेह जाहिर करते हैं. वह कहते हैं, “वे वहां पर सीटों के लिए मोलभाव करने की स्थिति में नहीं हैं. वह नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध से ऐसा कहते आ रहे हैं. शायद यह घोषणा पार्टी में कुछ युवाओं को साथ लाने की एक कोशिश है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पार्टी की इकाइयां निष्क्रिय पड़ी हैं. हरियाणा में भी इनकी उपस्थिति न के बराबर है.”

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार की राय है कि अपने गढ़ पंजाब में भारी सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे अकाली नेतृत्व के पास उत्तर प्रदेश पर ध्यान देने के लिए समय और संसाधन नहीं होगा. उनके मुताबिक, “यह पंजाब चुनावों से पहले महज एक दिखावा है, और कुछ नहीं.”
First published: 13 June 2016, 8:39 IST
 
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