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अखिलेशराज: भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों की शरणगाह!

गोविंद पंत राजू | Updated on: 18 March 2016, 18:45 IST
यह इत्तफाक ही है कि जिन दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सरकार की वरिष्ठ नौकरशाही आईएएस वीक मनाने की तैयारी कर रही है ठीक उन्ही दिनों उत्तर प्रदेश की आईएएस बिरादरी की मुखिया रहीं पूर्व चीफ सेक्रेटरी नीरा यादव गाजियाबाद की जेल में भ्रष्टाचार के आरोप में बन्द हैं और एक अन्य अधिकारी राजीव कुमार जेल के दरवाजे तक पहुंच चुके हैं. राजीव कुमार को सीबीआई अदालत ने नोएडा के एक भ्रष्टाचार के मामले में 20 नवम्बर, 2012 को तीन वर्ष की सजा सुनाई थी.

भ्रष्टाचार का मुद्दा अब किसी को प्रभावित नहीं करता. दो दशक पहले लखनऊ में कई आईएएस अधिकारियों के घर आयकर विभाग के छापे पड़ने के बाद आईएएस संवर्ग के अधिकारियों ने बदनामी की चिन्ता में कार्यकारिणी की बैठक बुलाई थी. 1996 में तो आईएएस एसोसिएशन ने बाकायदा वोट डलवा कर अपने बीच के तीन महाभ्रष्ट अधिकारियों का चुनाव भी किया था.

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तब चुने गए तीन महादागियों में से दो अखण्ड प्रताप सिंह और नीरा यादव जेल जा चुके हैं तीसरे ब्रजेन्द्र यादव अब दिवंगत हो चुके हैं. लेकिन आज जब कई अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में बन्द हैं या कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं तब आईएएस एसोसिएशन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बात तक नहीं करना चाहती.

शायद अन्य कारणों के साथ-साथ भ्रष्टाचार में अधिकारियों और राजनेताओं की जुगलबन्दी भी इसकी एक बड़ी वजह है. एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, "यह सच है कि आईएएस संवर्ग में आज भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता बढ़ी है. यहां तक कि कई महिला अधिकारी भी अब भ्रष्टाचार से परहेज नहीं करतीं.’’

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ध्यान देने लायक है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव, नियुक्ति के पद पर राजीव कुमार की तैनाती के बारे में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा था कि जिस अधिकारी को सीबीआई कोर्ट ने तीन वर्ष की सजा सुनाई है उसे 'नियुक्ति सचिव' जैसे महत्वपूर्ण पद पर क्यों तैनात किया जा रहा है. राज्य सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं था. अदालत के सामने फजीहत होने से पहले ही राज्य सरकार ने राजीव कुमार को हटाकर अधिकारियों को प्रशिक्षित करने वाले एक संस्थान का निदेशक बना दिया.

आईएएस संवर्ग में भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता बढ़ी है. प्रदेश में आईएएस और सत्ताधारी वर्ग की मिलीभगत खुला सच है

इस पर भी विवाद हुआ कि एक भ्रष्ट अधिकारी को नए अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाले संस्थान का निदेशक बनाना कितना जायज है. राजीव कुमार इस पद पर दो ही दिन रह पाए. इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके नियुक्ति आदेश को रद्द कर दिया. अब राजीव कुमार भी जेल जाने वालों की लाइन में हैं.

वहां पहले से ही आईएएस प्रदीप शुक्ला मौजूद हैं जिनके बारे में कभी ये कहा जाता था कि विदेशों में पढ़ रही उनकी बेटियों की फरमाइश पर उनके लिए लखनऊ से कबाब भेजे जाते थे. आज प्रदीप शुक्ला अदालत में गुहार लगा रहे हैं कि उनके पास जमानत भरने के लिए रुपए नहीं हैं. हालांकि जिस घोटाले में वे अन्दर हैं वह हजारों करोड़ का है.

राजीव कुमार को बचाने के लिए एड़ी चोटी का नाकाम जोर लगाने वाली समाजवादी सरकार का ‘दागी अधिकारियों से प्रेम’ पहला मामला नहीं है. अखिलेश सरकार के खजाने में ढेर सारे दागी आईएएस महत्वपूर्ण और मलाईदार कहे जाने वाले पदों पर विराजमान रहे हैं.

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यादव सिंह पर अखिलेश सरकार की कृपा किसी से छिपी नहीं है. यादव सिंह को बेदाग दिखाने और सीबीआई के शिंकजे से बचाने के लिए अखिलेश सरकार ने क्या क्या नहीं किया. सीबीआई जांच के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अखिलेश सरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर उन्हें निराश कर दिया कि- ‘आखिर एक अधिकारी को बचाने के लिए राज्य सरकार इतनी उतावली और चिन्तित क्यों है?'

ऐसी ही एक टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईएएस अधिकारी संजीव सरन और राकेश बहादुर के बारे में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर भी की थी. जब अदालत के निर्देशों के बाद भी सरकार उनको नोएडा प्राधिकरण से हटाने को तैयार नहीं थी. मायावती के सत्ता में आने पर दोनों को भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित किया गया था.

मगर अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनते ही दोनों को नोएडा का अध्यक्ष व सीईओ बना दिया गया. मायावती के काल में 4,721 करोड के नोएडा घोटाले के आरोपी बनाए गए इन दोनों अधिकारियों को अन्ततः इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद जनवरी, 2013 में अपने पदों से हटना पड़ा था.

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लेकिन इन अधिकारियों का महत्व इसके बाद भी कम नहीं हुआ और अभी भी ये दोनों महत्वपूर्ण विभागों में जमे हुए हैं. इसी तरह राज्य में आवास सचिव पद पर नियुक्त पंधारी यादव मनरेगा मामले में आरोपी हैं और सीबीआई की जांच के लपेटे में हैं. उन पर मनरेगा के मद से जिलाधिकारी रहते हुए 98 करोड़ का नाश्ता करने जैसे कई आरोप हैं.

मनरेगा के भ्रष्टाचार के मामलों में तीन अन्य आईएएस अधिकारी भी जेल जा चुके हैं. ऐसे ही एक दर्जन अन्य अधिकारी अभी भी सरकार की कृपा से धन्य हो रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते रहे और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए आईएएस अधिकारी एसपी सिंह कहते हैं, ‘‘इस सरकार के आने के बाद से अफसरशाही में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है. अब जो जितना बड़ा भ्रष्ट है, सत्ताधारी दल की नजर में वो उतना ही योग्य और बेहतर है. इसीलिए अधिकारियों के बार बार तबादले किए जाते हैं.’’

मनरेगा के भ्रष्टाचार के मामलों में तीन आईएएस अधिकारी भी जेल जा चुके हैं

यह बात इसलिए भी तर्कसंगत लगती है कि राज्य में अब अधिकारियों के तबादले थोक के भाव से किए जाते हैं. लगभग हर महीने में तीस-चालीस अधिकारियों के तबादलों की सूची एक साथ जारी होती है.

राज्य के कुछ पुलिस प्रमुखों पर भी इसी तरह के दाग लगे थे लेकिन सरकार ने उन्हें कामचलाऊ पुलिस महानिदेशक बनाने में कतई संकोच नहीं किया और दो चार महीने के लिए पुलिस महानिदेशक बन कर ही रिटायर हुए.

राजीव कुमार जैसी ही कृपा अखिलेश सरकार ने एनआरएचएम में जमानत पर छूटे पूर्व नियुक्ति सचिव प्रदीप शुक्ला पर भी की थी जब उन्हें एक मामले में स्वास्थ्य के आधार पर जमानत दिये जाने के बाद राजस्व परिषद में सदस्य पद पर नियुक्ति दे दी गई थी. उस मामले में भी अदालत के दखल के बाद हटाया गया. फिलहाल वे एक और मामले में जमानत की याचिका लगाए हुए हैं.

राजनीतिक मामलों के जानकार लखनऊ युनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजेश कुमार कहते हैं कि, ‘‘यह एक कड़वी सच्चाई है कि राजनेताओं की तरह ही अधिकारी भी अदालतों में मामले विचाराधीन होते हुए भी खुद को बेगुनाह जता कर सत्ता सुख लूट रहे हैं. बीसियों ऐसे अधिकारी हैं जो अदालती मुकदमों के बाद भी सत्ता के प्रश्रय के चलते महत्वपूर्ण पदों पर तैनात हैं.’’

चुनाव सुधारों के लिए कार्यरत इलेक्शन वाच से जुड़े रहे नागेन्द्र मोहन कहते हैं, ‘‘दरअसल अब हमारी चिन्ता इस बात की है कि भ्रष्टाचार एक प्रभावहीन मुद्दा हो गया है. आगामी चुनाव में हो सकता है कि भ्रष्टाचार मुद्दा ही न बन पाए.’’

हालांकि उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में अभी भी उजले चेहरों की कमी नहीं है. संयोग से राज्य के मुख्यसचिव पद पर आलोक रंजन और कृषि उत्पादन आयुक्त के पद पर प्रवीर कुमार जैसे स्वच्छ छवि के अधिकारी तैनात हैं. लेकिन इस सब बावजूद यह भी सच है कि अब प्रदेश में आईएएस संवर्ग की सत्ताधारी वर्ग के साथ मिलीभगत छिपी नहीं रह गई है.

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First published: 18 March 2016, 18:45 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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