Home » इंडिया » Alarm bells: Bearish markets swallow Modi regime's high growth claims
 

शेयर बाजार की अधोगति सरकार की ऊंची विकास दर के लिए खतरा

नीरज ठाकुर | Updated on: 12 February 2016, 19:39 IST
QUICK PILL
  • सेंसेक्स में आई गिरावट इसलिए भी चौंकाने वाली रही कि दो दिन पहले ही सरकार ने अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की थी और उसने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 7.6 फीसदी जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान जताया था.
  • मार्च 2015 में बीएसई 30,000 के पास पहुंच गया था. यह सब कुछ मोदी सरकार के नौ महीनों के कार्यकाल में हुआ लेकिन अब यह अपने न्यूनतम स्तर पर जा चुका है.

गुरुवार को कुछ घंटों के भीतर निवेशकों को करीब 3.13 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा. बीएसई सेंसेक्स में 807.07 अंकों की गिरावट आई. 30 शेयरों के स्टॉक वाले बीएसई सेंसेक्स में 3.40 फीसदी की गिरावट के साथ 22,951.83 पर बंद हुआ. पिछले छह महीनों में सेंसेक्स में आई यह सबसे तेज गिरावट है.

सेंसेक्स में आई गिरावट इसलिए भी चौंकाने वाली रही कि दो दिन पहले ही सरकार ने अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की थी और उसने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 7.6 फीसदी जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान जताया था. 

हालांकि अर्थशास्त्री आंकड़ों को लेकर सवाल उठा रहे हैं लेकिन सरकार के मुख्य सांख्यिकीविद टीसीए अनंत कुमार ने यह कहकर आलोचनाओं को खारिज कर दिया कि नए जीडीपी सीरिज को लेकर समझने में कुछ कमी है.

आलोचकों ने मैन्युफैक्चरिंग की 9.5 फीसदी ग्रोथ रेट और फाइनेंशियल रियल एस्टेट एंड प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर की 10.3 फीसदी ग्रोथ रेट को लेकर सवाल उठाए हैं. 11 फरवरी को शेयर मार्केट में गिरावट को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आलोचकों का तर्क सही था. निवेशकों को भी सरकार के आंकड़ों पर भरोसा नहीं है और इस वजह से वह भारतीय अर्थव्यवस्था की बजाए कंपनी के आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं.

और पढ़ें: अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में घटी जीडीपी ग्रोथ रेट

एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स के 30 में से 28 स्टॉक लाल निशान में बंद हुए और इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियों के स्टॉक को बड़ा झटका लगा. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के टॉप लूजर्स को यहां देखा जा सकता है.

बीएचईल में 6.01 फीसदी की गिरावट आई तो टाटा मोटर्स में 5.55 फीसदी, महिंद्रा एंड महिंद्रा 4.93, टाटा स्टील 4.52, मारुति 3.85 और एययूएल में 3.14 फीसदी की गिरावट देखने को मिली. वहीं बैंकिंग इंडेक्स में भी जबरदस्त गिरावट आई.

दिसंबर तिमाही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मुनाफे में 61.67 फीसदी की गिरावट आने के बाद बाजार में खलबली मच गई

कोटक बैंक में जहां 5.73 फीसदी की गिरावट आई वहीं पंजाब नैशनल बैंक 4 फीसदी तक टूट गया. एक्सिस बैंक में 3.99 फीसदी जबकि आईसीआईसीआई में 3.77 फीसदी की गिरावट आई. फेडरल बैंक 3.31 फीसदी जबकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 2.99 फीसदी तक टूट गया.

बाजार में उस वक्त खलबली मच गई जब देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की दिसंबर तिमाही में उसके मुनाफे में 61.67 फीसदी की गिरावट आई. इसके अलावा एसबीआई के एनपीए में भी 40.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

पीएसयू बैंकों की स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय रही है क्योंकि इनकी कुल बाजार हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी के आस पास है. आरबीआई गवर्नर रघुराम राज ने नियमों को कड़ा करते हुए पीएसयू बैंकों को अपने एसेट को एनपीए के तौर पर दिखाने का निर्देश दिया है ताकि इन रकम को बट्टा खाते में डाला जा सके.

राजन के इस निर्देश का मतलब समझा जाए तो आने वाली तिमाही में कारोबार के लिए बैंकों के पास पर्याप्त नकदी नहीं होगी.

थमी नहीं है तबाही

स्टॉक मार्केट के विशेषज्ञों को इस बात का अंदाजा था. मार्केट में आई इस गिरावट को वह करेक्शन बता रहे हैं जो कि मौजूदा अर्थव्यवस्था के मुताबिक होगा.

एंबिट कैपिटल में इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के सीईओ सौरभ मुखर्जी बताते हैं, 'जब कॉरपोरेट सेक्टर की कमाई में बढ़ोतरी नहीं हो रही थी. पिछली छह तिमाहियों के दौरान कंपनियों की आय में जबरदस्त गिरावट आई है और मुझे नहीं लगता कि आने वाले दिनों में इसमें सुधार होगा.'

उन्होंने कहा, 'निफ्टी और बीएसई को मिलाकर भारतीय बाजार वहां पहुंच चुका है जहां वह दो साल पहले था और फिलहाल यह भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर की स्थिति बयां कर रहा है.' सरकार की कोशिश एफडीआई निवेश में हुई बढ़ोतरी और ऊंची जीडीपी ग्रोथ रेट को बताकर भारत की ग्रोथ स्टोरी को भुनाने की है लेकिन आंकड़ें लगातार इस दावे की पोल खाले रहे हैं.

मार्च 2015 में बीएसई 30,000 के पास पहुंच गया था. यह सब कुछ मोदी सरकार के नौ महीनों के कार्यकाल में हुआ लेकिन अब यह अपने न्यूनतम स्तर पर जा चुका है. सरकार ने अप्रत्यक्ष करों और एफडीआई में हुई बढ़ोतरी का हवाला देकर अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश की है. लेकिन अर्थशास्त्री इससे बहुत अधिक खुश नहीं है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के विजिटिंग प्रोफेसर अजय छिब्बर बताते हैं, 'यह अच्छी खबर है कि नई सरकार के सत्ता में आने के बाद से एफडीआई में बढ़ोतरी हुई है लेकिन इस दावे को परखे जाने की जरूरत है. एफडीआई का बड़ा हिस्सा निवेश की इच्छा के भरोसे आया है और इसका जीमनी निवेश से कोई लेना देना नहीं है. तो जब तक निवेश जमीन पर नहीं होता है तब तक हम इसके बारे में बहुत कुछ नहीं कह सकते.'

सर्विसेज को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रों ने नई सरकार के कार्यकाल के दौरान बुरा प्रदर्शन किया है. भारत के निर्यात में लगातार गिरावट आई है और सीमेंट एंव स्टील कंपनियों की क्षमता का 30 पर्सेंट बेकार पड़ा है. इन सबसे निवेशकों का भरोसा टूट रहा है.

रिकवरी के क्या हैं संकेत?

रैलिगेयर सिक्योरिटीज के रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन के प्रेसिडेंट जयंत मांगलिक बताते हैं, 'हमें गुरुवार की गिरावट को देखकर आश्चर्य नहीं हुआ. हमारा अनुमान है कि इसमें आगे भी गिरावट आएगी. हमें लगता है कि निफ्टी में 7,100 के पास विराम लगेगा लेकिन यह उससे भी नीचे चला गया. यह सब कुछ निवेशकों की हताशा को दिखाता है. अभी आगे और भी गिरावट आएगी.'

और पढ़ें: रिकॉर्ड पीई निवेश ने बजट से बढ़ाई रियल एस्टेट की उम्मीदें

और पढ़ें: अच्छे दिन आनंदीबेन के बेटे के, घाटे में पड़ी कंपनी के शेयरों में 850% की उछाल

First published: 12 February 2016, 19:39 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी