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एएमयू बहाना है, दलित-अल्पसंख्यकों को अलगाना है!

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

जेएनयू से उठी आंच में राजनीति की रोटियां सिक रही हैं. संघ और भाजपा को इससे लाभ मिलता दिख रहा है और इसीलिए राष्ट्रवाद की बहस को देश के बाकी हिस्सों में ले जाया जा रहा है. भारत माता की जय से लेकर जेएनयू में नारों का विवादित वीडियो भाजपा के पदाधिकारी अन्य राज्यों में दिखा रहे हैं.

इस पूरे विवाद से अपने लिए घी निकालकर अब दक्षिणपंथी खेमे की नज़र नए परिसर की तलाश में है और रणभूमि को दिल्ली से निकालकर उत्तर प्रदेश में शिफ्ट किया जा रहा है.

संघ और भाजपा के सूत्रों की मानें तो अगला निशाना अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी है. “जिन परिसरों में तुष्टिकरण की राजनीति के चलते नियमों और संविधान का पालन नहीं हो रहा है, उनका मुद्दा उठाना ही चाहिए और इसमें कुछ ग़लत नहीं है. अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी दस्तावेज़ों के आधार पर कोई माइनॉरिटी संस्थान है ही नहीं. उसे ज़बरदस्ती ऐसा बना रखा गया है और इसकी ओट में कितने ही नियमों को ताक पर रख दिया गया है,” ऐसा कहना है संघ से जुड़े एक नेता का जो फिलहाल सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहना चाहते.

दलित अल्पसंख्यक समीकरण का टूटना राज्य की सपा सरकार और भाजपा दोनों के लिए ही ज़रूरी है

उन्होंने बताया कि जल्द ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मुद्दा उठाया जाएगा. मुद्दा क्या है और इस बार किन बातों को लेकर आपत्ति है, इसपर उन्होंने बताया, “अलीगढ़ विश्वविद्यालय को ज़बरदस्ती अल्पसंख्यकों का गढ़ बना रखा गया है. और इसकी ओट में वहां नौकरियों से लेकर पाठ्यक्रमों और कक्षाओं तक जो आरक्षण और स्थान दलितों, पिछड़ों को मिलना चाहिए, वो नहीं दिया जा रहा है.”

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वो कहते हैं, “यह मुद्दा उठाने की ज़रूरत है. विश्वविद्यालय लगातार संविधान की अवहेलना करता आ रहा है. तुष्टिकरण की राजनीति ने सरकारों का मुंह अबतक बंद रखा. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं हो सकता. जो ग़लत है उसे कहा जाना चाहिए. हम कहेंगे और लोगों को भी बताएंगे कि कैसे केंद्र के पैसे पर चलनेवाला एक विश्वविद्यालय ज़बरदस्ती खुद को मुस्लिम विश्वविद्यालय कह रहा है और वंचित तबकों को उनके अधिकार नहीं दे रहा है”.

अलीगढ़ ही क्यों?

यानी संकेत स्पष्ट हैं. अगला निशाना अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय है. इसके विवाद में दलित और पिछड़ा बनाम मुस्लिम है और इसके मूल में राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव हैं. पिछले कुछ महीनों में जो स्थिति राज्य में बनती जा रही है वो संकेत देती है कि दलित और अल्पसंख्यक अगले चुनाव में एकसाथ वोट कर सकते हैं. यह भाजपा के लिए कोई अच्छी ख़बर नहीं है. दलित अल्पसंख्यक समीकरण का टूटना राज्य की समाजवादी पार्टी सरकार और केंद्र में सत्तासीन भाजपा, दोनों के लिए ही ज़रूरी है.

अगर भाजपा दलितों और मुसलमानों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर पाती है तो यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी

पिछले दिनों जेएनयू में नारेबाज़ी के विवाद के बाद भले ही वहां का एक तबका यह सोच रहा है कि केंद्र सरकार की कार्रवाइयों ने जेएनयू और वाम राजनीति को जगा दिया है, लेकिन देश में इसका असर उल्टा हुआ है और संघ और भाजपा इससे लाभान्वित होते नज़र आ रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रवाद को एक विचारधारा और पहचान से जोड़कर लोगों के सामने रखा है. लोग इससे प्रभावित भी दिख रहे हैं और आम लोगों के बीच इस पूरे मामले में मोदी सरकार की पक्षधरता ज़्यादा नज़र आती है.

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लेकिन यह पक्षधरता दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच भी है, ऐसा नहीं है. आरक्षण नीति के समीक्षा से लेकर रोहित वेमुला की आत्महत्या तक कितने ही कारण हैं जो दलितों, अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय की कहानी कहते हैं और यही वजह है कि दोनों अगले चुनाव में एकसाथ वोट करते नज़र आ सकते हैं. उत्तर प्रदेश में तो यह मार तिहरी है. क्योंकि दलितों अल्पसंख्यकों को पीड़ा देने में पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाली सपा सरकार भी शामिल है. मुज़फ्फरनगर के दंगों से लेकर दादरी तक अल्पसंख्यक सपा से खिन्न होते गए हैं.

ऐसे में मायावती सबसे मज़बूत चेहरे के तौर पर सूबे में उभरी हैं. उनकी ताकत दलित और अल्पसंख्यक समीकरण बनता जा रहा है. यही भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंताजनक है. भाजपा राज्य में खराब स्थिति में है. और बिना किसी का वोटबैंक तोड़े उसके लिए अपनी स्थिति सुधारने की गुंजाइश न के बराबर है.

दलित बनाम मुस्लिम

अगर भाजपा दलितों और मुसलमानों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर पाती है तो यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी. आकलन यह है कि अगर यह जुगलबंदी टूटेगी तो वोट बंटेगा और हिंदुत्व से लेकर सोशल इंजीनियरिंग के संघवादी नारे तक इन वोटों को अपनी ओर खींचने की गुंजाइश भी बनेगी.

मुज़फ्फरनगर के दंगों से लेकर दादरी तक अल्पसंख्यक समाजवादी पार्टी से खिन्न होते गए हैं

ऐसे में आरक्षण जैसे विषय से बेहतर और क्या मुद्दा हो सकता है जो इनके टकराव की ज़मीन बन जाए. इस भावी रणनीति की भाषा यह है कि अल्पसंख्यक दर्ज़ा न होते हुए भी अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी का लिहाफ ओढ़े हुए है और दलितों पिछड़ों का हक़ मारा जा रहा है. इसके खिलाफ़ खड़ा होना चाहिए और हिंदुओं को संगठित होकर यह लड़ाई लड़नी चाहिए.

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बाकी की कसर राष्ट्रवाद से लेकर गाय और भारत माता तक फैलाई जा चुकी बहस से पूरी की जा सकती है. भाजपा के एक नेता बताते हैं, “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से क्षद्म धर्मनिरपेक्षों को हमेशा दिक्कत रही है. वो दो संविधान नहीं चला सकते. देश में हिंदू के लिए एक संविधान और मुस्लिम के लिए दूसरा, ऐसा नहीं हो सकता. अंबेडकर ने कभी इसकी पैरवी नहीं की. फिर दलितों पिछड़ों का ह़क कोई भी कैसे मार सकता है”.

वो आगे कहते हैं, “कितने रोहित वेमुला हैं जिनका हक़ नहीं दिया जा रहा है. उसपर बोलना ही होगा”. राज्य की राजनीति के बादलों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है. राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं की बारिश कितने गांव डुबोएगी और कितनों को हरियाली देगी, यह तो समय बताएगा. लेकिन जिस स्तर पर राजनीतिक संघर्ष पहुंच रहा है, वो समाज के लिए अच्छे दिन का संकेत नहीं है.

First published: 2 April 2016, 8:13 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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