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भारतीय बनने के लिए करना पड़ा 67 साल इंतजार

अतुल चंद्रा | Updated on: 25 April 2016, 22:05 IST

भारत के प्रति स्पेन में जन्मे 90 वर्षीय फादर फ्रैडरिक सोपेना की भारत के प्रति दीवानगी किसी भारतीय से कम नहीं है. महज 22 साल की उम्र में सोपेना भारत आ गए थे. 67 साल लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार गुरुवार को उन्हें भारतीय नागरिकता मिल गई. 1949 में भारत आए फादर सोपेना महाराष्ट्र में 'सोपेना बाबा' के नाम से मशहूर हैं.

मुंबई उप महानगर के जिला कलेक्टर शेखर चाणे ने एक छोटे से समारोह में फादर फ्रेडरिक सोपेना को भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र दिया. धाराप्रवाह हिंदी और मराठी बोलने वाले फादर सोपेना ने कहा, 'मैं बेहद खुश हूं कि मेरी कब्र एक भारतीय नागरिक के रूप में भारत में होगी. एक ऐसे देश में, जहां मैंने काम किया है, जहां मुझे इतना प्यार और इतने दोस्त मिले हैं.'

1949 में भारत आए फादर सोपेना महाराष्ट्र में 'सोपेना बाबा' के नाम से मशहूर हैं

अपने बारे में मीडियाकर्मियों को बताते हुए सोपेना ने कहा कि वह छात्र के रूप में भारत आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए. यहां रहते हुए उन्होंने 67 सालों तक मुंबई, थाणे, पालघर, रायगढ़, और नासिक जिलों के गरीबों, बीमारों और जरूरत मंद लोगों के लिए काम किया.

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सोपेना कहते हैं, 'भारत ही केवल ऐसा देश है जहां जीवन के सभी रंगों का अनुभव कर सकते हैं. दुनिया में भारत के बारे में एक धारणा है कि यहां की संस्कृति में बहुत विविधताएं हैं और इसलिए यह रहने के लिए अच्छी जगह नहीं है. भारत में गरीबी, असमानता और भ्रष्टाचार जैसे बहुत से विरोधाभास हैं. लेकिन इस दुनिया में किसी ना किसी रूप में हर जगह सच है. भारतीय लोग जिस तरह से हैं मैं वैसे ही उन्हें प्यार करता हूं.'

भारत ही केवल ऐसा देश है जहां जीवन के सभी रंगों का अनुभव कर सकते हैं: फादर सोपेना

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में पिछले बीस सालों से सोपेना के साथ काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता वैशाली पाटिल कहती हैं, 'फादर फ्रैडरिक भारतीय संस्कृति और खासकर लोगों से बहुत प्यार करते हैं. इसलिए वह भारतीय नागरिकता चाहते थे. अब फादर शांति से भारत में अपनी शेष जिंदगी बिताना चाहते हैं.'

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वैशाली पाटिल बताती हैं कि सबसे पहले उन्होंने 1978 में भारतीय नागरिका के लिए आवेदन दिया था. उस दौरान उनका आवेदन खारिज कर दिया गया. 1988 में फिर किए गए आवेदन को भी स्वीकार नहीं किया गया. फादर ने हार नहीं मानी और 2012 मे फिर से नागरिकता के लिए आवेदन दिया. लेकिन उनकी फाइल ही गुम हो गई. अक्टूबर 2015 में उनकी फाइल पूरी हुई है.

वैशाली पाटिल ने बताया कि सोपेना ने जनहित विकास मंच की स्थापना की थी और उन्होंने महिला सशक्तीकरण, आदिवासी बच्चों की शिक्षा और भूमिहीन किसानों के कौशल विकास के लिए काम किया है.

साल 1990 में सोपेना एक दुर्घटना का शिकार हो गए थे, जिस कारण उनका एक पैर काटना पड़ा था. फिलहाल वह कृत्रिम पैर के सहारे चलते हैं लेकिन समाज सेवा की उनकी भावना में कोई कमी नहीं आई है. 

First published: 25 April 2016, 22:05 IST
 
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