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कांग्रेस मुक्त भारत: टीएमसी भी भाजपा के इस ख्वाब को पूरा करने में लगी हुई है

सुलग्ना सेनगुप्ता | Updated on: 22 September 2016, 7:41 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस मुक्त भारत, अकेला भाजपा की ही धर्मयुद्ध नहीं है. लगता है कि तृणमूल कांग्रेस भी इस मिशन को पूरा करने में मुस्तैद है और पार्टी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रही.
  • बंगाल में सत्तारुढ़ दल ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मानस भुइयां को अपने पाले में शामिल कर लिया. उनके साथ 13 लोग भी, जिसमें पार्टी के विधानसभा में नेता रह चुके मोहम्मद शोहराब भी शामिल हैं, टीएमसी में शामिल हो गए.
  • अगला निशाना अगले साल 2017 में होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस शासित नगरपालिकाओं को अपने कब्जे में करना है. मानस टीएमसी में शामिल होने तक मिदनापुर में कांग्रेस के बड़े नेता थे.

कांग्रेस मुक्त भारत, अकेला भाजपा की ही धर्मयुद्ध नहीं है. लगता है कि तृणमूल कांग्रेस भी इस मिशन को पूरा करने में मुस्तैद है और पार्टी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रही.

बंगाल में सत्तारुढ़ दल ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मानस भुइयां को अपने पाले में शामिल कर लिया. उनके साथ 13 लोग भी, जिसमें पार्टी के विधानसभा में नेता रह चुके मोहम्मद शोहराब भी शामिल हैं, टीएमसी में शामिल हो गए.

अगला निशाना अगले साल 2017 में होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस शासित नगरपालिकाओं को अपने कब्जे में करना है. मानस टीएमसी में शामिल होने तक मिदनापुर में कांग्रेस के बड़े नेता थे.

मानस के भाई बिकास भुइयां पहले से ही टीएमसी में हैं. मानस ने पिछले हफ्ते ही संकेत दिए थे कि वे कांग्रेस छोड़ सकते हैं. पब्लिक अफेयर्स कमेटी के चेयरपरसन पद को लेकर उनका पिछले दो माह से राज्य और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ मतभेद चल रहा था.

अब जबकि भुइयां बंधु टीएमसी में गए हैं, तृणमूल के बड़े नेता 2017 में कांग्रेस से कांडी नगरपालिका छीनने पर आंख गड़ाए हुए हैं.

रविवार को सत्तारूढ़ दल ने विपक्षी पार्टी के 15 पार्षदों को अपने पाले में करते हुए कांग्रेस के कब्जे वाली बेहरामपुर नगरपालिका पर नियंत्रण कर लिया. यह नगरपालिका बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का मजबूत गढ़ समझा जाता था. वह इस निकाय के मुख्य सलाहकार भी थे.

पिछले चुनाव में कांग्रेस ने नगरपालिका की 28 सीटों में से 26 सीटें जीती थीं. तब तृणमूल को केवल एक सीट ही हाथ लगी थी. एक अन्य सीट स्वतंत्र उम्मीदवार को मिली थी.

तृणमूल ने पहले ही मुर्शीदाबाद की तीन नगरपालिकाओं- बेलडांगा, जंगीपुर, अजीमगंज-जियागंज पर अपना कब्जा कर लिया था. इसके साथ ही कांग्रेस और सीपीएम के पार्षदों को भी अपनी ओर मिलाकर जिला परिषद भी अपने कब्जे में कर लिया था.

इस सफलता पर चर्चा करते हुए टीएमसी के ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी कहते हैं कि बहुत जल्द ही मुशिर्दाबाद में कांग्रेस और सीपीएम का नामो-निशान नहीं बचेगा. हम अन्य नगरपालिकाओं को भी अपने अधीन कर लेंगे.

बेहरामपुर नगरपालिका के कांग्रेस के हाथ से निकलने के पीछे जो वजह मानी जा रही है, वह कांग्रेस के भीतर ही अधीर चौधरी की आलोचना का होना है. पार्टी के चार महासचिव, अजय घोष, कनक देबनाथ, खालिद एबादुल्लाह और मनोज पांडेय पहले ही केन्द्रीय नेतृत्व से लिखित में मांग कर चुके हैं कि अधीर को अध्यक्ष पद से हटाया जाए.

ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी कहते हैं कि मुशिर्दाबाद में कांग्रेस और सीपीएम का नामो-निशान नहीं बचेगा.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पार्टी के लिए बंगाल में अपना अस्तित्व बचाए रखना बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है. तृणमूल हमारे नेताओं को अपने पक्ष में करती जा रही है और हाईकमान इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है.

वे कहते हैं कि हमने बंगाल कांग्रेस की इस दुर्दशा, विशेषकर आंतरिक झगड़े के बारे में कई बार आलाकमान से कहा लेकिन आलाकमान ने इस बारे में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया. इसकी प्रतिध्वनि मानस के पार्टी छोड़ने के रूप में सुनाई दी.

मानस पहले से ही अपने पूर्व नेतृत्व को बंगाल में कांग्रेस की बर्बादी के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे. वह कहते हैं कि आज मैंने वास्तविक कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन कर ली. 

कांग्रेस, जिससे मैं पिछले 46 सालों से पूरी तरह जुड़ा रहा, आज सीपी जोशी, अधीर चौधरी और अब्दुल मन्नान की वजह से बर्बादी के कगार पर आ गई है. आज मैं तृणमूल का वफादार सिपाही हूं और ममता बनर्जी के आदेशों और निर्णयों से बंधा रहूंगा.

सोमवार को उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे वर्ष 2011 में ममता की सरकार में मंत्री रह चुके हैं, उस समय कांग्रेस गठबंधन में साझेदार थी. 

राजनीतिक विश्लेषक हाल के वर्षों में बंगाल में कांग्रेस के लिए इसे सबसे बदतर स्थिति करार देते हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. यदि जल्द ही आंतरिक विवादों को हल नहीं किया गया तो हालात और बिगड़ जांगे. तब उसमें सुधार की भी गुंजाइश खत्म हो जाएगी.

प्रो. अमूल मुखर्जी कहते हैं कि पार्टी में जो कलह चल रहा है, उससे निपटने की जरूरत है और ऐसे उपाय किए जाएं कि तृणमूल पार्टी नेताओं का शिकार न कर सके.

First published: 22 September 2016, 7:41 IST
 
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