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इलाहाबाद हाईकोर्ट: मी लॉर्ड्स का सेल्फी प्रेम और चरण स्पर्श

अतुल चंद्रा | Updated on: 14 June 2016, 17:30 IST
(कैच न्यूज)

उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने जब कथित रूप से राज्य के मुख्यमंत्री के पैर छुए थे तो उस वाकये को न्यायपालिका और विधायिका के बीच सद्भावना के तहत की गई कार्रवाई कहा गया. खबरों पर भरोसा करें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी चरण स्पर्श की यही घटना फिर से दोहराई गई है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रविवार शाम जब न्यायाधीशों से चाय पर चर्चा कर रहे थे तो बेंच के एक सम्मानित सदस्य ने यही किया. एक अन्य वरिष्ठ जज ने प्रधानमंत्री को, मैन ऑफ द मोमेन्ट, बताया. प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी लेने की होड़ लगी रही.

जजों के इस आचरण पर लखनऊ के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी का कहना था कि यदि यह सच है तो यह बहुत ही निराशाजनक है. उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने ऐसी किसी घटना के होने से इनकार किया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने ऐसी किसी घटना के होने से इनकार किया है

मोदी का हाईकोर्ट जाने का कार्यक्रम इसलिए बना था क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट इस साल अपनी स्थापना का 150वां सालगिरह मना रहा है. 150वें स्थापना समारोह का उद्घाटन 13 मार्च 2016 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने किया था. इलाहाबाद पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री ने पहले पार्टी पदाधिकारयों को संबोधित किया.

इसके बाद वह न्यायाधीशों से चाय पर चर्चा करने के लिए हाईकोर्ट गए. कहना न होगा कि इन दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों का राजनीतिक नेताओं से मिलना-जुलना आम होता जा रहा है. कइयों की निगाह तो रिटायरमेन्ट के बाद किसी महत्वपूर्ण पद पर लगी रहती है.

अनेक जजों को यह भलीभांति मालूम है कि सरकार के साथ रहने पर हमेशा अच्छा ही होता है. बहुजन समाज पार्टी के विधायकों के एक मामले में तो जस्टिस एमए खान ने नया रिकॉर्ड ही बना दिया था. उन्हें इस बात का अनुमान था कि सत्ता किस करवट बैठने वाली है लिहाजा उन्होंने कोर्ट रूम को स्तब्ध करते हुए अपना फैसला मुलायम सिंह यादव के पक्ष में पढ़ दिया. इसके बाद जो हुआ उसे कौन नहीं जानता. जस्टिस खान की इसके तुरन्त बाद ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त पद पर ताजपोशी कर दी गई.

हाईकोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश विष्णु सहाय ने अपने रिटायरमेंट से कुछ पहले ही बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ एक फैसला दिया था. उनका यह फैसला लखनऊ में अखबारों की सुर्खियां भी बना था. अपने फैसले में उन्होंने कहा था कि उत्तरप्रदेश में जंगलराज है, बाद में उन्हें राज्य मानवाधिकार आयोग का सदस्य बना दिया गया.

अपनी उसी क्षमता के तहत उन्होंने राज्य में बलात्कार मामलों में स्वत: संज्ञान लिया था और मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस भी भेजे थे. जस्टिस सहाय इन दिनों फिर खबरों में हैं.

अनेक जजों को यह भलीभांति मालूम है कि सरकार के साथ रहने पर हमेशा अच्छा ही होता है.

उन्होंने वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की जांच रिपोर्ट खत्म कर दी है और इतने बड़े पैमाने पर हुए दंगे के लिए सिर्फ स्थानीय खुफिया इकाई के एक इंस्पेक्टर और जिले के तत्कालीन एसपी को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में राज्य सरकार की विफलता का कोई जिक्र नहीं किया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने उच्च मानदंडों के लिए प्रसिद्ध रहा है. लोगों को जिस्टस जगमोहन लाल सिन्हा की याद तो होगी ही जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया था और रायबरेली से उनके चुनाव परिणाम को निरस्त कर दिया था.

एक अन्य उदाहरण भी है. पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसएन काटजू, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्केण्डेय काटजू के पिता ने इंदिरा गाधी के साथ चाय पीने से मना कर दिया था.

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरसी लाहोटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अपने दौरे के दौरान कहा था कि जजों को योगी की तरह होना चाहिए और राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट्स के साथ मेलजोल से बचना चाहिए. निश्चित रूप से उनकी सलाह कई लोगों ने नहीं मानी होगी.

First published: 14 June 2016, 17:30 IST
 
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