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इलाहाबाद हाईकोर्ट: तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ क्रूरता

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 December 2016, 13:10 IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है. कोर्ट ने कहा कि पवित्र कुरान में भी तलाक को सही नहीं माना गया है.

हाईकोर्ट ने कहा कि तीन तलाक की इस्लामिक कानून गलत व्याख्या कर रहा है. यह मुस्लिम महिलाओं के साथ क्रूरता है.

बुलंदशहर की दो महिलाओं की याचिका

हाईकोर्ट ने बुलंदशहर की हिना और उमर बी की दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपना अपना मत व्यक्त किया है. 24 वर्ष की हिना का निकाह 53 वर्ष के एक व्यक्ति से हुआ था. बाद में उनके शौहर ने हिना को तलाक दे दिया था. इसी तरह  उमर बी का पति दुबई में रहता है जिसने उसे फोन पर ही तलाक दे दिया था. इस घटना के बाद उमरबी ने दूसरे व्यक्ति के साथ निकाह कर लिया था.

जब उमर बी का पति दुबई से लौटा, तो उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में कहा कि उसने तलाक दिया ही नहीं. उसकी पत्नी ने अपने प्रेमी से शादी करने के लिए झूठ बोला है. इस पर कोर्ट ने उसे संबंधित जिले के एसएसपी के पास जाने का निर्देश दिया था.

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तीन तलाक के मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार ने भी इसके खिलाफ एक शपथपत्र सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में दाखिल किया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया है. कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है. हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक देना क्रूरता की श्रेणी में आता है.

हाई कोर्ट की सिंगल बेंच की टिप्पणी

अदालत ने दो टूक कहा कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग इस्लामिक कानून की गलत व्याख्या कर रहा है. दो अगल-अलग याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुनीत कुमार की एकल पीठ ने यह टिप्पणी की है. दूसरी तरफ, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे शरीयत के खिलाफ बताया है. बोर्ड के अनुसार इसे वह ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे.

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गौरतलब है कि ट्रिपल तलाक के मामले को लेकर केंद्र सरकार और मुस्लिम संगठन आमने-सामने हैं. केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक का विरोध किया था तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस धार्मिक मामलों में दखल करार दिया था.

मोदी सरकार के हलफनामे का विरोध

मोदी सरकार ने हाल ही में तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था. इस हलफ़नामे में कहा गया है कि भारतीय मुस्लिम समाज में चल रही तीन तलाक़ की व्यवस्था महिला अधिकारों के खिलाफ है, लिहाजा इसे ख़त्म किया जाना चाहिए.

वहीं उलेमाओं और इस्लाम के विद्वानों ने इसे मज़हबी मामलों में दख़लंदाज़ी मानते हुए अपनी भौंहें चढ़ा ली हैं. इस्लामिक क़ानून की भारत में सर्वोच्च संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के शपथपत्र का पुरज़ोर विरोध करते हुए इसे मुसलमानों के निजी मसाइल पर हमला बताया था.

पढ़ें: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हलफनामा- तीन तलाक को चुनौती देना गलत

बोर्ड की कार्यकारी समिति के सदस्य और ऐशबाग़ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, "यह मुसलमानों पर सीधा हमला है और हम संविधान के दायरे में रहते हुए इसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करेंगे. जब कुछ राज्यों में जन जातियों के लिए संविधान में संशोधन हो सकता है तो मुसलमानों का अपना पर्सनल लॉ क्यों नहीं हो सकता?."

क्या है तीन तलाक का विवाद?

तीन तलाक' के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है. चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर सुनवाई के दौरान कह चुके हैं कि यह कोर्ट यह तय करेगा कि अदालत किस हद तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है और क्या उसके कुछ प्रावधानों से नागरिकों को संविधान द्वारा मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है.

कोर्ट ने केंद्र समेत इस मामले में सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही संकेत दिया है कि अगर जरूरी लगा तो इस मामले को बड़ी बेंच को भेजा जा सकता है.

इसी साल 'तीन तलाक' के मुद्दे पर  चार अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टीवी पर हो रही बहस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

याचिककर्ता फरहा फैज ने अदालत में दलील दी थी कि रमजान के पवित्र महीने में मुस्लिम उलेमा, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन मुस्लिम समाज को भ्रम में डालने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा याचिकाकर्ताओं के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश हो रही है.

शायरा बानो की याचिका 

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 'तीन तलाक' की वकालत की है. बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह संसद का बनाया कानून नहीं है.

मार्च महीने में शायरा बानो नाम की महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का पक्ष

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि तीन तलाक सही है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हलफनामे में कहा, "सामाजिक सुधार के नाम पर पर्सनल लॉ को बदला नहीं जा सकता." 

हलफनामे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक को चुनौती देने को असंवैधानिक करार दिया है. पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा, "पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करना संविधान के खिलाफ होगा."

पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा, "पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है. यह धर्म से जुड़ा सांस्कृतिक मामला है. ऐसे में कोर्ट तलाक की वैधता तय नहीं कर सकता."

अपने हलफनामे में तीन तलाक को जायज ठहराते हुए बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि धार्मिक अधिकार पर अदालत फैसला नहीं दे सकता.

First published: 8 December 2016, 13:10 IST
 
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