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इलाहाबाद हाईकोर्ट: जजों की नियुक्ति पर केंद्र सरकार की भौहें टेढ़ी

अतुल चंद्रा | Updated on: 6 September 2016, 11:24 IST
QUICK PILL
  • केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए सुझाए गए 44 नामों को उम्मीद के मुताबिक ही अपनी प्रतिकूल टिप्पणियों के साथ अग्रसारित कर दिया है.
  • हाईकोर्ट कॉलेजियम द्वारा जिन 44 नामों की सिफारिश की गई थी, उनमें से 35 इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाकी लखनऊ पीठ के हैं.
  • यह भी संयोग ही है कि हाईकोर्ट के 65 साल के इतिहास में एक भी अनुसूचित जाति का जज नहीं बना है. 
  • कुछ वकीलों ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि हाईकोर्ट का जज बनने के लिए क्या एक अतिरिक्त योग्यता का होना जरूरी हो गया है. 

केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए फाइलों को निपटाने का काम शुरू कर दिया है. केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए सुझाए गए 44 नामों को उम्मीद के मुताबिक ही अपनी प्रतिकूल टिप्पणियों के साथ अंतिम निर्णय के लिए अग्रसारित कर दिया है. हाईकोर्ट कॉलेजियम द्वारा जिन 44 नामों की सिफारिश की गई थी, उनमें से 35 इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाकी लखनऊ पीठ के हैं.

कहा जा रहा है कि इस सूची में अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का कोई भी नाम शामिल नहीं है. यह भी संयोग ही है कि हाईकोर्ट के 65 साल के इतिहास में एक भी अनुसूचित जाति का जज नहीं बना है. केन्द्र ने इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) को सभी प्रस्तावित नामों के बैक ग्राउंड की सख्ती से जांचने का आदेश दिया था.

आईबी ने सूची में शामिल नामों की जांच उन शिकायतों के मद्देनजर की थी कि इनमें से अधिकांश नाम पदस्थ या रिटायर्ड न्यायधीशों और रिश्तेदारों के हैं और उनके भी हैं, जो सरकारी वकील के रूप में काम कर रहे हैं.

यह भी संयोग ही है कि हाईकोर्ट के 65 साल के इतिहास में एक भी अनुसूचित जाति का जज नहीं बना है.

उम्मीद के मुताबिक केन्द्र सरकार ने आईबी की जांच रिपोर्ट के साथ अपनी टिप्पणी कॉलेजियम को भेजी है कि वह इन नामों को अनुमति देने से पहले इस पर फिर से विचार करे. सुप्रीम कोर्ट में अपनी नियुक्ति से ठीक पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जिन नामों की सिफारिश की थी, उनमें अन्य नामों के साथ ही उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपा नेता के पुत्र और बसपा नेता के भतीजे का नाम भी शामिल है.

सूची में शामिल अन्य नामों में भारत के एक पूर्व न्यायाधीश के पुत्र का भी नाम है जो सरकारी वकील है. इसके साथ ही बसपा नेता के भतीजे का नाम भी है. सूची में दो अन्य जजों के दामाद और भतीजे का भी नाम है जिन्हें पीठ में सम्भवतः न्यायाधीश बनाया जाना था. पीठ हमेशा ही सरकार की आपत्तियों के विरुद्ध व्यवस्था दे सकती है.

कुछ वकीलों ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि हाईकोर्ट का जज बनने के लिए क्या एक अतिरिक्त योग्यता का होना जरूरी हो गया है कि वह या तो पदस्थ या रिटायर्ड न्यायाधीश, एडीशनल एडवोकेट-जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल का रिश्तेदार हो अथवा सामर्थ्यवान सरकारी वकील.

एक वकील ने अपने नाम को उजागर न किए जाने की शर्त पर कहा कि क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है?

वह कहते हैं कि भेजी गई सूची में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट नहीं पहना और पहुंच के बल पर सरकारी वकील हो गए और जज के लिए अपने नाम की सिफारिश करा ली. एक वकील आदर्श मेहरोत्रा उदासी के भाव से कहते हैं कि वे बहुत योग्य हैं, मेहनती हैं, उनकी गिनती ईमानदार वकीलों में होती है, वह हाईकोर्ट का जज होने के लिए निर्धारित योग्यताएं भी पूरी करते हैं लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया.

सूची में शामिल अन्य नामों में भारत के एक पूर्व न्यायाधीश के पुत्र का भी नाम है जो सरकारी वकील है.

वे कहते हैं कि इसकी वजह यह रही कि उनके पास दिखाने के लिए प्रभावशाली इनकम टैक्स रिटर्न नहीं है, लो प्रोफाइल वाले हैं और शान-शौकत के लिए लग्जरी कार भी नहीं है जो कि हाईकोर्ट का जज बनने के लिए महत्वपूर्ण मापदंड बन चुका है. मेहरोत्रा आगे कहते हैं कि कॉलेजियम को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि इस तरह के लोगों को अलग-थलग रखे जाने पर वह प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करा सके.

एक अन्य वकील ने वर्ष 2000 में देश की विभिन्न हाईकोर्ट्स में जजों की नियुक्ति के लिए सिफारिश किए गए 159 नामों को केन्द्रीय विधि मंत्रालय द्वारा खारिज किए जाने के मामले का हवाला भी दिया. जांच में पता चला था कि इन 159 सिफारिशों में 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के रिश्तेदारों की थीं. तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी ने सूची की जांच के आदेश दिए थे. और आरोप सही पाए जाने पर पूरी सूची ही निरस्त कर दी गई थी.

लखनऊ के एक वकील अशोक पांडे ने जजशिप के लिए सिफारिश किए गए कुछ लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. इस मामले में सबसे बड़ी विडम्बना यह रही कि वरिष्ठ वकील अशोक पांडे की शिकायत पर ही केन्द्रीय कानून मंत्रालय ने नियुक्तियां खारिज की थीं, पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी सूची के आधार पर अशोक पांडे द्वारा दाखिल याचिका खारिज कर दी थी और पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया था.

इतना ही नहीं, जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम को भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की. अदालत ने याचिका पर सुनवाई करने से पहले एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपए जमा करने का निर्देश दे दिया.

वर्ष 2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शीर्ष न्यायालयों में जजों के प्रमोशन के लिए प्रस्तावित नामों को लेकर शुचिता, पारदर्शिता और अच्छी कर्तव्यनिष्ठा के बारे में कड़े शब्दों में अभिवेदन दिया था. अभिवेदन में कहा गया था कि वकील से बने जज या तो उन वकीलों के साथ अपना स्कोर तय करते हैं जिनके साथ उन्होंने काम किया है अथवा मामले में उनका सॉफ्ट कॉर्नर रहता है. उनके भेदभाव का असर पड़ता है और न्याय कमजोर होता है.

'अंकल-जज' की अवधारणा को हटाने और न्याय के सिद्धान्त को बनाए रखने के लिए अभिवेदन में अनुरोध किया गया था कि वकीलों और न्यायाधीशों के रिश्तेदारों को एक ही अदालत में प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ताकि जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा न चमका सकें.

जांच में पता चला था कि 159 सिफारिशों में 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के रिश्तेदारों की थीं.

पदस्थ या रिटायर्ड जजों अथवा सरकार से जुड़े करीबी लोगों के रिश्तेदार वकीलों की नियुक्तियों पर सवालिया निशान लगाते हुए अभिवेदन में कहा गया था कि उच्च पद के लिए ऐसे लोगों की नियुक्ति को पूरी तरह समुचित और योग्य नहीं ठहराया सकता.

अभिवेदन में तर्क दिया गया था कि सरकारी अधिकारियों को भी उनके गृह जिले में नियुक्त नहीं किया जाता कि कहीं वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल अपने हितों में न कर लें. तो 'अंकल-जज' का सिन्ड्रोम-खत्म करने के लिए रिश्तेदारों की सिफारिश नहीं की जानी चाहिए. न्यायाधीशों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में इसका कोई असर होता नहीं दिखाई पड़ता है.

First published: 6 September 2016, 11:24 IST
 
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