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पाकिस्तान का वो राष्ट्रीय कवि जिसने लिखा हिंदुस्तान का सबसे लोकप्रिय देशभक्ति गीत

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 November 2018, 11:52 IST
(Radio Pakistan)

मुहम्मद इकबाल भारत में अल्लामा इक़बाल के नाम से जाने जाते हैं. पाकिस्तानी मूल के अल्लामा इक़बाल ने हिंदुस्तान के सबसे प्रसिद्द देशभक्त गीतों में से एक 'सारे जहां से अच्छा, हिन्दुस्तां हमारा' लिखा. हालांकि पड़ोसी देश पाकिस्तान में इकबाल ने पूरी तरह से अलग-अलग कारणों से और अधिक प्रसिद्धि हासिल की. इक़बाल को पाकिस्तान के आध्यात्मिक पिता के रूप में माना जाता है क्योंकि टू नेशन थ्योरी उनके भाषण के आधार पर थी.

मुहम्मद इक़बाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को सियालकोट में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है. इकबाल एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थे जिनके परिवार ने इस्लाम कबूल कर लिया था. इक़बाल ने 1904 'सारे जहां से अच्छा लिखा' शीर्षक 'ताराना-ए-हिंद' था. यह जल्दी से ब्रिटिश राज के खिलाफ विपक्ष का गीत बन गया. 1910 में उन्होंने 'ताराना-ए-मिली' (समुदाय का गीत) लिखा था.

 

इक़बाल पंजाब, उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की अपील करने वाले पहले व्यक्ति थे. इंडियन मुस्लिम लीग के 21वें सत्र में उनके अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया था जो 29 दिसंबर,1930 को इलाहाबाद में आयोजित की गई थी. भारत के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का विचार सबसे पहले इक़बाल ने ही उठाया था.

1930 में इन्हीं के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने सबसे पहले भारत के विभाजन की मांग उठाई. इसके बाद इन्होंने जिन्ना को भी मुस्लिम लीग में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उनके साथ पाकिस्तान की स्थापना के लिए काम किया. इक़बाल पाकिस्तान में राष्ट्रकवि माना जाता है. उन्हें जन्मदिन पर पाकिस्तान में राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है.

 

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा

ग़ुर्बत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा

परबत वह सबसे ऊँचा, हम्साया आसमाँ का
वह संतरी हमारा, वह पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों नदियां
गुल्शन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वह दिन हैं याद तुझको?
उतरा तिरे किनारे जब कारवां हमारा

मज़्हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-व-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा

इक़्बाल! कोई महरम अपना नहीं जहां में
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा !

First published: 9 November 2018, 11:51 IST
 
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