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ममता राज में भी पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की हालत 'खराब'

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 2 March 2016, 16:17 IST
QUICK PILL
अमर्त्य सेन द्वारा स्थापित प्रातिची ट्रस्ट, गाईडेंस गिल्ड और एसोसिएशन \r\nस्नैप द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई रिपोर्ट ‘लिविंग रियलिटीज आॅफ \r\nमुस्लिम इन वेस्ट बंगाल’ में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.

पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले 80 प्रतिशत मुस्लिम परिवार सिर्फ 5 हजार रुपये प्रतिमाह की मासिक आय पर अपना जीवन गुजारने को मजबूर हैं. यानी यह आबादी गरीबी रेखा के नीचे खड़ी है.

पश्चिम बंगाल के करीब 38.3 प्रतिशत ग्रामीण मुस्लिम केवल 2500 रुपये प्रतिमाह ही कमा पाते हैं. ये राशि पांच लोगों के एक परिवार के लिए निर्धारित गरीबी रेखा की राशि से करीब आधी है.

ये निष्कर्ष अमर्त्य सेन द्वारा स्थापित प्रातिची ट्रस्ट, गाईडेंस गिल्ड और एसोसिएशन स्नैप द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई रिपोर्ट ‘लिविंग रियलिटीज आॅफ मुस्लिम इन वेस्ट बंगाल’ में सामने आए हैं.

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के 325 गांवों और 73 शहरी वार्डों के मुसलमानों की स्थिति का विश्लेषण किया गया है

रिपोर्ट के अनुसार बीते कुछ समय में पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी सरकार राज्य के अल्पसंख्यकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकामयाब रही है.

यह अध्ययन 325 गांवों और 73 शहरी वार्डों में के कुल मुसलमानों की स्थिति के आधार पर किया गया है. इसमें ममता बनर्जी द्वारा राज्य की गद्दी संभालने के बाद उनकी साक्षरता, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों का विश्लेषण किया गया.

इस रिपोर्ट में सामने आए कुछ प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार से हैं


  • पश्चिम बंगाल में रहने वाले सिर्फ 1.5 प्रतिशत ग्रामीण मुसलमानों के पास निजी क्षेत्र में नियमित वेतन वाली नौकरी है.
  • केवल एक प्रतिशत ग्रामीण मुसलमानों के पास सार्वजनिक क्षेत्र में नियमित वेतन वाली नौकरी है.
  • 13.2 प्रतिशत मुसलमान व्यवस्कों के पास मतदाता पहचान पत्र नहीं है.
  • पूरे राज्य में सिर्फ 12.2 प्रतिशत मुसलमान परिवारों के घरों में जल निकासी की सुविधा है.
  • मुसलमानों के बीच शहरीकरण (शहरों की ओर पलायन) की दर 19 प्रतिशत है जबकि राज्य में ये दर 32 प्रतिशत है.
  • 6 से 14 वर्ष के 15 प्रतिशत मुसलमान बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं जिनमें से एक तिहाई को जीवन में कुछ करने के लिये प्रेरणा की कमी महसूस होती है और उन्हें स्कूल जाने से भविष्य में किसी भी प्रकार का लाभ नहीं दिखाई देता है.
  • इन 15 प्रतिशत में से 9.1 प्रतिशत ने कभी स्कूल में दाखिला ही नहीं लिया है जबकि 5.4 प्रतिशत ऐसे हैं जो पढ़ाई बीच में छोड़ चुके हैं.

अगर राज्य के आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रति एक लाख आबादी पर 10.6 माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल हैं. जबकि मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी वाले तीन जिलों मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी दीनापुर में यह आंकड़ा क्रमशः 7.2 प्रतिशत, 8.5 प्रतिशत और 6.2 प्रतिशत है.

राज्य के 82.1 प्रतिशत मुसलमान किसी भी प्रकार की जानकारी लेने के लिये स्थानीय शिक्षित व्यक्ति या फिर राजनेताओं पर निर्भर हैं. यहां की मुसलमान आबादी में रेडियो, अखबार या फिर टीवी के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने की परंपरा ही विकसित नहीं हो सकी है.

राज्य के कई मुस्लिम इलाकों में रेडियो, अखबार या टीवी से सूचना पाने की परंपरा ही विकसित नहीं हो सकी है

निश्चित रूप से यह रिपोर्ट राज्य की मुख्यमंत्री ममता बजर्नी के लिये परेशानी का सबब बनेगी. यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आ रही है जब बंगाल में विधानसभा चुनाव बिल्कुल सिर पर है.

ममता बनर्जी पर आरोप लगते रहे हैं कि वे सिर्फ घोषणाओं के माध्यम से अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण करने का प्रयास करती रहती हैं. उनके विरोधी कहते हैं कि वे मुसलमानों को समाज की मुख्यधारा में लाने के प्रयास करने की बजाय उन्हें एक वोटबैंक के रूप में तैयार किया जा रहा है. इसके कारण ममता लगातार विपक्षी दलों, कुछ मुसलमान नेताओं और सिविल सोसाइटी के निशाने पर भी आती रही हैं.

हाल ही में ममता बनर्जी ने आॅल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ गठबंधन का ऐलान करते हुए अल्पसंख्यक समुदाय के लिये कई रियायती घोषणाएं कीं. लेकिन इस रिपोर्ट से जाहिर है कि बंगाल के मुस्लिमों की वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है.

First published: 2 March 2016, 16:17 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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